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EWS आरक्षण पर विवाद बढ़ने की आशंका

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विराग गुप्ता
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस यू यू ललित न्यायपालिका के मुखिया थे। लेकिन EWS मामले में जस्टिस ललित और जस्टिस भट्ट के नजरिये को अल्पमत मानते हुए अन्य तीन जजों के फैसले को मान्यता मिल गई। विरोधाभासों से भरपूर इस फैसले के बाद EWS आरक्षण पर अमल और आरक्षण योजना के फैलाव से जुड़े मुद्दों पर विवाद बढ़ने की आशंका है। आइए, देखते हैं कि इस फैसले से जुड़ी कुछ विसंगतियां क्या हैं:

बेसिक ढांचे का उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की बेंच ने 1973 में केशवानंद भारती मामले में कहा था कि संशोधन की शक्ति के इस्तेमाल से संविधान के मूल ढांचे में बदलाव नहीं किया जा सकता।

खुलेगा विवादों का पिटारा
शुरू में एससी/एसटी के लिए ही आरक्षण का प्रावधान था। दूसरे चरण में वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। उस मामले में युवाओं के उग्र विरोध को कम करने के लिए पीवी नरसिंह राव ने आर्थिक आधार पर आरक्षण का कानून बनाया था। 1992 के इंदिरा साहनी फैसले में 9 जजों की बेंच ने आर्थिक आधार पर आरक्षण के प्रावधान को निरस्त कर दिया था। साल 2006 में 93वें संविधान संशोधन से शिक्षा के अधिकार के तहत निजी क्षेत्र के कॉलेजों में आरक्षण के लिए प्रावधान किए गए थे। लेकिन निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण के लिए संविधान में कोई प्रावधान नहीं हैं। तीसरे चरण में पिछले आम चुनावों के पहले EWS आरक्षण को आनन-फानन में 103वें संशोधन के माध्यम से लागू किया गया था। आर्थिक आधार पर अगड़ों के वर्गीकरण और आरक्षण को सुप्रीम मान्यता के बाद अब अनेक राज्यों में मनमाने आरक्षण की बाढ़ आने से आर्थिक और कानूनी अराजकता बढ़ सकती है।

क्रीमी लेयर की लिमिट
रेवड़ियों पर बहस के बीच आम चुनावों के पहले केंद्र और राज्य सरकारों में सरकारी नौकरियों में भर्ती की होड़ लगी है। संसदीय समिति के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद ने क्रीमीलेयर की आर्थिक लिमिट को 8 लाख से बढ़ाकर 15 लाख करने की सिफारिश की है। EWS की स्कीम केंद्र सरकार की है, लेकिन लाभार्थियों को राज्य सरकारों द्वारा सर्टिफिकेट जारी किए जाएंगे। EWS का लाभ जरूतरमंद गरीब लोगों के बजाय अगर फर्जीवाड़े वाले लोगों को मिला तो समाज में बेचैनी के साथ अदालतों में मुकदमेबाजी भी बढ़ेगी।

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