*सुसंस्कृति परिहार
आज़ादी के संग्राम के सेनानियों के बहाने गौंड साम्राज्य की रानी कमलापति की स्मृति में भारत के अब तक के सबसे उन्नत स्टेशन हबीबगंज का नाम रानी कमलापति कर देने से आदिवासियों को क्या फायदा मिलने वाला है ये वे बेहतर समझ रहे हैं। विदित हो,मध्यप्रदेश के चुनावों में जिस तरह आदिवासियों का वोट खिसका हुआ है उसे साधने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह को ख़ुद बा ख़ुद कमलापति की गाथा टृवीट पर लिखना पड़ी जिसमें कई बातें मनगढ़ंत है और विवादास्पद है।साथ ही साथ मोदीजी जैसे कपोल कल्पित कथावाचक का सहारा भी लेना पड़ रहा है।
रानी कमलापति के अपने राज्य गिन्नौरगढ़ को सुरक्षित रखने के संग्राम पर यदि गौर करें तो यह बात मुख्यमंत्री ने साफ की है कि750 गांवों से मिलकर गिन्नौरगढ़ राज्य बनाया गया था. मुगल साम्राज्य के पतन के बाद गोंड राजा निजाम शाह की हुक्मरानी थी और वे सात रानियों के साथ रहते थे। कृपाराम गोंड की बेटी कमलापति सभी रानियों में बेहद खूबसूरत, वीर और बुद्धिमान भी थीं। निजाम शाह के परिवार का भतीजा चैनशाह बाड़ी में राज करता था नफरत की वजह से उसने अपने चाचा की हत्या कर दी वह रानी के रूप का दीवाना था और उनसे शादी करना चाहता। उसने राजा निज़ाम शाह को अपने घर खाने में जहर देकर मार डाला।तब रानी अपने पुत्र नवल के साथ भागकर भोपाल के बड़े तालाब स्थित महल में रहने लगीं जो निज़ाम ने खासतौर पर उनके लिए बनवाया था। वहां उन्हें अफ़गान सरदार मोहम्मद खान के साथ कुछ लोगों के डेरा डालने की ख़बर मिलती है साथ ही यह जानकारी मिलती है कि वह पैसा लेकर हत्या करता है तो रानी ने उसे महल में बुलाया और इस बात पर कोई समझौता किया ।तब उस खान ने गुन्नौरगढ़ पर हमला किया तथा चैन शाह को मौत के घाट उतार दिया।कहा जाता है तब उसने रानी के राज्य को हथियाना चाहा और रानी को हरम में रखने की इच्छा ज़ाहिर की।तब रानी ने छोटे तालाब का गेट खुलवाया उसमें पानी भरवाया तथा उसमें अपने आभूषण और धन-संपत्ति फेक कर उसमें जल समाधि ले ली।पुत्र नवल मोहसिन के साथ युद्ध में मारा गया। किंवदंती है इस युद्ध में इतना ख़ून बहा कि इस क्षेत्र को आज भी लाल घाटी कहते हैं।
ट्वीट में लिखी मुख्यमंत्री की कहानी को इतिहासकार और भोपाल के राजा संग्राम शाह के रियासतदार रहे रिज़वान अंसारी ने एक चैनल से बातचीत में खुलासा किया की दोस्त मोहम्मद खान ने रानी कमलापति से धोखाधड़ी नहीं की बल्कि उन्होंने रानी कमलापति का साथ दिया था।रानी कमलापति ने दोस्त मोहम्मद खान को मदद के लिए बुलाया था इसके एवज में दोस्त मोहम्मद को ₹1 लाख अशरफियां देना तय हुआ था. रिजवान अंसारी बताते हैं कि गिन्नौरगढ़ किले पर चेन शाह का कब्जा था।उसे मोहम्मद खान ने मार डाला, दोस्त मोहम्मद खान चौकी गढ़ किला पहुंचा तो राजा जसवंत सिंह वहां से भाग गए लेकिन बीच में उनके खानसामा ने ही उनको जहर देकर मार डाला,अब रानी कमलापति पूरी तरह से सुरक्षित थीं, लेकिन उस वक्त रानी कमलापति के पास 1लाख अशरफियां नहीं थी तो उन्होंने 50,000 अशरफियां तो दोस्त मोहम्मद खान को दे दीं लेकिन बाकी ना होने के कारण मोहम्मद खां को भोपाल राज्य 5 साल के लिए दे दिया था, भोपाल राज्य से सालाना 10 हजार का राजस्व आता था। मौत की कहानी की भी पुष्टि नहीं होती।यह भी कहा जाता है कि वे मोहम्मद खान को आजीवन राखी बांधती रहीं।यह भी बताया गया है जो तालाब किनारे जो महल है वह कमलापति बहन की सुरक्षा के लिए मोहम्मद खान ने ही बनवाया था ना कि निज़ाम शाह ने।
कुल मिलाकर रानी की यह कहानी घरू विवाद की ही लगती है उनकी बहादुरी का कोई किस्सा नहीं मिलता जबकि वे सीहोर के जिस घराने से थीं वहां उनके बहादुरी के किस्से मिलते हैं। आदिवासी लोग अपने को हिन्दू नहीं मानते । मुख्यमंत्री उन्हें अंतिम हिन्दू शासक कह रहे हैं।कहा जाता है कि पहले इस स्टेशन का नाम अटल जी के नाम पर रखना था किंतु सांसद प्रज्ञा और शिवराज की सहमति से कमलापति पर बात बनी। इसकी एक वजह यह भी सामने आई है कि उनके पति ने मुस्लिम धर्म स्वीकार लिया था लेकिन कमलापति हिंदू रहीं यही बात दोनों को पसंद आई और बात बन गई।
विदित हो हबीबगंज का नाम हबीब मियाँ के नाम पर रखा गया था। इससे पहले इसका नाम शाहपुर था। कहा जाता है कि हबीब मियाँ ने 1979 में स्टेशन के लिए जमीन दी थी, जिस कारण उनके नाम पर इसे रखा गया था। आज के एमपी नगर का नाम तब गंज हुआ करता था।हबीब और गंज को जोड़ कर इसे हबीबगंज बना दिया गया । बहरहाल आजादी के बदलते इतिहास की यह नई कड़ी होगी ।वास्तव में 15नवम्बर बिरसा मुंडा की जन्म जयंती जिसे आदिवासी गौरव दिवस की संज्ञा दी गई है यह हर साल मनाया जाएगा।यह दिवस लगातार चार दिन 22 नवंबर मनाया जाएगा इसमें अंग्रेजों से लड़ने वाले आदिवासी योद्धाओं को याद किया जाएगा। भोपाल में चूंकि आदिवासी योद्धा नहीं बचे थे इसलिए संभवतः कमलापति के इतिहास को सामने लाया गया है।कल जंबूरी मैदान भोपाल में तकरीबन पांच लाख आदिवासी समाज के लोगों को लाने के इंतज़ाम किए गए हैं।देखना यह होगा कि इन्हें और कितनी घोषणाओं के ज़रिए भाजपाई धारा में पुनः जोड़ा जाता है। हबीबगंज स्टेशन का नाम बदलकर उसमें रानी के चित्र लगाकर मुझे नहीं लगता कोई बड़ी उपलब्धि मिलने वाली है बल्कि भोपाल और आसपास का मुस्लिम समाज इस हरकत से अंदर अंदर सुलग रहा है।ध्यान रहे भोपाल और आसपास लगे क्षेत्रों में आदिवासियों का औसत बहुत कम है।ख़ामोख़ा योगी बनने की शिवराज सिंह की यह कोशिश फलीभूत होने के आसार कम ही है।हां यदि बाहर के आदिवासी बहुल क्षेत्र के लोगों का जमावड़ा यदि बड़ा हो जाता है तो उनके वोट की फिफ्टी फिफ्टी तक बदलाव की संभावना बनती है। क्योंकि आदिवासी आज भी सबसे सीधा भोला भाला और मेहनतकश है। राजनैतिक छल छद्म को नहीं समझता।

