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संघियों के संग— वार्तालाप

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संघियों से वार्तालाप बड़ा मजेदार होता है l वे यह खुद नही समझ पाते कि वह कह क्या रहे हैं ? उसका मतलब क्या है ? एक दम भोले भंडारी होते है बेचारे पढ़ाई लिखाई सोच विचार से बेचारों का कोई लेना देना नहीं होता l संघ के बौद्धिक में मिला ज्ञान, अधकचरा इतिहास बोध और व्हाट्सएप के फर्जी मैसेज बस कुल मिलाकर यही उनकी वैचारिक पूंजी है l जिसके सहारे वे किसी भी बहस में अपनी मुंडी घुसा देते है l बात चल रही हो आर्थिक नीतियों की तो वे जोश में आकर कहेंगे कि आप पहले ये बताओ कि नेहरू के दादा का नाम गयासुद्दीन था या नहीं ? इन जड़ भरत लोगों से निपटना अपने बस की बात नहीं है l अपन तो पहले दौर में ही मैदान छोड़ कर हार मान लेते है l
फेसबुक पर नेहरू जी की पुण्यतिथि पर हमारी वाल पर बहुत सी पोस्ट देखकर एक संघी भाई साब का खून खोल गया l उनके अंदर का संघी फुफकारने लगा l
उन्होंने तैश में आकर कहा कि भारत पाकिस्तान बटवारा नेहरू के कारण हुआ था क्योंकि वह अंग्रेजों का एजेंट था l बटवारे के समय हुए दंगों में हिन्दू मारे जा , काटे जा रहे थे तब नेहरू कहाँ छुपा हुआ था ? ये भी तो बताओ ?
हमने बिना विचलित हुए उनसे प्रति प्रश्न किया कि 1925 में स्थापित आरएसएस 1947 तक जवान हो गया था उसकी शाखाओं का जाल  देश भर में फैल गया था l संघ हिन्दू महासभा के पास सावरकर , गोलवलकर ,श्यामा प्रसाद मुखर्जी दीनदयाल पँडित जैसे राष्ट्रीय कद के नेता थे l आप यह बताइए कि उन्होंने देश विभाजन को रोकने के लिए क्या क्या किया ? जब हिन्दू मारे जा रहे थे काटे जा रहे थे तब हिंदुओं को बचाने के लिए आपका संगठन और नेता क्या कर रहे थे ?
जैसे गांधी जी मुस्लिम लीग की डायरेक्ट एक्शन की कार्यवाही के चलते हिंदुओं को बचाने के लिए नोआखाली की गली गली में पैदल घूमे ,उपवास किया और हिंसा को रोका था l जब देश मे आज़ादी का जश्न मनाया जा रहा था तब गांधी दिल्ली में नहीं वहीं पैदल पैदल घूम कर हिंसा की आग को शांत कर रहे थे l ऐसा कोई उदाहरण संघियों का हो तो बताओ ?
उस भोले भंडारी को कोई जवाब नहीं सूझा तो उसने कहा कि उस वक्त जब मुसलमान हिंदुओं को मार रहे थे तो हम लोग मुसलमानों को मार रहे थे ? 
हमें उत्तर मिल गया था कि एक तरफ जिन्ना वादी लोग हिंदूओं के प्रति नफरत फैला रहे थे और दूसरी तरफ तथाकथित हिंदूवादी मुस्लिम विद्वेष को हवा दे रहे थे l भारत विभाजन भले ही अंग्रेजो की कुटिल चाल हो लेकिन दोनो समुदायों की संकीर्णता ,तंगदिली और परस्पर घृणा से यह कामयाब हो सकी l ज़ाहिर तौर पर मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है जो अधूरा सच है l सच तो यह है कि सावरकर और जिन्ना दोनो ही द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत में विश्वास करते थे l अगर हिंदुओं और मुसलमानों में आपसी मोहब्बत और भाईचारा होता होता तो अंग्रेज क्या अंग्रेज का बाप भी हमें जुदा नहीं कर सकता था l 
आज भी संघियों के राजनैतिक संस्करण भाजपा की राजनीति का मूल आधार मुस्लिम विद्वेष है l तभी तो गुजरात दंगों में सरकार के संरक्षण में दो हज़ार से ज्यादा मुस्लिम मारे जाते है काटे जाते है जलाए जाते है और मिस्टर मोदी हिन्दू ह्रदय सम्राट बनकर आडवाणी जैसे वरिष्ठ को पटखनी देकर पीएम बन जाते हैं l जबकि मिस्टर मोदी ने दंगों के अलावा हिंदूओं के लिए मुख्यमंत्री रहते कोई विशेष काम नहीं किया था l मुसलमानों को मरवाना और मारने वालों को संरक्षण देकर उन्हें बचाना ही उस समय उनकी एक मात्र योग्यता थी l संघ और उसके कैडर को उनकी यही विशेषता पसन्द थी और वे उनके सिरमौर है l
विभाजन और उस समय हुई हिंसा भारतीय उपमहाद्वीप की एक त्रासदी है l लेकिन उसे राजनैतिक मुद्दा बनाकर कोई संघी ,कोई लीगी दूसरे को दोष दे तो यह और दुर्भाग्यपूर्ण है l साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन और धुर्वीकरण की राजनीति से तात्कालिक फायदा तो लिया जा सकता है लेकिन अंततः यह सोच विभाजनकारी है l जो देश की एकता और अखंडता के लिए घातक है l

( गोपाल राठी )

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