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भारत में सहकारी आंदोलन

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रामबाबू अग्रवाल 

सहकारिता की भावना की सराहना के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाए गए कदमों का एक हिस्सा है। सहकारी संस्थाओं के अंतरराष्ट्रीय वर्ष का मूल विषय ‘सहकारी उद्यम एक बेहतर विश्व का निर्माण करते हैं’ सहकारी संस्थाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका – गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन तथा सामाजिक एकता का निर्माण – का परिचायक है क्योंकि अंततोगत्वा इनसे दुनिया बेहतर बनती है। सामाजिक विकास और सशक्तीकरण में सहकारिता की भूमिका को सभी ने स्वीकार किया है तथा भविष्य में यह भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण होने वाली है

आर्थिक संकल्पना के रूप में सहकारी आंदोलन का भारत में 100 वर्षों से अधिक का इतिहास है। भारत में सहकारी आंदोलन का उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध की दुर्भिक्ष की परिस्थितियों के कारण कृषि क्षेत्र में उत्पन्न हुए असंतोष तथा किसानों के वित्तपोषण के लिए संस्थागत संरचनाओं के अनुपलब्ध होने के कारण सरकारी नीति के रूप में हुआ। सहकारी ऋण समिति अधिनियम, 1904 में कृषि सहकारी संस्थाओं के गठन की परिकल्पना की गई। 

सहकारिता  को “संयुक्त स्वामित्व वाले और लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रित उद्यम के माध्यम से अपनी आम आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक जरूरतों एवं आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये स्वेच्छा से एकजुट व्यक्तियों के स्वायत्त संघ” के रूप में परिभाषित करता है।

सहकारी आंदोलन का प्रारंभिक चरण (1904-11)

भारत में पहला सहकारी अधिनियम:

वर्ष 1912 का सहकारी समिति अधिनियम:

मैक्लेगन समिति:

सहकारी समितियों के संबंध में गांधीवादी समाजवादी दर्शन: 

स्वतंत्रता के पश्चात् सहकारी आंदोलन    

FYPs का भाग: 

सहकारिता की राष्ट्रीय नीति: 

एनसीडीसी की स्थापना:

सहकारिता के लिये गठित समितियाँ: 

भारत में सफल सहकारी समितियाँ:

सहकारी क्षेत्र के समक्ष मुद्दे: 

भारत में सहकारी ऋण की संरचना को व्यापक रूप से दो हिस्सों. नामतः ग्रामीण और शहरी में विभाजित किया जा सकता है। मार्च 2012 के अंत की स्थिति के अनुसार देश के 328 जिलों में शहरी सहकारी संरचना में 1.618 शहरी (प्राथमिक) सहकारी बैंक शामिल हैं जिनकी 8,235 शाखाएं फैली हुई हैं। दूसरी तरफ, भारत की ग्रामीण सहकारी संरचना के अंतर्गत 94,531 सहकारी संस्थाएं शामिल हैं जिन्हें अल्पावधि और दीर्घावधि श्रेणी में श्रेणीबद्ध किया गया है। 

सहकारिता की भावना की सराहना के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाए गए कदमों का एक हिस्सा है। सहकारी संस्थाओं के अंतरराष्ट्रीय वर्ष का मूल विषय ‘सहकारी उद्यम एक बेहतर विश्व का निर्माण करते हैं’ सहकारी संस्थाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका – गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन तथा सामाजिक एकता का निर्माण – का परिचायक है क्योंकि अंततोगत्वा इनसे दुनिया बेहतर बनती है। सामाजिक विकास और सशक्तीकरण में सहकारिता की भूमिका को सभी ने स्वीकार किया है तथा भविष्य में यह भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण होने वाली है।

● स्थानीय ग्राहकों की विशाल संख्या, सहज पहुंच नजदीक स्थित मित्र के रूप में प्रतिष्ठा शहरी सहकारी बैंकों की शनि हैं जिनके कारण वे वित्तीय समावेशन के विस्तार और सघनीकर- का काम कर सकते हैं। शहरी सहकारी बैंकों के माध्यम से वित्तीय

. पहले के चरणों में सहकारी बैंकों को बैंकिंग कंपनी अधिनियम,1949 के क्षेत्राधिकार से विशेषरूप से बाहर रखा गया था क्योंकि वे बैंकिंग कंपनी नहीं हैं। बैंकिंग विनियमन अधिनियम को शहरी सहकारी बैंकों पर जब 1966 में लागू किया गया, तब लगभग 1100 शहरीसहकारी बैंक थे जिनकी कुल जमा और अग्रिम राशि क्रमशः ₹1.67बिलियन तथा ₹1.53 बिलियन थी। संख्या, आकार और प्रचालन कीव्यापकता की दृष्टि से तब से अब तक जबरदस्त वृद्धि हुई है। 1996के अंत की स्थिति के अनुसार शहरी सहकारी बैंकों की संख्या बढ़कर1501 और उनकी जमा और अग्रिम राशि काफी बढ़कर ₹241.61बिलियन और ₹179.27 बिलियन हो गई है। शहरी सहकारी बैंकोंका तेजी से विकास 2003 तक जारी रहा जब उनकी संख्या बढ़कर1941 तथा उनकी जमा और अग्रिम राशि क्रमशः ₹1,015.46बिलियन एवं ₹648.80 बिलियन हो गई थी। उसके बाद, शहरीसहकारी बैंक क्षेत्र की कमजोरियों से निपटने के लिए हमारे समग्रप्रयासों के कारण 2006 में शहरी सहकारी बैंकों की संख्या घटकर1,853 रह गई। परिणामस्वरूप इस क्षेत्र की संरचना पहले से बहुतबेहतर हो गई है मार्च 2012 की स्थिति के अनुसार 1618 शहरी सहकारी बैंक हैं जिनकी कुल जमा राशि ₹2,385 बिलियन तथा कुल अग्रिम राशि ₹1580 बिलियन है।

(लेखक मध्य प्रदेश के वरिष्ठ सहकारी नेता और जिला सहकारी संघ के पूर्व मानसेवी सचिव रहे हैं)

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