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चुनाव में भ्रष्टाचार और महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा

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सनत कुमार जैन

20 साल बाद सरकारों के खिलाफ जनरोष देखने को मिल रहा है। 2003 के बाद से राज्य सरकारों के खिलाफ नाराजी दिखना बंद हो गई थी। वैश्विक व्यापार संधि के बाद 2004 के बाद से आर्थिक हालातो में बड़ी तेजी के साथ सुधार हुआ था। राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को टैक्स की आय कई गुना बढी थी। केंद्र एवं राज्य सरकार के पास सरप्लस धन उपलब्ध था। केन्द्र एवं राज्य सरकारों को अन्तर्रास्ट्रीय संस्थाओं से बड़ी मात्रा में योजनाओं के लिए कर्ज मिलना शुरु हुआ था।

आम जनता को भी बैंकों से लोन मिलना शुरू हो गया था। लोन पर मकान, टीवी, फ्रिज, मोटरसाइकिल, कार,मोबाइलफोन एवं अन्य सामान आसानी से उपलब्ध होने लगे थे। जिसके कारण आम जनता और सरकारें स्वर्ग के झूलों में झूलने लगी थी। जो चाहती थी, वह कर पाती थी। एकाएक बड़े हुए धन प्रवाह ने भ्रष्टाचार को भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ाया। राजनेताओं और शासकीय कर्मचारी और अधिकारियों की सोच और कामकाज करने का तरीका बदल गया। राजनेताओं ने, अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति में भारी पैसा लेना शुरू कर दिया। इसकी वसूली रिश्वत के रूप में सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों ने आम जनता से की। योजनाओं के क्रियान्वय के लिए भारी दाम सरकारों को मिला।

कमीशन की बसूली भी अधिकारियों के माध्यम से राजनेता तक पहुंची। भ्रष्टाचार की विषबेल पिछले 20 सालों में गांव गांव तक निचले स्तर पर पहुंच गई है। राजनेता भ्रष्टाचार का ठीकरा सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों पर फोड़ देते हैं। जनता की नजरों में राजनेता ईमानदार बने रहते हैं। नेताओं के ऐश्वर्य को देखकर अब इस खेल को जनता भी समझ गई है। नेताजी फोन कर देते हैं, उसके बाद भी बिना पैसे दिए आम जनता के कोई काम नहीं हो रहे हैं। हर काम के लिए लोगों को रिश्वत देनी पड़ रही है। सरकारी अधिकारी और कर्मचारी भी बेलगाम घोड़े की तरह रिश्वत तथा भ्रष्टाचार की वसूली के लिए यहॉ से वहॉ दौड़ रहे हैं। आम जनता की सुनवाई कहीं नहीं हो रही है। पहली बार जनता के बीच में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को लेकर बड़े पैमाने पर खुलकर नाराजी देखने को मिल रही है। जनता भी अब यह मानने लगी है, कि नेताजी ही सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों की नियुक्ति कराते हैं।

नेताजी के पास जाने के बाद भी यदि उनका काम बिना पैसे लिए नहीं हो रहा है। अधिकारियों और कर्मचारियों को नेताजी का संरक्षण है। यह जनता आप खुलकर बोलने लगी है। आम जनता में दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई का बनकर सामने आया है। जिस तरीके से पिछले तीन-चार वर्षो में महंगाई बढ़ रही है। टैक्स का बोझ भी आम जनता पर हर साल बढ़ता ही जा रहा है। गरीबों से भी अब जीएसटी के नाम पर 18 से 28 फ़ीसदी टैक्स वसूला जा रहा है। शराब, सिगरेट, गुटका एवं पेट्रोल में सबसे ज्यादा वसूली गरीबों से की जा रही है। मंहगाई और भ्रष्टाचार को लेकर नाराजी अब जनता के बीच चुनाव के दौरान मुखर हो रही है। मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं अन्य राज्यों में नौकरियों में भ्रष्टाचार हो रहा है। परीक्षाएं समय पर नहीं हो रही हैं, पेपर लीक हो रहे हैं। सरकार के खाली पदों पर भर्ती नहीं की जा रही है। छोटे-छोटे से पद के लिए 5 से 10 लाख रुपए की रिश्वत मांगी जा रही है। इस बार विधानसभा चुनाव में सरकार के खिलाफ बड़ी नाराजी देखने को मिल रही है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है, कि राज्य सरकार के साथ-साथ अब केंद्र सरकार के बारे में भी जनता की नाराजी महंगाई और बेरोजगारी के रूप में देखने को मिल रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के वर्तमान रुझान को देखने से लगता हैं, कि यह चुनाव नाराजी के साथ सरकार के खिलाफ होंगे। 1990 और 2003 के बीच में यह स्थिति राज्यों में देखने को मिलती थी। 20 वर्ष बाद एक बार फिर यही नाराजी मतदाताओं के बीच देखने को मिल रही है।

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