पुष्पा गुप्ता
_मुहम्मद शाह रंगीला दिहली के तख्त पर काबिज था जब नादिरशाह ने अपना हरकारा हिन्दोस्तान भेजा। 'खल्क खुदा की मुल्क तुम्हारा' कहते हुए हरकारे ने कहा :_
"हुजूर! हमें आपके तख्तो-ताज से कोई मतलब नहीं है। शाह अपने ईरान में खुश हैं। आप हिन्दोस्तान में खुश रहिये। बस ये जो अफगानिस्तान- ईरान सरहद पर आपके अफगानी सिपाही उत्पात करते हैं,उसे रुकवाइये और जल्द अज जल्द रुकवाइये। मुझे यानी हरकारे को जल्द वापस भेजिए।"
बादशाह मुहम्मद शाह रंगीले ने अपने वज़ीर से कहा-
“निज़ाम उल मुल्क! अभी हम कृष्ण के पद को ख्याल की बंदिश पर उतार रहे हैं। बड़ा मुश्किल काम है। वक्त लगता है। हरकारे की बात सुन लो। काम निपटा तो दो,मगर हरकारे को एक साल नजरबंद रखने के बाद छोड़ो। इसने बीच मे आकर मेरे ख्याल की बंदिश तोड़ दी है। इस नामाकूल को क्या मालूम कि ख्याल क्या है। अब पता नही कब वह बंदिश जेहन मे आये!”
ले जाओ इसे, ले जाओ निज़ाम उल मुल्क!कह कर बादशाह फिर अधम बाई के रानों की मसनद पर लेट गए। ख्याल आने जाने लगे।
निज़ाम उल मुल्क। यानी बादशाह के वजीर और असली सर्वेसर्वा। निज़ाम उल मुल्क ने हरकारे के कंधे में हाथ डाला और उससे यारी गांठते हुए आगे की ओर बढ़ गए। रास्ते में ही पूछा-
“क्या दिक्कत है तुम्हारी?”
हरकारे ने कहा-
“हजूर, दिक्कत ईरान अफगानिस्तान सरहद पर के आपके सिपाहियों को है।आप उन्हें महाना तनख्वाह नहीं देते और वो ईरान की सीमा में घुस कर लूटपाट करते हैं। शाह ने प्यार से समझाया है,समझ जाइए।अगर शाह इधर को बढ़ आया तो दिक्कत दिल्ली को हो जाएगी।”
“चल पगले! दिल्ली बहुत दूर है। शाह के फ़रिश्ते भी नहीं आ पाएंगे।और अगर आने की सोची भी तो अफ़ग़ान सरहद पर हमारे सिपाही क्या फाके खा रहे हैं?”
हरकारे ने कहा-
“फाके ही खा रहे हैं हुजूर! आपने आठ महीने से तनख्वाह दी है उन्हें?”
निजाम यह सुनकर सुट्ट हो गए। सुट्ट! इतनी भीतरी बात इस हरकारे को कैसे पता!
हरकारे ने कहा-
“चौंकिए मत।यह कोई दबी छुपी बात नहीं है। यह मुझे ही नहीं पूरे अफगान-ईरान को पता है। खाली पेट मे भूख बसती है निज़ाम, राज नहीं। राज करना है तो रोजगार दो।”
हें हें हें करते हुए निजाम उल मुल्क ने लाज पचायी और फिर कहा- “दरअसल बंगाल से धान की मालगुजारी अभी नहीं आयी। आते ही अफगानों के बारे में सोचेंगे। वो खाते भी तो कितना हैं!”
हंसा हरकारा और बोला-
“उससे पहले शाह आ पहुंचा तो!”
अबकी हंसे निजाम-
“वह तब पहुंचेगा जब तू पहुंचेगा। चल तुझे आहनी सलाखें दिखाता हूँ।”
अट्टहास किया हरकारे ने-
“भूखे पेट सरहदें नहीं बचती निज़ाम। दिन गिन!”
दिन गिने जाने लगे।
और वह दिन भी आया। 09 मई 1738 का दिन। जब नादिर शाह ने अफगानिस्तान के सूबेदार ज़कारिया खान के सैनिको को महज दो बोरी रसद दी और एवज में अफगानिस्तान का मजबूत दुर्ग बिना खून बहाए बेध दिया।
हरकारे की आवाज पूरे शाहजहानी में गूंजती रही :
“भूखे पेट सरहदें नहीं बचती निज़ाम, दिन गिन।”
(चेतना विकास मिशन)

