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*पूंजीवाद : कहीं वज़ूद न खो दें लघु इकॉनमी वाले मुल्क*

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             पुष्पा गुप्ता

    एक बहुत बड़ा संकट दुनिया का दरवाजा खटखटा रहा है, लेकिन जो लोग भी इससे निपटने के लिए कुछ कर सकते हैं, वे इसकी तरफ आंखें मूंदे बैठे हैं। यह संकट कई विकासशील देशों के एक कतार से दिवालिया हो जाने का है, जिसकी अनदेखी करते हुए फिलहाल अमेरिका की कर्ज सीमा ही सबकी दिलचस्पी का सबब बनी हुई है।

        पिछले साल हमने पड़ोसी मुल्क श्रीलंका को आर्थिक संकट और अराजकता से गुजरते देखा था। लेकिन अफ्रीका में तो ऐसी ही या शायद इससे भी बुरी हालत में पहुंच रहे देशों की लाइन लगी हुई है। और यह मामला अफ्रीका तक सीमित नहीं है। वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के मुताबिक, 60 फीसद उभरती अर्थव्यवस्थाओं का अभी यही हाल है।

          अफ्रीका के कुछ चर्चित मामलों पर नजर डालें तो सबसे पहले सन 2020 में जांबिया ने वहां विदेशी कर्जों की अदायगी में असमर्थता जाहिर की। उसके कर्जों की रीस्ट्रक्चरिंग का मामला आज भी सुलटा नहीं है, लेकिन पिछले साल घाना में इससे भी बड़े दिवालियेपन का मामला जरूर उभर आया है।

आईएमएफ ने विदेशी कर्जदाताओं को घाटा सहकर ज्यादा देर में कर्ज वापसी के लिए मना लेने के बाद काफी सख्त शर्तों के साथ कुछ नए कर्जे भी घाना के लिए जारी किए हैं। लेकिन विदेशियों का तीनगुना कर्जा वहां घरेलू कर्जदाताओं- बैंकों और बीमा कंपनियों का है, जिनके लिए कर्जमाफी का मतलब यह होगा कि दिवालियापन सरकार से हटकर घर-घर की कहानी बन जाएगा। 

      बहरहाल, इन दोनों देशों से ऊपर अभी हाल में केन्या की रिपोर्ट आई है कि उसकी कुल सरकारी आय का 70 फीसदी हिस्सा फिलहाल कर्ज और ब्याज की अदायगी में जा रहा है और अगले साल आ रही यूरोबॉन्ड की एक बड़ी देनदारी किसी भी हाल में उसके बूते से बाहर रहेगी।

         इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस का कहना है कि आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक को केन्या जैसे देशों के कर्ज संकट का निदान उनके हाथ खड़े करने से पहले शुरू कर देना चाहिए, क्योंकि एक बार दिवालिया घोषित हो जाने के बाद अर्थव्यवस्था लंबे समय के लिए ठप हो जाती है। 

      मामला दो-चार विकासशील देशों का न होकर 60 फीसदी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के संकटग्रस्त होने का है तो दुनिया को फ्रेम से बाहर निकलकर सोचना होगा, क्योंकि आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक में सबको उबारने का बूता नहीं है।

इतने बड़े पैमाने पर आ रहे संकट की वजह सीधी है। 2008-09 की मंदी के बाद सारी सरकारों ने, खासकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने उद्योग-व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सस्ते कर्जे बांटे और इन्फ्रास्ट्रक्चर के लंबे-चौड़े काम शुरू कर दिए। 

       ग्लोबलाइजेशन अपनी रफ्तार से चलता रहता तो जल्द ही इन निवेशों पर रिटर्न आने लगता और धीरे-धीरे कर्जे सधा दिए जाते। लेकिन पहले 2017 से शुरू हुए डॉनल्ड ट्रंप के संरक्षणवादी उपायों से विश्व व्यापार बाधित हुआ, फिर 2020 की पहली तिमाही बीतने के साथ कोरोना की विश्वव्यापी बंदी शुरू हो गई।

         दो साल की इस ऐतिहासिक अड़चन के बाद थोड़ी सांस आनी शुरू हुई तो यूक्रेन में एक छोटे स्तर का ‘प्रॉक्सी वर्ल्ड वॉर’ ही शुरू हो गया। कच्चा तेल, खाद्यान्न और कर्ज, तीनों की एक साथ महंगाई ने छोटी अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ दी। 

      इस क्रम में कुछ देशों की व्यवस्थागत कमजोरियां भी सामने आने लगीं, जो सामान्य स्थिति में शायद ज्यादा देर तक छिपी रह जातीं। इसका एक ज्वलंत उदाहरण हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान है जहां विदेशी कर्ज के मोर्चे पर आईएमएफ की मदद और चीन की दरियादिली के बावजूद अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीति और विदेशी मुद्रा संकट की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।

 उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में एक साल के अंदर 35 प्रतिशत से भी ज्यादा की बढ़त वहां अराजकता की शक्ल में सड़कों पर फूट पड़ी है, हालांकि इसे राजनीतिक विरोध का ही कहा जा रहा है।

      कुछ बड़े अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के डूबने के साथ शुरू हुई पिछली महामंदी को जी-20 के मंच से बनी समझदारी के जरिये दो साल के अंदर ही संभाल लिया गया था। फिर भी 2014-15 तक कई अर्थव्यवस्थाओं पर कर्ज का संकट मंडराता रहा। ग्रीस तो लगभग दिवालिया ही हो गया था। अभी काफी दुर्गति झेलने के बाद यूरोपियन यूनियन की कोशिशों से वह धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा है। 

      उससे मिलता-जुलता संकट दक्षिणी यूरोप के चार और देशों पुर्तगाल, स्पेन, इटली और आयरलैंड पर भी था लेकिन धीरे-धीरे उनपर बात होनी बंद हो गई। इस लिहाज से दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर अभी मंडरा रहे संकट को बढ़ता हुआ माना जाए या घटता हुआ? इस बारे में अभी एक ही बात साफ ढंग से कही जा सकती है कि संकट का एक सिरा यूक्रेन युद्ध से जुड़ा है।

 जैसे ही यह खबर आएगी कि लड़ाई खत्म हो सकती है, वैसे ही हालात काबू में आने शुरू हो जाएंगे। दुनिया का दुर्भाग्य यह कि अभी ऐसा कोई संकेत ही कहीं से नहीं मिल रहा है। 

      जैसी खबरें आ रही हैं, दोनों पक्ष आने वाले दिनों में लड़ाई को ज्यादा बड़े पैमाने पर ले जाने की तैयारी में जुटे हैं। अमेरिकी खेमे ने यूक्रेन के लिए टैंकों और भारी मात्रा में गोले-बारूद की व्यवस्था कर दी है। एफ-16 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति की तैयारी चल रही है और इन्हें उड़ाने के लिए कई देशों में यूक्रेनी फाइटर पायलटों की ट्रेनिंग भी जारी है।

        बस, जवाबी हमले का इंतजार है। दूसरी ओर रूस ने चीन और सऊदी अरब से अपने रिश्ते और मजबूत करके लड़ाई लंबी से लंबी खींचने की व्यवस्था कर ली है।

      सवाल यह है कि जब शांतिवार्ता के लिए एक न्यूनतम माहौल बनाने में ही दोनों पक्षों की दिलचस्पी नहीं है, तो लड़ाई खत्म होने का मामला कहां बनता है?

       इस लड़ाई के ज्यादातर बिल अमेरिका की ओर से ही फाड़े जाते रहे हैं, लिहाजा सबकी उम्मीदें अमेरिकी चुनाव पर टिकी हैं। यूक्रेन युद्ध पर आने वाला खर्चा अगर वहां चुनावी मुद्दा बनता हुआ लगा तो शायद 2024 की पहली तिमाही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के रुख में नरमी देखने को मिले।

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