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देश का लोकतंत्र : संवैधानिक सामंतशाही*

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सेवा के नाम पर राजनीति—धन कमाने का साधन*

हरनाम सिंह

           देश में आए दिन सांसदों और विधायकों द्वारा वेतन वृद्धि की माँग उठती रहती है। यह सुनकर आम जन चकित रह जाता है कि सेवा के नाम पर सार्वजनिक जीवन में आए लोगों ने चुनावी राजनीति को लाभ कमाने का साधन कैसे बना लिया है। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों को मिलने वाले वेतन तथा अत्यधिक सुविधाओं के कारण आज के शासकों की तुलना सामंतकालीन राजाओं, ज़मींदारों और जागीरदारों से की जाने लगी है।

           इसके बावजूद देश में ऐसे राजनीतिक दल और उनके सदस्य भी हैं, जो निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के वेतन-वृद्धि ही नहीं, बल्कि जनसेवा के नाम पर मिलने वाली किसी भी अतिरिक्त सुविधा को अनैतिक मानते हैं। विडंबना है कि उनकी आवाज़ झूठ और प्रचार के शोर में दबा दी गई है।

          लोकतंत्र का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि उसने सामंतवाद को समाप्त कर दिया है। वास्तविकता यह है कि देश में आज सामंतवाद को संवैधानिक स्वरूप प्रदान कर दिया गया है। वर्तमान शासक स्वयं को ‘जनसेवक’ कहते हैं, पर उनकी विलासपूर्ण जीवनशैली और विशेषाधिकार यह प्रमाणित करते हैं कि उन पर होने वाला राज्य व्यय किसी राजा पर होने वाले व्यय से कम नहीं है।

          देश में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद और विधायकों को भारी वेतन के साथ-साथ भव्य सरकारी आवास, कड़ा सुरक्षा घेरा, सरकारी वाहन, हवाई यात्राएँ, निजी स्टाफ, उच्चस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएँ, आजीवन पेंशन तथा मृत्यु के बाद परिजनों को पेंशन जैसी सुविधाएँ प्राप्त हैं। इन सबने उन्हें आधुनिक युग के राजा में बदल दिया है।

           औपनिवेशिक शासन से मुक्ति और लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाने के बावजूद देश में सत्ता का वर्गीय चरित्र सामंतकालीन ही बना हुआ है। राजशाही में राजा यह दावा नहीं करता था कि वह सेवक है। उस दौर में शोषण खुला और स्वीकार्य था। बिना किसी जुमले के रियाया से बेगार ली जाती थी। महल, किले और सैकड़ों सेवकों पर होने वाला खर्च जनता से वसूले गए लगान से पूरा होता था। राज्य का धन राजा और उसके अधीन सामंतों के ऐश्वर्य पर व्यय होता था। क्या आज भी ऐसा कुछ नहीं हो रहा है?

       सामंतकाल में राजा आजीवन सुविधाओं का अधिकारी होता था। वर्तमान लोकतंत्र के जनप्रतिनिधियों ने कानून बनाकर वही अधिकार अपने लिए सुरक्षित कर लिए हैं। उस दौर में राजा जनता द्वारा निर्वाचित नहीं होता था, इसलिए उसकी सुरक्षा का तर्क दिया जाता था। आज लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है। निर्वाचित होने के पश्चात वे अपने ही मतदाताओं से भयभीत बताएं जाते हैं, और उनकी सुरक्षा को ‘राष्ट्रीय आवश्यकता’ बताया जाता है। राजाओं की तलवारें अब एसपीजी सुरक्षा और प्रोटोकॉल में बदल चुकी हैं।

          लोकतंत्र की कसौटी केवल चुनाव नहीं होते; शासकों और जनता के जीवन स्तर की समानता भी लोकतंत्र की प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। किंतु आज दोनों के बीच एक स्थायी और गहरी खाई बन चुकी है। शासकों द्वारा भोगे जा रहे ऐश्वर्य के कारण आम जनता नाराज़ तो है, परंतु उसके सामने  विकल्पहीनता है। प्रचार के घटाघोप में मतदाता तय ही नहीं कर पाता कि वह किस जन सेवक को पहचाने और चुने।

लोकतांत्रिक राजा : कुछ तथ्य*

          देश के राष्ट्रपति को पाँच लाख और उपराष्ट्रपति को चार लाख रुपये मासिक वेतन मिलता है। इसके अतिरिक्त उन्हें सरकारी आवास, स्टाफ, वाहन और चिकित्सा सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। सेवानिवृत्ति के बाद वेतन आधा हो जाता है, किंतु अधिकांश सुविधाएँ बनी रहती हैं।

         प्रधानमंत्री का मासिक वेतन मात्र एक लाख साठ हजार रुपये है, किंतु उनकी सुरक्षा, यात्राओं, स्टाफ और आवास पर होने वाले व्यय को जोड़ दिया जाए तो वे देश के सबसे अधिक खर्चीले ‘जनसेवक’ सिद्ध होते हैं। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का उच्च वेतन, पेंशन और विशेषाधिकार यह दर्शाता हैं कि पद छोड़ने के बाद भी राज्य के संसाधनों पर उनकी पकड़ बनी रहती है।

सांसदों की सुविधाएँ*

        संसदीय लोकतंत्र के संरक्षक    लोकसभा अध्यक्ष को ढाई लाख रुपये मासिक वेतन मिलता है। वहीं सांसदों का मूल वेतन एक लाख रुपये प्रति माह है, जो कार्यकाल और पुनर्निर्वाचन के साथ बढ़ता जाता है। उन्हें 70 हजार रुपये मासिक संसदीय भत्ता भी मिलता है।

     देश की राजधानी दिल्ली में मात्र 1500 रुपये मासिक किराये पर बंगला या फ्लैट उपलब्ध कराया जाता है। वर्ष में 34 हवाई यात्राओं और प्रथम वातानुकूलित श्रेणी में असीमित रेल यात्रा की सुविधा मिलती है। एक स्थायी फोन, दो मोबाइल और डेढ़ लाख कॉल यूनिट निशुल्क मिलते हैं। सरकारी खर्च पर चार निजी सहायक रखे जा सकते हैं। सांसद और उनके परिवार को निशुल्क चिकित्सा सुविधा प्राप्त होती है। औसतन एक सांसद पर प्रतिवर्ष 45 से 70 लाख रुपये तक खर्च होता है।

विधायकों को मिलने वाली सुविधाएँ*

       देश की विभिन्न विधानसभाओं में विधायकों का वेतन 30 हजार रुपये से लेकर सवा लाख रुपये तक है। निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 20 से 70 हजार रुपये मासिक तथा सत्र के दौरान प्रतिदिन 1500 से ढाई हजार रुपये तक दिया जाता है। विधायक के निधन के बाद उनके पति या पत्नी को पेंशन मिलती है।

         राज्य की राजधानी में सरकारी आवास, वाहन या यात्रा भत्ता, राज्य के भीतर रेल, बस और हवाई यात्रा की निशुल्क सुविधा उपलब्ध होती है। पेट्रोल-डीज़ल हेतु डेढ़ से तीन लाख रुपये तक दिए जाते हैं। दो निजी सहायक सरकारी खर्च पर रखे जा सकते हैं। एक विधायक पर औसतन 18 से 40 लाख रुपये प्रतिवर्ष व्यय होता है। देश में 4000 से अधिक विधायक हैं—उन पर होने वाले कुल व्यय का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

वामपंथ का विरोध*

          इतनी भारी सुविधाओं और वेतन के बावजूद वेतन वृद्धि की माँग करना करोड़ों मेहनतकशों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है। एक दिहाड़ी मज़दूर, जो जीवनभर श्रम करता है, न पेंशन पाता है, न चिकित्सा सुविधा और न ही सेवानिवृत्ति लाभ। इसके विपरीत, मात्र पाँच वर्षों का कार्यकाल पूरा करने वाला विधायक और उसका परिवार जीवनभर पेंशन और सुविधाओं का अधिकारी बन जाता है।

           वेतन और पेंशन के प्रश्न पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसे दल अपने मतभेद भुलाकर एकमत हो जाते हैं। इसके विपरीत, वामपंथी दल जनप्रतिनिधियों को मानदेय देने और उसमें वृद्धि का लगातार विरोध करते आए हैं। कभी-कभी समाजवादी या जनआंदोलनों से जुड़े दल भी इसका विरोध करते हैं।

          मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और फॉरवर्ड ब्लॉक जैसे दलों का स्पष्ट मत है कि जनप्रतिनिधि सेवा के लिए होते हैं, पेशेवर लाभ के लिए नहीं। जब मज़दूरों और कर्मचारियों की आय नहीं बढ़ती, तब सांसदों और विधायकों द्वारा वेतन वृद्धि की माँग अनैतिक है। उनका मानना है कि वेतन वृद्धि धीरे-धीरे प्रतिनिधित्व को विशेषाधिकार में बदल देती है और लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था को सामंतशाही में रूपांतरित कर देती है—जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

हरनाम सिंह

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