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नये सन्दर्भों में….गाय

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सुनील यादव

गाय एक शुद्ध-स्वभाव का जानवर है । जिसे हिन्दू धर्म में माता का स्थान दिया गया है । गाय का समाजीकरण या राजनीतिकरण 19वीं शताब्दी में आर्यसमाजी दयानन्द सरस्वती जी के गोरक्ष अभियान से शुरू होता है जो 21वीं सदी में आकर अपने गर्तोत्कर्ष को प्राप्त करता है । गाय के प्रति मानुश्विक संवेदना का एक सामाजिक कारण भी है । गाँव में किसानी का सबसे जरुरी अंग बैल था जो गाय से ही पैदा होता है । बैल के बिना उत्तर भारत में खेती की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । दूसरी बात इसकी शुद्ध-प्रवीत्ति की वज़ह से पालतू बनाने में भी कोई हर्ज नहीं होता था । घर पर बीबी बच्चे भी बड़ी आसानी से इसका रख-रखाव, प्यार-दुलार कर सकते हैं । इसका खान-पान भी अन्य जानवरों की अपेक्षा भारी-भरकम नहीं है । ब-मुश्किल चार या पांच साल पहले तक हर दूसरे या तीसरे गाँव में विशेष कर अहिरों के गाँव में गायों की सामूहिक गोलबंदी कर पालन किया जाता था । परन्तु अचानक से टैक्टर और रासायनिक खेती तथा सरकार के गौ -संरक्षण नीति और राजनीतिक रवैये की वज़ह से यह व्यवसाय अचानक निर्थक एवं अनुपयुक्त हो गया । चुकी जो देशी गायें होती हैं वह बड़ी कम मात्रा में दूध देतीं है तो सिर्फ दूध के लिए इसका पालन ग्रामीण क्षेत्रों में होना बंद हो गया है । सरकारों के राजनीतिक रवैये और गौ-संरक्षण नीति ने इससे होने वाले मांस व्यापार को पूर्ण रूप से नेस्तनाबूत कर दिया । जिससे गाय, किसान और गाँव के लिए एकदम से निरर्थक हो गयीं । दूसरी बात समाज में जो लाभकारी-वर्क का न्यू-जनरेशन पैदा हुआ वह किसी भी काम को उससे होने वाले हानि-लाभ को ध्यान में रखते हुए ही करता है । ऐसे में गाय पूर्ण रूप से निरर्थक तथा अलाभकारी हो गयी । जिससे उनको पालने की प्रक्रिया पूरी तरीके से ध्वस्त हो गयी । एक कहावत है ‘भूखे पेट भक्ति नहीं होती’ तो नुकसानदायी सौदा क्यों पाला जाए सिर्फ धार्मिक चलन की वज़ह से ।
गायों के दुर्दशा में मुख्य रूप से तीन कारण उत्तरदायी हैं ।
पहला- बैलों से खेती का न होना और रासायनिक खेती का प्रचलन ।
दूसरा- सरकार की गौ-संरक्षण नीति और राजनीतिक रवैया ।
तीसरा- लाभ का समाज ।

बैलों से खेती न होने के बाद भी, पिछले दिनों प्रति बैल दस से पंद्रह हजार में बिक जाते थे जो सरकार की नीति और रवैये की वज़ह से पूरी तरह से निष्काम हो गए । यदि किसान गाय श्रद्धा और दूध बस पाल भी लेता तो उसके दो बच्चों के बीच का टाइम-गैप सिर्फ खिला कर पाले रखना घाटे का सौदा होता हैं क्योंकि खेती का सारा काम जब मशीन से और खाद की पूर्ति रासायनिक खाद से हो जा रही है तो चारा की समस्या और उसकी देख-रेख की समस्या प्रतिकूल है ऐसे में गाय पालन असम्भव कार्य है । और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात- उससे पैदा हुए बैल का क्या होगा जो एकदम निरर्थक है ? जैसा कि एक प्रवीत्ति के अनुसार गाय की अपेक्षा बैल ज्यादा पैदा होते हैं । ऐसे में गाँव का किसान और गरीब व्यक्ति क्योंकर गाय पाले ?
बड़े लोग तो गाय पालते नहीं वे सिर्फ गाय पर राजनीति करना जानते हैं और पालते कुत्ता हैं ।
अतः निष्कर्ष तौर पर देखा जाए तो इस गाय प्रकरण में सबसे ज्यादा किसी का नुकसान हुआ है तो वह है किसान और ख़ुद गाय का ।
किसान की पूँजी तो डूबी ही साथ में इनके छुट्टापन से उनकी फसले चौपट हो रहीं ।
और गाय जो चैन से किसान के घर जुगाली करती थी सरकार की नीति ने उसे सड़क पर ला कर पटक दिया जहाँ, एक्सीडेंट, पिटाई, भूखो रहना, तड़पना, कलपना, मरना नित जारी रहता है ।
हाँ! इसे पुरे प्रकरण में गाय राजनीतिक के केंद्र में रही यही उसके लिए सबसे बड़ी संतोष की बात है ।
एक बात जो और निकल कर सामने आती है वह है- जिस किसान की सबसे प्यारी चीज़ गाय थी उसी किसान की सबसे नफरती चीज़ आज गाय हो गयी ।
तथ्य:- जितना कष्ट गाय को इस सरकारी संरक्षण से हुआ उससे सौ गुना कम कस्ट पहले वाली व्यवस्था में था । न्यायालय की यह टिप्पणी उपरोक्त दुर्दशा में और बढ़ोत्तरी ही करने जा रही ।
मेरा मानना है किसी को तड़पाकर, रीरकाकर, भूखाकर रखने से सौ गुना बेहतर गोली मार देना है ।

सुनील यादव

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