शशिकांत गुप्ते
इनदिनों इन दो भारीभरकम अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन व्यवहार बहुत हो रहा है।
एक Credibility मतलब विश्वसनीयता और दूसरा Accountaility मतलब जबावदेही।
उक्त दोनों ही शब्दों का इस्तेमाल जब सियासत में भी होता है, तब बहुत ही आश्चर्य होता है।
Credibility मतलब साख भी होता है।
रुपये का अवमूल्यन होना यह किसकी जवाबदेही है? रुपये के अवमूल्यन के कारण साख किसकी गिरती है?
जब हम विपक्ष में होतें हैं,तब सत्ता में विराजमान प्रमुख के साथ देश की साख गिरने का ना सिर्फ आरोप लगातें हैं,बल्कि हम तात्कालिक सत्ता पर तंज कसतें हुए उसका माखोल उड़ाने में भी कोई कसर नहीं छोड़तें हैं?
अब हम स्वयं सत्ता में है और रूपया गिर रहा है। हम अपनी जवाबदेही और अपने उत्तरदायित्व से पल्ला झाड़तें हुए, अब भी हम विपक्ष को ही दोषी ठहराने का असफल प्रयास कर रहें हैं।
आज हम उत्तरदायित्व को भूल कर महामारी पर गम्भीरता से नहीं सोचतें हैं, जबतक हमें चुनावी रैलियां आयोजित करनी होती है।
जबतक हम विपक्ष की निर्वाचित सत्ता के कुछ बिकाऊ प्रतिनिधि क्रय कर सत्ता में विराजमान नहीं कर पातें हैं। तबतक लॉक डाउन की घोषणा नहीं करतें हैं।
हम अपने दायित्व का अपनी मानसिकता के अनुरूप निर्वाह करतें हैं। हम कभी भी विपक्षियों और सजग लोगों के प्रश्नों का उत्तर नहीं देतें हैं। इसे हम अपनी Credibility मतलब साख अर्थात शान समझतें हैं।
वर्तमान में हमारा उत्तरदायित्व मतलब Credibility हम सिर्फ वाकचातुर्य से प्रकट कर रहें हैं, और विज्ञापनों के माध्यम से अपनी जवाबदेही मतलब Accountability प्रस्तुत कर रहें हैं।
विज्ञापनों दर्शाई जाने वाली जवाबदेही ठीक,तन को गोरे बनाने के क्रीम के विज्ञापनों जैसी ही प्रतीत होती है।
यदि गोरे बनने की क्रीम कारगर होती तो,देश के दक्षिण के चारों प्रान्त के निवासी पाश्चात्य देश के रहवासी नज़र आने लगतें?
हम विपक्ष थे,तब हम चीन को मुंहतोड़ जवाब देने की अभिलाषा रखतें थे। ऐसी घोषणा करते थे,शत्रु से हम ना सिर्फ मुक़ाबला करेंगे, बल्कि एक के बदले दस सिर लाएंगे?
लेकिन दुर्भाग्य से पुलवामा कांड हो जाता है?
हम स्वयं सक्षम है, और हमारी प्रशासनिक व्यवस्था भी चुस्त है।
लेकिन एक झूलता पुल टूट जाता है। तकरीबन डेढ़ सौ देशवासी परलोक सिधार जातें हैं?
हाँ प्रशासनिक व्यवस्था बीमार अस्पताल को रंग रोगन कर तंदुरुस्त करने में जरूर मुस्तेद हो जाती है।
यह कैसे accoutability है?
इसी कारण वर्तमान व्यवस्था पर Credibility का प्रश्न उपस्थित होना स्वाभिवक है?
झूठ हमेशा रथ पर आरूढ़ होता है,और सत्य हमेशा पैदल चलता है। कारण झूठ के पांव नहीं होतें हैं।
अंत में यही कहा जा सकता है कि सत्य परेशान हो सकता है,लेकिन पराजित कभी नहीं होता है।
सांखिकी का सहारा लेकर अंकों के जाल में हम महंगाई को गायब करने का जादुई करिश्मा दिखातें हैं।
लेकिन आमजन की थाली में रोटी घटती जा रही है और आमजन की दाल पतली हो रही है
अंत यही कहा जा सकता है कि, कभी भी कौवा हंस की चाल चल ही नहीं सकता है।
जवाबदेही का लिए आत्मबल चाहिए,शारीरिक बल नहीं,और
विज्ञापनों में दर्शाई जानी वाली साख थोथी होती है यह भी कटु सत्य है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

