प्रस्तुति : डॉ. विकास मानव
श्मशान मेरे आकर्षण का केंद्र रहा है. कई लोगों का रहता है. सबके अपने- अपने कारण हैं. गांव में मेरा घर श्मशान घाट के इतना करीब है कि जब किसी का दाह संस्कार होता तो हमें छत से जलती चिता दिखती रहती. गरमी के दिन होते थे. बिजली अधिकतर आती नहीं थी. हम मच्छरदानी तानकर छत पर सोते. अगर शाम को कोई मुर्दा जलता तो फिर रात भर चिता में आग रहती.
मैं बहुत देर तक उस तरफ देखा करता था. घरवाले मना करते कि श्मशान घाट नहीं जाना और मैं जाता भी नहीं था मगर आकर्षण गहराता गया. फिर कई बार क्रिकेट खेलने के लोभ में चला गया.
श्मशान में खाली जगह बहुत थी तो वहां अच्छे से खेला भी जाता. मुझे याद है कि ऐसा भी हुआ जब हमारी गेंद किसी बुझती चिता की लकड़ियों में फंसी और हमने किसी दूसरी लकड़ी से उसे बाहर निकाला.
मेरे मन में जीवन-मृत्यु से संबंधित सवाल काफी पहले पैदा हो गए थे. वो शायद पहली क्लास रही होगी जब मुझे इस ख्याल ने झिंझोड़ दिया कि मौत मेरे मम्मी-पापा को भी नहीं छोड़ेगी. फिर मेरा नंबर आया. मैं गौर से सोचता था कि एक दिन मैं भी मर जाऊंगा. मुझे सब छोड़कर जाना होगा, वो भी ऐसी जगह जिसका कुछ पता नहीं कैसी है.
वहां क्या है. कुछ है भी या नहीं है. फिर इसी तरह एक लंबा सिलसिला निकल जाता. विचार के बाद विचार आते कि मुझे ये सब छोड़कर जाना पड़ेगा. अचानक घबराकर मैं कितनी बार मम्मी के ठीक बगल में जा बैठा. फिर भी कभी किसी से नहीं पूछा कि मौत क्यों आती है, उसके बाद क्या होता है, हम इससे कैसे बच सकेंगे.
अब याद किया करता हूं तो हैरानी होती है कि जाने क्यों छोटी सी उम्र में मैं मौत के बारे में सोच रहा था. पता नहीं कैसे इससे मेरा परिचय बहुत कम उम्र में हो गया था.
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सौभाग्य से काफी वक्त तक मेरे किसी परिजन की मौत नहीं हुई. लेकिन फिर मेरे मौसेरे भाई ने खुदकुशी कर ली. मैं शायद सोलह साल का था. वो मेरे करीब थे. उम्र में आठ-दस साल बड़े ही रहे होंगे. अक्सर मैं उनसे आध्यात्म, ध्यान, जन्म, पुनर्जन्म पर बातें करता था.
विवेकानंद, ओशो, गायत्री परिवार, बाइबिल, कुरआन, गीता पढ़ चुका था. कच्चा पक्का समझा भी था. वो मुझसे सवाल करते और मैं अपनी सीमित बुद्धि से कुछ ना कुछ जवाब पकड़ाता जाता. उनकी मौत के बाद जब मैं उनके बेडरूम में गया तब मैंने वो बेड देखा जहां उन्होंने खुद को गोली मारी थी.
गद्दे कहीं बाहर निकाल दिए गए थे. बेड की लकड़ी उनके गाढ़े खून से भीगी हुई थी. मैंने उसे देखा और फिर पास की मेज से ओशो की वो किताब उठा लाया जो वो अंतिम समय में पढ़ रहे थे. उन्होंने गोली भी खुद को बहुत सुबह मारी थी.
मैं उनके जाने पर रोया नहीं था. एक कौतुहल में था. सब देखता रहा. फिर उनकी अंत्येष्टि हुई तो याद नहीं श्मशान घाट क्यों नहीं गया. जो याद है वो ये कि लौटकर आने के बाद मौत से जुड़े सवाल और बुरी तरह अपनी ओर खींचने लगे.
फिर काफी साल बाद मेरे नाना गुज़र गए. नोएडा में नौकरी करता था. भागा-दौड़ा सीधा श्मशान पहुंचा. सारी अंतिम क्रिया देखता रहा. एक तरफ उनका शरीर अंतिम गति की ओर बढ़ रहा था दूसरी तरफ लोगों को हंसते, बोलते, देर होने जैसी शिकायतें करते सुन रहा था. मेरा मन दुखी था लेकिन चिता से लपटें उठते उठते मैं मुक्त महसूस करने लगा.
जो हुजूम श्मशान से निकल रहा था उसके बीच मैंने किसी को नहीं पाया जो ज़िंदगी- मौत के घिसे पिटे सवालों से जूझ रहा हो. मैं ये बेपरवाही देखकर खुद से सवाल करता रहा कि क्या मैं ज़रूरत से ज़्यादा इन बातों पर सोचता हूं?
इसी कड़ी में मुझे हमेशा गौतम बुद्ध से जुड़ा प्रसिद्ध प्रसंग याद आता रहा. राजकुमार सिद्धार्थ संन्यासी ना हो जाएं इसके लिए महाराज शुद्धोधन ने कड़े प्रयास किए थे. जन्म के समय एक साधु आसित ने भविष्यवाणी की थी कि सिद्धार्थ या तो महान राजा बनेंगे या महान पथ प्रदर्शक. इसके बाद पिता ने पुत्र के संन्यासी होने की सभी संभावनाएं खत्म करने का प्रयत्न किया.
हर प्रकार के भोग विलास से उन्हें घेर लिया. संवेदनशील सिद्धार्थ भोग विलास के बीच थे किंतु विरक्त से थे. फिर एक दिन वो अपने सारथी के लिए नगर घूमने निकले. पहले से सब व्यवस्था करवा दी गई कि राजकुमार को मनोहारी दृश्य ही दिखें लेकिन उस दिन प्रकृति ने ही कुछ ठानी थी. सिद्धार्थ को रास्ते में बूढ़ा आदमी दिखा.पहले कभी उन्होंने इतने बूढ़े आदमी को देखा नहीं था सो सारथी से उसके बारे में पूछा कि ये झुक कर क्यों चल रहा है और कांप भी क्यों रहा है. सारथी ने बता दिया कि ये तो जीवन की एक अवस्था भर है.
हैरान सिद्धार्थ ने उत्सुकता से पूछा कि क्या मैं भी इस अवस्था को प्राप्त होऊंगा. सारथी ने सरल और सच्चा जवाब दे दिया. फिर उन्हें एक रोगी दिखा. उसकी हालत देखकर सिद्धार्थ को कुछ अटपटा लगा. उसके बारे में पूछा तो पता चला कि रोग किसी को भी जकड़ सकता है. फिर एक शवयात्रा दिखी. सिद्धार्थ ने कभी किसी मृत व्यक्ति को देखा नहीं था.
सारथी ने ही बताया कि ये भी एक अवस्था है और दरअसल अंतिम है. सिद्धार्थ को सोचकर धक्का लगा कि मृत्यु उनकी भी होगी. इन दृश्यों को देखकर विचलित सिद्धार्थ आगे बढ़े तो किसी प्रसन्न संन्यासी के दर्शन हो गए. सारथी से उसके बारे में पूछा तो मालूम पड़ा कि ये संसार से मुक्त है. राजकुमार को उसके प्रति आकर्षण जागा. उन्हें लगा कि जब सभी को बूढ़ा होकर अशक्त होना है. बीमार होकर शरीर का वैभव खोना है.
मरकर संसार से चले जाना है तब कोई कैसे इन सबसे बेपरवाह रह सकता है? इससे पहले कि मौत दबोचे कुछ सवालों के जवाब खोज ही लिए जाने चाहिए.
मेरे घर के ठीक सामने श्मशान घाट है. इरफ़ान की मौत के दिन यानि कल भी यहां किसी का अंतिम संस्कार किया गया था. मेरी आदत है, बीच बीच में खिड़की से झांक लिया करता हूं. कई बार रात के घुप्प अंधेरे में एकाध जल रही लकड़ी दिख जाती है.
बनारस गया था तो भी मणिकर्णिका घाट गया ही था, सारनाथ भी पहुंचा था. एक बात मैंने हमेशा पाई कि जो अक्सर श्मशान जाते रहते हैं वो बड़े लापरवाह हो जाते हैं. हंसते हैं, खैनी रगड़ते हैं. कभी-कभार वाले स्वाभाविक तौर पर थोड़ा सा असहज रहते हैं.
अंतिम संस्कार करानेवाले तो बिलकुल ऐसी अवस्था में होते हैं जैसे कपड़े की दुकान पर पैंट शर्ट दिखाने वाले रहते हैं, बिल्कुल निर्लिप्त. खटाखट काम निपटाते हैं. मैं उनकी सहजता समझता हूं. ये उनको मिले किसी ज्ञान से नहीं आती, बल्कि रोज़ की आदत से आ जाती है. मुझमें भी आ गई है. रोज़ की आदत है.
क्या श्मशान वाले और हम किसी अपने की मौत पर इतने ही सहज हो सकते हैं? या अपनी खुद की मौत को लेकर कम्फरटेबल हो सकते हैं? अगर अपनी पर हो जाएं तो मनुष्य के डर पर ये बड़ी भारी जीत होगी, लेकिन मुझे मालूम है कि हम तपस्या से निकले बुद्ध नहीं, आदत के मारे मजबूर जड़ताजीवी हैं.

