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धूर्तता !

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-चंद्रशेखर शर्मा

दिल्ली विधानसभा में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं, “यार, तुम लोग फ़िल्म की मार्केटिंग तो मत करो ! बहुत गंदे लगते हो तुम। यह देश को शोभा नहीं देता !” ऐसा कहते हुए उनके चेहरे पर आत्ममुग्धतायुक्त खिलखिलाहट है।
इस सीन वाला सदन की कार्रवाई का एक वीडियो वायरल है। पहली बात यह कि केजरीवाल ने यदि इससे प्रधानमंत्री पर निशाना साधा है तो उनकी धूर्तता को सलाम ! हालांकि यह तय है कि मोदी पर जो-जो भी नेता निजी रूप से हमलावर हुए हैं, उनकी लंबी फेहरिस्त है और उनमें से ज्यादातर का बुरा हश्र देश को पता। अचरज तो इस बात का है कि यह बात खुद केजरीवाल अच्छे से जानते हैं, फिर भी सदन में कह रहे हैं कि यार, तुम फ़िल्म की मार्केटिंग तो मत करो और खिल्ली उड़ा रहे हैं। हां, यह भी सम्भव है कि उनके निशाने पर मोदी न हों। 
लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि फ़िल्म पर प्रधानमंत्री के बयान को एक वर्ग जाने क्या-क्या बताने पर तुला है। एक यह है कि मोदी ने बयान में फ़िल्म के पक्ष में बोलकर फ़िल्म मेकर्स को फायदा पहुंचाने की कोशिश की। उनको उपकृत किया है ! कई लोगों का कहना है, बल्कि तंज है कि देश के प्रधानमंत्री अब फ़िल्म की मार्केटिंग पर उतर आए हैं !
धूर्तता समझने से पहले आइए कुछ और समझ लेते हैं। यहां जिस फ़िल्म की बात है वो है “द कश्मीर फाइल्स !” सो सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि यह देश-दुनिया की बहुत चर्चित फिल्म हो चुकी है। मोदी ने कहा है फ़िल्म में सच्चाई दिखाई गई है। यह सच भी है, बल्कि बत्तीस साल पुराना सच। हालांकि मोदी का यह बयान आया था फ़िल्म के रिलीज होने के बाद। उधर, फ़िल्म इसके पहले यानी रिलीज के पहले ही अन्यान्य कारणों से चर्चा के रूप में घर-घर पहुंच चुकी थी। अब प्रधानमंत्री ने उस पर बोला तो कुछ सोचकर ही तो बोला होगा न ! यह और बात है कि उनके बोले से किस-किस को फायदा हुआ। अलबत्ता देखना यह भी चाहिए कि किस-किस को नुकसान हुआ या होगा और जिनका पेट दुखा तो क्यों दुखा ?
असल में आप चाहे मोदी के चाहने वाले हों या उनके बैरी, एक बात साफ है। सो यह कि बहुत मामलों में नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बाद में हैं और एक हिन्दू या सनातनी पहले ! कई बार वे इस बात का सार्वजनिक मुजाहिरा भी कर चुके हैं। संसद की सीढ़ियों पर शीश नवाने से लेकर गुफा में ध्यान लगाने और काशी विश्वनाथ मन्दिर में पूजा से लेकर गंगा मैया में डुबकी लगाने तक। यह सब सबने देखा है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ देश के हिन्दू समाज के सचेत प्रतिनिधि भी हैं। भले कोई इस बात को न माने या चिढ़े लेकिन यह दीवार पर लिखी इबारत की तरह बिलकुल साफ है।
सो बात द कश्मीर फाइल्स की हो तो उस पर उनका कुछ बोलना बिलकुल स्वाभाविक और अपेक्षित था। आखिर वो फ़िल्म उस जनसंहार का सच है, बड़े पैमाने पर जिसका ज्यादातर शिकार हिन्दू हुए। धूर्तता यह है कि आप उस सच से तो मुंह फेर नहीं सकते और न उस पर बहस कर सकते सो उपाय यह कि मोदी को निशाने पर लो ! ठीक वैसे जैसे फिल्म के बजाय फ़िल्म के डायरेक्टर विवेक रंजन अग्निहोत्री का चरित्र चालीसा बखान रहे हैं कुछ लोग। गोया कोई डाकू रत्नाकर रामायण कैसे रच सकता है ? गनीमत है वाल्मीकि के समय न्यायालय नहीं थे !
आप देख लीजिए इस फ़िल्म के निर्माण से लेकर इसके रिलीज होने तक इसकी राह में क्या-क्या और कैसे-कैसे रोड़े न अटकाए गए। रत्ती कसर न छोड़ी गई उसमें। मीडिया और टीवी चैनलों तक ने उसका अघोषित बॉयकॉट किया हुआ था। ख्वाहिशें और कोशिशें यही थीं कि फ़िल्म सिनेमाघरों का मुंह ही न देखे। अलबत्ता बात महज फ़िल्म की न थी अपितु एक काले अध्याय और सच की थी, जिसे पिछले बत्तीस बरसों में खुलने तक न दिया गया था। कभी तो उसे सबके सामने आना ही था। बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती ? नतीजा सबके सामने है। 
बहरहाल रही बात मोदी के उस फिल्म पर बोलने की तो उनको हर सूरत उस पर बोलना ही था। उस पर उनका बोलना बतौर एक सनातनी, एक राजनीतिज्ञ और एक देशप्रेमी, तकाजा था। केजरीवाल की धूर्तता देखिए कि वो उसे फ़िल्म की मार्केटिंग कहकर खिल्ली उड़ा रहे हैं। हकीकत यह है कि वो फ़िल्म की नहीं, हिंदुत्व की मार्केटिंग है ! संदेश साफ है। देश उसे समझ रहा है।-चंद्रशेखर शर्मा

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