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दुःख का दैनिक त्यौहार

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डॉ. गीता शुक्ला

  _दु:ख भी एक त्यौहार है. जिसे हम रोज़ मनाते हैं. किसी को कुर्सी न मिल पाने का दुख, किसी को प्रमोशन न मिल पाने का दुख.  किसी को प्यार न मिल पाने का दुख तो किसी को व्यापार न कर पाने का दुख._

 किसी को कार न मिल पाने का दुख तो किसी रिक्शाचालक को सवार न मिल पाने का दुख. जमीन जायदाद प्रेम सत्ता पैसा न मिल पाने का दुख हर कोई मना रहा है. 
   _दुख इतने कि गिनने निकलो तो संख्याएं कम पड़ जाएं .दुख इतने कि चर्चा करने बैठो तो पूरा दिन निकल जाए. सुख की कोई बात नहीं करता. सभी केवल दुख को लेकर बैठे हैं. कोई न कोई दुख सभी के पास है._
    लेकिन सुख केवल उसी के पास है जिसे पेट भरने को दो रोटी का जुगाड़ करते पूरा दिन बीत जाता है और जब अन्न पेट में जाता है तो सुख का अहसास होता है.

हम सभी एक ऐसे संसार में रह रहे हैं जहां हमने केवल दुखों का अंबार लगा रखा है, ढूंढ ढूंढ कर हम लोग दुख इकट्ठे करने में लगे रहते हैं .दुखों का पहाड़ एक दिन इतना बड़ा हो जाता है कि जिसके पीछे से झांकता सुख हमें दिखाई ही नहीं पड़ता.
ईश्वर ने बहुत कुछ दिया है तो थोड़ा बहुत न भी मिला तो दुख नहीं करना चाहिए. हर दिन उगते सूरज के साथ सुख का त्यौहार मनाना चाहिए.

सुख ने कहा था
आज आएगा वो
इंतजार में खड़े थे हम
पलकें बिछाए
बाँह फैलाए
राह तकते
छप्पन उम्मीदों सजी
थाली सजाए
मुस्कुराहट की !

दस्तक हुई
किवाड़ खोला
सामने दुख खड़ा था
देखते मानो पहाड़ टूट पड़ा था
अनमनाते कसमसाते बड़बड़ाते
उसे भीतर बुलाया
खैर
जो थाल सजाया था सुख के लिए
वही उसे परसाया
दुख अब खुश था
जाते हुए बोला
तुमने पहचाना नहीं
दुख का चेहरा लगाए
तुम्हारी मुस्कुराहट मे परसी
उम्मीदों का भूखा
मैं ही तो सुख था !
असल में
हमें जो दो लगते
हमारी मुस्कुराहट का भूखा
हमारा मन ही वो सबसे बड़ा ठग है!
(चेतना विकास मिशन)

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