सुसंस्कृति परिहार
दमोह विधानसभा उपचुनाव की चर्चाएं इन दिनों नित नई करवटें ले रही है । कांग्रेस जहां पूरी तरह लापरवाह है, वहीं भाजपा में नित नई तिकड़मों का खेल चल रहा है । मुख्यमंत्री द्वारा दलबदल कर आए राहुल लोधी की भाजपा से उम्मीदवार की घोषणा के बाद भाजपा के एक धड़े में अंदर अंदर बदले की आग का एहसास जनता को होने लगा है।पूर्व पराजित वित्त मंत्री जयंत पुत्र ने मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद पत्रकारों को भोज पर अचानक आमंत्रित कर सौजन्य भेंट की ,इससे पहले यकायक वे आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के अध्यक्ष बन गए।कोरोना वारियर्स सम्मान में उनके साथ मंत्री गोपाल भार्गव के पुत्र का लाव-लश्कर के साथ आगमन हुआ जनता सब दिल थामे देख रही है। आजकल जयंत पुत्र आशीर्वाद यात्रा पर हैं ।घर घर संपर्क अभियान चल रहा है ।घर पर चुनावी तैयारी पूरी जोर-शोर से चल रही है
।ऐसी ख़बरें भी आ रही हैं कि जयंत मलैया, पुत्र सिद्धार्थ के निर्दलीय चुनाव लड़ने के ख़िलाफ़ हैं पर बेटा है कि मानता नहीं ।इधर भाजपा अध्यक्ष कहते हैं इन सब हलचलों से पार्टी का कोई सरोकार नहीं है।
लेकिन इन सब घटनाओं का परिणाम ये रहा कि मुख्यमंत्री के आगमन के आमंत्रण कार्ड से जयंत जी का नाम गायब रहा तो राष्ट्रपति के आमंत्रण पत्र से दमोह प्रभारी मंत्री गोपाल भार्गव का नाम नदारद था। मतलब साफ़ है कि इन तमाम कृत्यों पर मुख्यमंत्री नज़र रखे हुए हैं। लोगों का तो यहां तक कहना है कि यदि जयंत पुत्र भाजपा के खिलाफ काम करते हैं या निर्दलीय प्रत्याशी बनते हैं तो सी बी आई ,ईडी या आई टी की दस्तक दमोह में हो सकने की पूरी संभावना बन सकती है। कतिपय लोगों में ये भी चर्चा है कि शायद ही यह जुर्रत जयंत पुत्र शायद ही कर पाएं।
दूसरी ओर राहुल लोधी इसे शिवराज सिंह का चुनाव मान काफ़ी सुस्त है पिछले चुनाव में तो दमोह विधानसभा के लोग उन्हें जानते भी नहीं थे मलैया विरोध और कांग्रेस के परम्परागत वोट से वे मात्र 700वोट से जीते थे । हालांकि मलैया जी कभी भारी अंतर से जीते नहीं है। सिर्फ एक बार प्रभुनारायण टंडन के निधन के बाद उनके डाक्टर पुत्र अनिल टंडन को लगभग दस हजार वोट से जयंत ने हराया था। यहां हार-जीत में हमेशा बहुत कम ही फासला रहा है । कांग्रेस के वोटर बिल्कुल पक्के हैं वे बड़ी से बड़ी आंधियों में भी नहीं बदले ।यही वजह है कांग्रेस हमेशा निश्चित रहती है।
इन दोनों हालातों में जनता पशोपेश में है।ये दोनों स्थितियां भयावह है। तथाकथित बिकाऊ राहुल भरोसे के लायक नहीं रहे दूजे जयंत पुत्र हैं वे सत्ता के प्रति इतने आसक्त क्यों हैं इसे जनता भली-भांति समझ रही है। वहीं कांग्रेस अपने पुराने रवैये से नहीं उभर पा रही है ऐसी स्थिति में संभावना जो बन रही है वह है दमोह को एक दमदार दबंग विधायक चाहिए ।भले ही वह निर्दलीय हो।तब चर्चाओं में जो नाम सबसे ज्यादा उभर के सामने आ रहा है वह है दृगपाल लोधी का जिसने राहुल सिंह के दमोह आगमन पर जूते की माला पहिनाने की कोशिश की , पकड़े गए और जेल गए।आजकल बेल पर हैं।वे भगतसिंह को अपना आदर्श मानते हैं । दलबदलुओं को सबक सिखाने उन्होंने ग्वालियर क्षेत्र में भी ऐसा ही काम किया था ।डंके की चोट पर अपनी बात कहना ,अन्याय का प्रतिकार उनकी ख़ूबी है। जनता कहती है अब तो ऐसा उम्मीदवार उसे चाहिए।आज दृगपाल की डिमांड भाजपा के दूसरे असंतुष्ट धड़े में है तो कांग्रेस खेमे में भी यह नाम आ रहा है।देखना है,कौन दृगपाल कोसाथ ले पाता है। हालांकि यह बात शायद सबको ज्ञात होना चाहिए कि दृगपाल के इस कृत्य की निंदा करते हुए जयंत पुत्र ने दृगपाल सिंह के साहस को सराहा था तथा उसके एक चैनल पर इंटरव्यू भी कराया था ।दूसरी तरफ दृगपाल ने राहुल लोधी को कांग्रेस से जिताने भरपूर मेहनत की थी।उसकी रुझान कांग्रेस की ओर है।यदि उसे कांग्रेस प्रत्याशी बनाती है तो कांग्रेस मज़बूती के साथ उभर सकती है यदि ऐसा नहीं होता है, वह निर्दलीय खड़ा होता है तो दमोह के दम वाले लोग दृगपाल को जिताकर नया इतिहास लिख सकते हैं। दलबदलू के ख़िलाफ़ उभरे असंतोष पर दृगपाल के साहस का दमोह की जनता ने भी सराहा था लोग यह कहते नहीं थकते कि यह तो बहुत अच्छा किया यह तो हमारे दिल में था । गांव हो या शहर दृगपाल का नाम गूंज रहा है डंके की चोट पर काम करने वाली पथरिया की रामबाई की तरह ही दमदार,दबंग दृगपाल लोगों की पहली पसंद बन गए हैं।देखना यह है कि दमोह से दृगपाल उपचुनाव लड़ते हैं या नहीं।ज्ञात हो वे लोधी समाज से है,युवा हैं और अपने गृह क्षेत्र दतला अभाना में छुटपुट आंदोलन के ज़रिए जनहितकारी कार्य भी कराते रहें।वे रामराज्य नहीं रामराज चाहते हैं ।अदम गोंडवी उनके पसंदीदा लेखक हैं ।निर्भीक हैं और भगतसिंह को अपना आदर्श मानते हैं । कुछ दोस्त उन्हें कामरेड सम्बोधित भी करते हैं ।

