शशिकांत गुप्ते
पूर्व में सार्वजनिक उत्सवों में कठपुतली का खेल दिखाया जाता था।
काठ की बनी पुतलियों को डोर से बांध कर मानव उन्हें अपनी उंगलियों से नचाता है। कठपुतलियों को नचाने के लिए मानव की उंगलियों में विशेष गुण होता है।
दार्शनिक लोग मानव की तुलना कठपुतली से करतें हैं,और कहतें हैं कि, मानव रूपी कठपुतली की डोर ऊपरवाले ( भगवान) के हाथों होती हैं।
कठपुतली नाम से फ़िल्म भी बनी है। सन 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म कठपुतली के गीत का स्मरण हुआ। इसे लिखा है, गीतकार शैलेंद्रजी ने।
इस गीत में प्रेमिका कठपुतली बन अपने पिया के लिए नाचती है।
कठपुतली का खेल महज मनोरंजन के लिए होता है।
जब खेल के साथ राजनीति का मेल हो जाता है,तब जनता को कठपुतली समझ कर नचाया जाता है।
जनता रूपी कठपुतली को किसी डोर से नचाया नहीं जाता है।
जनता रूपी कठपुतली को कोरे आश्वासनों का शोर मचाकर सिर्फ विज्ञापनों के जोर पर नचाया जा रहा है।
परिवर्तन संसार का नियम है। इसी सिद्धांत के आधार पर कथपुटियो के निर्मिति में भी परिवर्तन हो रहा है।
इनदिनों कठपुतलियां विभिन्न रंगों वेश भुषाओ में बनाई जा रही है।
होती तो है सभी काठ की ही पुतलियां।
बहुत सी कठपुतलियों की पहचान उनके पहनावे की जाती है?
अत्याधुनिक तकनीकी के युग में कठपुतलियों को रिमोट से नचाया जा रहा है।
कठपुतलियां स्वयं कभी भी नाच नहीं सकती हैं। उन्हें नचाया जाता है।
बेचारी काठ की पुतलियां रिमोट से नाचने के लिए अभिषप्त होती है।
कठपुतलियों को नचाने वाले कठपुतलियों को आपस में ही लड़वातें हैं।
यह खेल मराठी भाषा में कही गई कहावत को चरितार्थ करता है। उंदराचा जीव जातो मांजराचा खेळ होतो
अर्थात चुंहे की जान जाती है और बिल्ली का खेल होता है।
बिल्ली चुंहे को कभी भी अपने पंजे में दबोचकर सीधे मार कर खाती नहीं है। बिल्ली चुंहे के साथ छल करती है। उसे दबोचती है फिर छोड़ती है ऐसा कईं बार करती है।
तात्पर्य कठपुतलियों को नचाने वालों के लिए कठपुतलियों को नचाना मात्र मनोरंजन का खेल होता है।
कठपुतलियों को नचाने वाले के पास जो रिमोट होता है,उस रिमोट में लगी बैटरियों की क्षमता के कारण बहुत सी कथपुतलियां टूटफुट कर अपंग हो जाती है।
वैसे मानव को कठपुतली कहना ही अपंगता का लक्षण है।
बहुत सी कठपुतलियां इहलोक त्याग कर परलोक सिधार जाती है।
नचाने वाले रिमोट की बैटरी बदलतें रहतें हैं। कठपुतलियों को अनवरत नचातें रहतें हैं।
जनता रूपी कठपुतलियों को जिस रिमोट से नचाया जाता है,उस रिमोट में लगने वाली बैटरियों में एक विशेष प्रकार की क्षमता होती है। रिमोट किसी के भी हाथों में। रिमोट में लगी बैटरियों की क्षमता के कारण जनता अपनी मूलभूत समस्याओं को भूल जाती है।
बस नाचते रहती हैं।
कठपुतली फ़िल्म के गीत की पंक्तियों का स्मरण होता है।
बोल री कठपुतली डोरी
कौन संग बाँधी
सच बतला तू
नाचे किसके लिए
बावरी कठपुतली
डोरी पिया संग बाँधी
मै नाचू अपने पिया के लिए
नए नाम नित रूप
धर मै आई चली गयी
लेकिन मैंने धूम मचा दी
जिस नगरी जिस गली गयी
इसीतरह ही कठपुतलियों को नचाया जा रहा है। लेख को पूर्ण विराम देने के पूर्व।
विश्वबंधुत्व के प्रतीक संत गुरुनानकदेवजी के इस उपदेश का स्मरण होता है।
अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे
एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले कौ मंदे
यह उपदेश समझ में जाएगा तब कोई भी कठपुतली किसी भी रिमोट से नाचना पसंद नहीं करेगी।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

