शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी सन 1954 में प्रदर्शित फिल्म नास्तिक का यह गीत गुनगुना रहे थे।
मैने कारण जानना चाहा तो सीतारामजी ने कहा, यह गीत प्रख्यात गीतकार प्रदीप जी ने लिखा है।
आज यदि वे होते और इसतरह के गीत लिखते तो पता नहीं कितनी जांच एजेंसियों की शिकार हो जाते। नास्तिक फिल्म में ही प्रदीप जी ने यह गीत भी लिखा है।
सूरज न बदला चांद न बदला ना बदला रे आसमान
कितना बदल गया इंसान
इंसान के बदल ने की कल्पना सन 1954 में गीतकार ने की थी,जो आज पूर्ण तया यथार्थ में परिलक्षित हो रही है।
नास्तिक फिल्म का जो गीत सीतारामजी गुनगुना रहें हैं,यह गीत आज के राजनैतिक
सामाजिक,धार्मिक,और सांस्कृतिक हर क्षेत्र पर सटीक व्यंग्य है।
इस गीत में एक युवती की व्यथा है। जो खल, दुष्ट, दुराचारी क्रूर मानसिकता के लोगों के वासना की शिकार होती है,और भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न उपस्थित करती है?
इन पंक्तियों में आज धरने पर बैठी उन युवतियों की भावना स्पष्ट रूप से प्रकट होगी।
तेरे होते हुए आज मैं लूट रही
मेरे माथे पे लग गया दाग
अरे पत्थर के भगवान तू है कहाँ
तेरी दुनिया में लग जाए आग
इनदिनों जनता की मूलभूत समस्याओं को नजर अंदाज किया जा रहा है। ऐसी व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए गीत की ये पंक्तियां प्रासंगिक हैं
लाज आती है मुझको ये कहते हुए
प्रभु अंधा ना बन आंख रहते हुए
मुझे डसने को आए हैं देख जरा
तेरी बस्ती के जहरीले नाग
गीत की अंतिम पंक्तियां आमजन की पीड़ा से व्यथित भावना को उजागर करती है।
आज जिंदा चिता पर हुं मै जल रही
जल रहे उम्मीदों के बाग
तू है कहाँ……तेरी दुनिया में….. लग….?
इन दिनों विमान में उड़ने वाले यात्रियों की संख्या में बेतहाशा इज़ाफा हुआ है।
जमीन में वाहनों की भरमार है।
जनता भीड़ में खो रही है।
धार्मिक स्थानों पर दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही है।
अच्छे दिन आएंगे? या आ गए हैं?
या अच्छे दिन सिर्फ शब्द कोष में कैद होकर रह गए हैं?
खोजों तो जाने?
शशिकांत गुप्ते इंदौर

