Site icon अग्नि आलोक

फर्ज निभाती बेटियां!

Share

राजकुमार जैन
55 साल ‌ से ‌ समाजवादी साथी रहे नानक चंद‌‌ की स्मृति सभा में ‌‌‌ ‌ डीएवी स्कूल का ‌ विशाल‌ प्रांगण‌ भी छोटा पड़ गया। मुख्तलिफ संस्थाओं, संगठनों व्यक्तियों द्वारा भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित ‌ करते हुए ‌ अपने और ‌‌नानक‌ के संबंधों के ‌‌ किस्से सु‌‌‌‍‌‍‍नाएं। ‌
‌‌‌ ‌ ‌एक ‌ ‌‌को‌ने में ‌अपनी मां के साथ मौन बैठी हुई‌ उनकी बेटियां श्रुति और निर्मिति कातर भाव से सुन रही थी। वक्त की मार कब क्या गुल खिला दे। नानक जो मौला मस्त, जिंदा दिल इंसान था बीमारी ने आखिरी दौर में ‌ऐसा जकड़ा‌ की ‌ बिस्तर तक ही‌ महदूद हो गया।‌‌‌ जो इंसान‌ रोजमर्रा की जिंदगी में सुबह से शाम तक लोगों की संगत में लिख बोलकर घिरा रहता था अब अपने तक ही सिमट गया। पशेमानी के इस आलम में उसकी बेटियां‌ और अर्धांगिनी जो खुद जिस्मानी व्याधि से घिरी हुई‌ ‌थी छाया बनकर उसके इर्द-गिर्द मजबूती से खड़ी हो गई।
आजकल देखने में आ रहा है की दौलत और शोहरत की बुलंदियों पर खड़े बेटे बूढ़े बीमार मां-बाप को वृद्धआश्रम जिनका आधुनिक नाम ,’ओल्ड एज होम’, ‘सीनियर सिटीजन लिविंग सेंटर’, ‘आशियाना’ वगैरह हो गया है भर्ती करवा कर फख्र के साथ मुनादी करते हैं कि वे वहां पर‌ आनंदित जीवन का लुफ्त उठा रहे हैं। लाचारी बेबसी के आलम में यह बूढ़े मां-बाप जिनको अब संगत, ममत्व, अपनेपन का एहसास चाहिए बाहरी दिखावे भौतिक जगत में जिनकी जिनकी कोई रुचि नहीं रह पाती,वे अपने घर परिवार वालों की आवाज, परछाई में ही अपनी सुरक्षा और संतुष्टि पाते हैं। सब कुछ होने के बावजूद बेबस, लाचार, अपने को पाते हैं।
परंतु नानक के हालात इससे बिल्कुल रहे। घर, अस्पताल दोनों जगह शरीर की वेदना से उपजी सांसों की कराहट को उसकी दोनों बेटियां ना केवल सुन और महसूस कर रही थी, वेदना के उन क्षणों में अपने बाप का हाथ अपने हाथ से सहलाते हुए राहत का फोहा लगाने के साथ बीमारी की चिड़चिड़ाहट का सहज भाव से अपना फर्ज मानकर निर्वाह कर रही थी। बेटे बेटियों के फर्क की इस सामाजिक दीवार को उन्होंने ढहा कर दफन कर दिया।

Exit mobile version