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मुक्त करने का दिवास्वप्न?

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शशिकांत गुप्ते

सुबह की सैर करते हुए आज मैं और सीतारामजी मुक्त और मुक्ति इन दो शब्दों पर विचार विमर्श कर रहे थे।
मैने कहा इनदिनों मुक्त शब्द को व्यवहारिक अंजाम देने के लिए काश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कटक तक प्रयास चल रहा है।
सीतारामजी ने मुझसे कहा आप व्यंग्य करने की इतनी जल्दी क्यों करतें हैं?
मैने कहा,मै साहित्यकार हूँ। मेरी विधा व्यंग्य की है।
साहित्य समाज का दर्पण है।साहित्य के दर्पण में मुझे आमजन का चेहरा दिखाई नहीं देता है?
आमजन के चेहरों पर देखों? आमजन,अपनी पारिवारिक, सामाजिक,आर्थिक जवाबदारी से मुक्त होना चाहता है।
यह कहतें मुझे यकायक सन 1960 में प्रदर्शित फ़िल्म पतंग का गीत याद आ गया। इस गीत को लिखा है, गीतकार राजेंद्र कृष्ण जी ने।
इस गीत की पंक्तियों, आमजन की वर्तमान वास्तविकता को बयां करती है।
बागवा ने आग दी
जब आशियाने को मेरे
जिनपे तकिया था वो ही
पत्ते हवा देने लगे।
देने वाले किसी को गरीबी न दे
मौत दे दे मगर बदनसीबी ना दे
छीन ली खुशी और कहा कि ना रों
यही हक़ीक़त है आमजन की।

आमजन को जिंदा रखा है,लेकिन उसकी जिंदगी छीनी जा रही है।
इसी भयावह हक़ीक़त कारण
इनदिनों उपर्युक्त मुद्दों पर किसी का ध्यान नहीं है।
ईनदिनों विपक्ष मुक्त सियासत के मुद्दे पर समाचार माध्यम व्यस्त हो गएं हैं। बहुत से विश्लेषकों को बहस करने के लिए और बहुत से लेखकों बड़े बड़े लेख लिखने का मुद्दा मिल गया है।
आश्चर्य तो जानकर होता है कि, एक ओर तो यह कहा जाता है कि, देश में कोई विकल्प है ही नहीं। जो विपक्ष है,वह बहुत कमजोर है। ऐसे कमजोर विपक्ष के दागदार सदस्यों के साथ गलबहियां करने में कोई परहेज न करते हुए मुक्त विपक्ष का अभियान चलाया जा रहा है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि, इस अभियान को सुचिता की राजनीति करने वाले चला रहें हैं।
देश के एक दल को कमजोर करने से मुक्त विपक्ष की सियासत सफ़ल हो जाएगी? क्या एक कमजोर कहलाने दल की इतनी एहमियत है? कमजोर दल से इतना डर क्यों है?
क्या क्षेत्रीय दलों को नजरअंदाज किया जा सकता है? क्षेत्रीय छत्रपों को दरकिनार कर एक छत्र राज स्थापित हो सकता है?
क्या लोकतंत्र की जो बुनियाद है, असहमति महत्वहीन हो जाएगी?
ऐसे अनेक व्यवहारिक प्रश्न उपस्थित होतें हैं?
सीतारामजी ने मेरी बात को ध्यान से सुनने के बाद मुझसे पूछा न खाऊंगा न खाने दूंगा यह स्लोगन याद है।
हाँ अच्छे से याद है।
सीतारामजी ने कहा इस स्लोगन में एक महत्वपूर्ण राज छिपा है।
मुक्त विपक्ष को सफ़ल करने के लिए, एक नायाब तरीका प्रचलन में लाया जा रहा है। विपक्ष में रहकर कोई कितना भी खाए, खा कर डकार भी न ले, किसी को अजीर्ण भी हो जाए। इधर आने पर एक हाजमे की ख़ुराक दी जाती है। इस खुराख से पूर्व में खाया,पिया सब हज़म हो जाता है। अजीर्ण से पीड़ित व्यक्ति सिर्फ स्वस्थ ही नहीं होता है, पूर्ण रूप से दूध से धुला हो जाता है। सुचिता पूर्ण सियासत का इससे अच्छा उदाहरण अन्यत्र कहीं भी दिखाई नहीं देगा।
मैने पूछा इसे रणनीति कह सकतें हैं?
सीतारामजी ने कहा इश्क,जंग,खेल और सियासत में सब जायज़ होता है।
मुझे यकायक इस कहावत का स्मरण हुआ बिल्ली जब दूध पीती है तब अपनी आँख बंद कर लेती है। इस कहावत का अर्थ है,बिल्ली इस भ्रम का शिकार होकर, स्वयं की आँख बंद कर लेती है, और समझती है कि, उसे चोरी छिपे दूध पीते हुए कोई देख ही नहीं रहा है।
सीतारामजी ने कहा,आज सुबह की सैर यहीँ समाप्त होती है। यह कहतें हुए सीतारामजी ने प्रख्यात शायर डॉ वसीम बरेलवी, यह शेर सुनाया।
आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है

सीतारामजी ने इसी शेर के साथ एक शाश्वत संदेश भी सुनाया।
अपने देश की माटी में लोकतंत्र को और धर्मनिरपेक्षता मजबूती से रचि-बसी है। इतिहास साक्षी है,भारत के लोकतंत्र को कोई भी कमजोर कर नहीं पाया ना कर पाएगा है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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