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मृतप्रायः संवेदनाएं?

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शशिकांत गुप्ते

प्रसिद्ध साहित्यकार,कवि गीतकार स्व.नीरजजी रचित गीत की निम्न पंक्तियां प्रासंगिक है।
आदमी को आदमी बनाने के लिए
ज़िंदगी में प्यार की कहानी चाहिए
और कहने के लिए कहानी प्यार की
स्याही नहीं, आंखों वाला पानी चाहिए।

आँखों वाला पानी मतलब मानव के मानस पटल पर संवेदनाओं का जागृत होना।
जब मानव संवेदनाहीन हो जाता है,तब वह मानव नहीं रहता है दानव बन जाता है।
संवेदनशील व्यक्ति का सोच बहुत व्यापक होता है। व्यापक सोच रखने वाला व्यक्ति दकियानूसी विचारों को त्याग देता है।
विचारकों का कहना है कि यदि कोई आदमी होगा तो वह इंसान बन सकता है। जब आदमी में इंसानियत जाग जाती है तब वह सिर्फ और सिर्फ इंसान ही रहता है। ऐसा व्यक्ति जाति, धर्म से ऊपर उठ जाता है।
ऐसे व्यक्ति में नींच-ऊंच का भेद ही समाप्त हो जाता है।
इस संदर्भ में संत रविदास का यह दोहा प्रासंगिक है।
रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच

इस दोहे का अर्थ है कि, सिर्फ जन्म लेने से कोई नीच नहीं बन जाता है बल्कि इन्सान के कर्म ही उसे नीच बनाते हैं।
अज्ञानवश लोग जात पात के संकीर्णता में उलझें रहतें हैं।
इस मुद्दे पर संत रविदास कहतें हैं।
जात पांत के फेर मंहि, उरझि रहइ सब लोग।
मानुषता कूं खात हइ, रैदास जात कर रोग॥

अर्थात अज्ञानवश सभी लोग जाति−पाति के चक्कर में उलझकर रह गए हैं। संत रैदास कहते हैं कि, यदि मानव इस जातिवाद के चक्कर से नहीं निकले तो एक दिन जाति का यह रोग संपूर्ण मानवता को निगल जाएगा।
इसी रोग से ग्रस्त मानसिकता ने एक अबोध बालक को संगीन अपराधी घोषित कर मृत्युदंड दे दिया। इस अबोध बालक का जुर्म सिर्फ इतना ही है कि,उसने अपनी तृष्णा को शांत करने के पानी के दो घुट हलक ने नीचें उतारे लिए।
पानी तो पानी होता है। पानी का कोई रंग नहीं होता है।
दोष उस घड़े का है जिसमें पानी भरा हुआ था। घड़ा तो मिट्टी से ही बना होगा। निश्चित ही घड़े को किसी कुम्हार ने चलती चाकी पर बनाया होगा।
घड़ा बनने पर वह किसी विशेष जाति कैसे का हो गया?
मिट्टी से बना घड़ा समाज के उच्च धड़े में कैसे बदल गया?
पानी पर अहंकार रूपी वर्णाक्षरों में उच्च वर्ग का अधिपत्य अंकित कर उसे संकीर्ण मानसिकता की मिट्टी से बने घड़े में भरकर रखा।
ऐसे गुरुर से भरे धड़े के पानी से प्यास बुझाने की कोशिश करने मात्र के कारण अबोध बालक का स्वर सदा के लिए शांत कर दिया।
इस खबर ने संवेदनशील लोगों को शर्म से पानी पानी कर दिया।
कैलेंडर में अंकित तारीख वार और माह को पढ़कर हम इक्कीसवीं सदी पहुँच गएं हैं।
यह सिर्फ कागजी गणित है।
असल हमारी संकुचित सोच उल्टी गिनती कर रही है।
हम अच्छादिनों के दिवा-स्वप्न में मग्न हो गएं हैं। दिवा-स्वप्न का शाब्दिक अर्थ होता है।
अकर्मण्य एवं निराश व्यक्ति का बैठे-बैठे हवाई किले बनाना।
अहम प्रश्न तो यह है कि, कबतक हमारा सिर्फ शरीर जीवित रहेगा और आत्मा मृतप्रायः रहेगी?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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