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मृत्यु और माया

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    डॉ. विकास मानव 

शिव शिवा को मृत्यु के पार शून्य दिखाने ले गए. जहाँ जीवन भी मौन था, और मृत्यु भी.

शिव मौन थे लेकिन पार्वती के भीतर कुछ टूट रहा था। श्मशान की ओर देखते हुए उन्होंने पूछा :
नाथ, क्या मृत्यु भी माया है? या वो सच है? हर किसी से मोह छूट सकता है, लेकिन मृत्यु के भय से कोई छूटा नहीं
शिव ने आँखें मूँद लीं — फिर धीरे से बोले :
मृत्यु को शब्दों से नहीं समझा जा सकता. उसे केवल देखा जा सकता है। आज तुम्हें वो दिखाता हूँ
जो तुम सोचती थीं अंत है, और जो वास्तव में शून्य है।
दृश्य- 1
एक अधजला शव
कीड़े रेंग रहे थे
मांस गल रहा था
साँसें अब केवल स्मृति थीं।
पार्वती देखती रहीं — पर विचलित नहीं हुईं।
उन्होंने भीतर की आवाज़ सुनी :
ये वही देह है जिसे मैंने ‘स्व-रूप’ माना था. क्या मैं यह हूँ?

शिव बोले :
देह केवल आवरण है, और मृत्यु उस आवरण को मिटाने की विद्या।
माया की पहली सीख : जो दिखता है, वह मिटता है।

दृश्य- 2
एक चिता जल रही थी.
बेटी रो रही थी
पीछे लोग फोटो खींच रहे थे, बातें कर रहे थे।
पार्वती की आवाज : अभी-अभी एक जीवन गया है, और लोग पहले ही वापस ‘सामान्य’ हो चुके हैं…

शिव ने कहा :
मृत्यु केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं,
ये संबंधों की क्षणभंगुरता का दर्पण है।
माया का दूसरा बंधन : रिश्तों को सत्य मानना।

दृश्य- 3
एक आत्मा देह से निकल का ऊपर जा रही थी.
लेकिन नीचे से आवाज़ें उसे खींच रही थीं : तेरा काम अभी बाकी है
तेरी बेटी अकेली है.
तू अधूरी रह गई.
आत्मा काँपती है और रुक जाती है।

(पार्वती की आवाज :
क्या ये मृत्यु है?
या मैं ही हूँ जो जा नहीं पा रही.

शिव बोले :
मृत्यु देह से नहीं
‘मैं’ से होती है।
जब तक ‘मैं’ ज़िंदा है, तब तक तुम मृत्यु के पार नहीं जा सकते।

अंतिम दृश्य :
अब चारों ओर सन्नाटा था।
कोई देह नहीं।
कोई आवाज़ नहीं।
कोई स्मृति नहीं।
सिर्फ़ शून्य।

पार्वती का स्वर :
यह कौन सा स्थान है?
शिव बोले :
यह वही है, जहाँ मृत्यु नहीं आती है.
क्योंकि यहाँ ‘तुम’ ही नहीं हो।

शास्त्र- संगति :
“न जायते म्रियते वा कदाचित्…”
— श्रीमद्भगवद्गीता
“मृत्योर्मामृतं गमय”
— बृहदारण्यक उपनिषद
“मायैव सर्वमखिलं ह्यनात्मा”
— शिवगीता
पार्वती ने मौन स्वर स्वर में कहा :
अब समझ में आया. मृत्यु का भय मुझसे बाहर नहीं था.
वो तो मेरे भीतर था
मेरे ही ‘मैं’ में छिपा हुआ और जब मैंने वो छोड़ दिया तब p
मृत्यु भी चुप हो गई।

जो मृत्यु से नहीं डरता
वही पहली बार जीता है।
मृत्यु कोई अंत नहीं
वो तो एक दरवाज़ा है
जिसके उस पार तुम नहीं हो।
और जहाँ ‘तुम’ नहीं
वहाँ सिर्फ़ शिव है।

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