डॉ. विकास मानव
शरीर में ध्यानयोग की दृष्टि से सात चक्र होते हैं। सबसे जो प्राथमिक चक्र है, वह मूलाधार कहलाता है, वह जननेंद्रिय के करीब होता है। वह पहला चक्र है.
दूसरा चक्र है, स्वाधिष्ठान चक्र। वह नाभि के करीब मान ले सकते हैं। अभी कल्पना में समझ लें। जननेंद्रिय के करीब जो चक्र है, उसका नाम मूलाधार।
नाभि केे पास जो चक्र है, उसका नाम स्वाधिष्ठान। और ऊपर चलें, हृदय के पास जो चक्र है, उसका नाम अनाहत।
और ऊपर चलें, माथे के पास जो चक्र है, उसका नाम आज्ञा। और ऊपर चलें, चोटी के पास जो चक्र है, उसका नाम सहस्रार।
इन पांच का हम उपयोग करेंगे। यूं चक्र तो सात हैं, और भी ज्यादा हैं। इन पांच का हम उपयोग करेंगे और इनके उपयोग के साथ हम शरीर को शिथिलता की तरफ ले जाएंगे। और आप हैरान होंगे, मूलाधार जो चक्र है, उसका नियंत्रण आपके पैरों पर है। हम सुझाव देंगे मूलाधार चक्र को।
आप लेट जाएं. मूलाधार चक्र पर ध्यान को ले जाएं। अपने भीतर जननेंद्रिय के करीब मूलाधार चक्र के पास ध्यान को ले जाएं, वहां बोध रखें।
मूलाधार चक्र को शिथिल छोड़ दीजिए और उसके साथ ही दोनों टांगों को शिथिल छोड़ दीजिए। आप भीतर भाव करेंगे कि मूलाधार चक्र शिथिल हो रहा है, मूलाधार चक्र शिथिल हो रहा है और पैर शिथिल होते जा रहे हैं। आप थोड़ी ही देर में पाएंगे कि पैर दोनों मुरदे की तरह लटककर शिथिल हो गए हैं।
जब पैर शिथिल हो जाएंगे, तो ऊपर की तरफ बढ़ेंगे, दूसरे चक्र स्वाधिष्ठान को नाभि के पास। ध्यान को नाभि के पास ले आएं. अपनी कल्पना में नाभि के पास भीतर ध्यान को लाएं।
स्वाधिष्ठान चक्र शिथिल हो रहा है और पेट का सारा यंत्र शिथिल हो रहा है। उसको अनुभव करते ही वह सारा यंत्र धीरे-धीरे शिथिल हो जाएगा।
फिर आप और ऊपर बढ़ेंगे और हृदय के पास आएंगे. अनाहत चक्र शिथिल हो रहा है। तब आप हृदय को शिथिल छोड़ेंगे और अनाहत पर ध्यान रखेंगे, उस जगह, हृदय के पास और भावना करेंगे कि अनाहत शिथिल हो रहा है, तो छाती का पूरा का पूरा यंत्र और संस्थान शिथिल हो जाएगा।
फिर हम ऊपर आएंगे और माथे के पास दोनों आंखों के बीच में आज्ञा चक्र है, उसका अंदर भाव करेंगे कि आज्ञा के पास हमारा ध्यान है, दृष्टि है।
आज्ञा चक्र शिथिल हो रहा है और मस्तिष्क शिथिल हो रहा है। उसके साथ सारा मस्तिष्क, गर्दन, सारे सिर का हिस्सा एकदम शिथिल हो जाएगा। तब आपको सिर्फ चोटी के पास थोड़ी-सी धक-धक और भार मालूम पड़ेगा, सारा शरीर शिथिल हो जाएगा। सिर्फ चोटी के पास आपको थोड़ा-सा भार और धक-धक मालूम पड़ेगा।
अंतिम रूप से सहस्रार चक्र यानि सिर के ऊपर ध्यान ले जाएंगे. चोटी के पास. अब वह शिथिल हो रहा है, और उसके साथ सारा मस्तिष्क शिथिल हो रहा है। तब भाव करने से आप पाएंगे कि भीतर भी सब शिथिल हो जाएगा।
इसको लंबी प्रक्रिया में करना है , ताकि यह हरेक के लिए हो ही जाए कि उसका शरीर बिलकुल मृत हो जाए। जब यह सब शिथिल हो जाएगा, तब मैं आप पाएंगे कि अब शरीर बिलकुल मुरदा हो गया. अब उसे बिलकुल छोड़ दें।
शरीर मुरदा हो गया है। श्वास आपकी शिथिल हो रही है, शांत हो रही है. थोड़ी देर में देखेंगे की मन बिलकुल शून्य हो रहा है.
दस मिनट के लिए सब शून्य हो गया। उस शून्य में आप भीतर पड़े हुए, सिर्फ बोध मात्र आपका रहेगा, एक ज्योति जलती रहेगी बोध की और आप चुपचाप पड़े रहेंगे। सिर्फ वह बोध मात्र रहेगा, सिर्फ होश भर रहेगा कि मैं पड़ा हूं।
इसमें यह हो सकता है कि शरीर जब बिलकुल मुरदा-सा मालूम होने लगे–जो कि मालूम होगा, क्योंकि चक्रों के प्रयोग के साथ शरीर एकदम मुरदा होगा–तो घबराना नहीं है किसी को।
अगर ऐसा लगने लगे कि शरीर बिलकुल मुरदा है, तो घबराना नहीं है। यह बड़ा शुभ है। यह बहुत शुभ है। जो जीते जी अपने शरीर के मुरदा होने को अनुभव कर लेगा, वह धीरे-धीरे मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।
कोई भी अनुभूति मालूम हो, कोई प्रकाश, आलोक मालूम हो, शांति मालूम हो, उसको चुपचाप देखते रहना है और शांत शून्य रहना है.
*पहला चरण :*
विश्राम में लेट जाएं और शरीर को ढीला छोड़ दें। अपना ध्यान जननेंद्रिय के पास मूलाधार चक्र पर ले जाएं और भाव करें कि “मूलाधार शिथिल हो रहा है और मूलाधार के साथ ही दोनों पैर भी शिथिल हो रहे हैं… मूलाधार शिथिल हो रहा है, पैर शिथिल हो रहे हैं… ” थोड़ी ही देर बाद मूलाधार के साथ ही दोनों पैर शिथिल हो जाएंगे।
फिर अपना ध्यान नाभि के पास स्वाधिष्ठान चक्र पर ले जाएं और भाव करें कि “स्वाधिष्ठान चक्र शिथिल हो रहा है और साथ ही पेट का पूरा यंत्र भी शिथिल हो रहा है…” दो से तीन मिनट में ही स्वाधिष्ठान और पेट शिथिल हो जाएगा।
फिर उपर ह्रदय के पास ध्यान ले जाएं और भाव करें “अनाहत चक्र शिथिल हो रहा है और अनाहत के साथ ही ह्रदय भी शिथिल हो रहा है, छाती भी शिथिल हो रही है, थोड़ी ही देर बाद छाती का पूरा यंत्र शिथिल हो जाएगा।
फिर उपर दोनों आंखों के बीच आज्ञाचक्र पर ध्यान ले जाएं और भाव करें कि “आज्ञाचक्र शिथिल हो रहा है, साथ ही चेहरा, और गर्दन भी शिथिल हो रही है, थोड़ी ही देर बाद चेहरा शांत और शिथिल हो जाएगा। अब अंतिम चक्र सहस्त्रार चक्र पर ध्यान ले जाएं जहां चुटिया है और भाव करें कि “सहस्त्रार चक्र शिथिल हो रहा है, साथ ही मष्तिष्क भी शिथिल हो रहा है…सहस्त्रार चक्र शिथिल हो रहा है और साथ ही मष्तिष्क भी शिथिल हो रहा है…” थोड़ी ही देर में सिर भी शिथिल हो जाएगा।
*दूसरा चरण :*
अब भाव करेंगे श्वास शांत हो रही है… श्वास शिथिल हो रही है…श्वास शिथिल हो रही है…।
*तीसरा चरण :*
विचार शांत हो रहे हैं… विचार शून्य हो रहे हैं…विचार शून्य हो रहे हैं…।
पंद्रह से बीस मिनट की इस प्रक्रिया में हमारा पूरा शरीर शांत और शिथिल हो जाएगा।
शरीर मुर्दे की भांति पड़ा हुआ अनुभव होगा। यहां भय लगता है क्योंकि शरीर मुर्दे जैसा हो जाता है और मन विलीन हो जाता है, मन में कोई विचार नहीं होते हैं.
अतः हम अपने शरीर, मन और अपने आसपास की स्थिति के प्रति साक्षी हो जाते हैं। यहां हमें पहली दफा साक्षी का अनुभव होगा। भगवान कहते हैं कि भय नहीं करना है क्योंकि यह शुभ लक्षण है। यहां हमें अपने आसपास की आवाजें साफ सुनाई देती है, चोके से बर्तन की आवाज, बाहर बच्चों के खेलने की आवाज, फेरीवाले की आवाज, इन सारी आवाजों को बिना किसी प्रतिक्रिया के सिर्फ सुनना है।
कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी है कि ‘बाहर यह फेरीवाला क्यों चिल्ला रहा है?’ क्योंकि उसे पता नहीं है कि हम ध्यान कर रहे हैं! यदि हम प्रतिक्रिया करते हैं तो साक्षी खो जाएगा और फिर से मन उठ खड़ा होगा, विचारों की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी और हम ध्यान से बाहर हो जाएंगे।
जितनी देर इस स्थिति में रहना चाहें रहें, फिर ध्यान से बाहर आ जाएं। एकदम से बाहर नहीं आना है, दो चार गहरी- गहरी श्वास लें फिर धीरे से ध्यान प्रयोग से बाहर आ जाएं।

