डॉ. अभिजित वैद्य
१५ अगस्त २०२२ को भारत ने स्वतंत्रता के ७५ साल पूरे कर लिए है l विश्व के इतिहास की तुलना में
किसी स्वतंत्र जनतंत्र देश के अस्तित्व का ७५ सालोंका कालावधि निश्चित तौर पर बड़ा नहीं है l विश्व का
सबसे पहला जनतंत्र करीबन ढाई हजार वर्ष पूर्व ग्रीस के अथेन्स शहर में निर्माण हुआ l इस प्राचीन ग्रीस में
अनेक स्वतंत्र शहरराज्य जनतंत्र पद्धति के अनुसार कार्यरत थी l ‘डेमोक्रसी’ यह शब्द ‘डेमोस’ अर्थात ‘लोग’
और ‘क्रेटोस’ अर्थात ‘राज्य’ इन दो ग्रीक शब्दों से निर्माण हुआ है l इसी दरमियान प्राचीन भारत में कम से
कम १६ गणराज्य थे l गौतम बुद्ध ने जिस राज्य में जन्म लिया था वह गणराज्य था l इन राज्यों में निर्णय
सामूहिक तौर पर लिए जाते थे l राज्य का प्रमुखपद अलग-अलग सक्षम व्यक्तियों की ओर सौंप दिए जाने
की व्यवस्था थी l विश्व का यह प्राचीन जनतंत्र आगे चलकर नहीं रहा l आगे के सैंकड़ो साल तक वे अभिजन
हुकुमशाही एवं बादशाही आदि अनेक परिवर्तन से जाती रही l
विश्व का सबसे पुराना तथा अखंडता से कायम रहनेवाला लोकतंत्र अर्थात इटली का ‘सॅन मारिनो’ यह
छोटा देश l इस देश में इ.स. ३०१ में जनतंत्र की स्थापना हुई और आज भी कायम है l इस देश की आज की
आबादी है केवल तीस हजार l इंग्लैंड में इ.स. १७०७ में पहला लोकतंत्र अस्तित्व में आया, अमेरिका में
१७८७ में तथा फ्रान्स में सुप्रसिद्ध फ्रेंच राज्यक्रांति के बाद १७९२ में प्रजातंत्र अस्तित्व में आया l फ्रान्स का
जनतंत्र नेपोलियन के कालखंड में कुछ अवधि के लिए खंडित हुआ था l फ्रेंच राज्यक्रांति ने विश्व को लिबर्टी,
इक्वॅलिटी और फ्रॅटर्निटी अर्थात स्वतंत्रता, समता और बंधुता यह त्रिसूत्री दी l अमेरिकन जनतंत्र ने जनता का
सार्वभौमत्व, न्यूनतम शासन, सत्ता का विकेंद्रीकरण, लक्ष्य एवं समतोल तथा बलशाली संघराज्य इन तत्वों
के साथ व्यक्तिस्वातंत्र्य, अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य एवं न्याय ये तत्व दिए l जॉर्ज वॉशिंटन अमेरिका के पहले
राष्ट्राध्यक्ष l अमेरिका के १६ वे राष्ट्राध्यक्ष अब्राहम लिंकन ने इ.स.१८५८ में विश्व को जनतंत्र की
ऐतिहासिक व्याख्या दी – लोगों का, लोगों ने, लोगों के लिए चलाया हुआ राज्य l इंग्लैंड के जनतंत्र ने
संविधान का राज्य, न्यायव्यवस्था का राज्य, मंत्रिमंडल का लोकसभा अर्थात लोकप्रतिनिधियों से संबंधित
उत्तरदायित्व एवं सत्ता; लोक प्रतिनिधि, प्रशासन एवं न्यायव्यवस्था आदि विकेंद्रीकरण पर जोर दिया l
आधुनिक विश्व में जनतंत्र की नींव डालनेवाले इन तीन महत्त्वपूर्ण देशों में जनतंत्र दो-से तीन शती तक
अच्छी तरह से टिकी रही है l विश्व की जनतंत्र प्रणालियाँ अनेक परिवर्तनों से गुजर चुकी हैं l जनतंत्र,
स्वतंत्रता आदि के अर्थ की खोज करते करते आगे बढ़ रही l यह यात्रा केवल राजकीय ज्ञानी लोगों ने एक
जगह पर बैठकर की हुई तत्वचिंतन की नहीं थी अपितु अनेक आंदोलनों के माध्यम से तैयार हो रही थी इसे
भूलना नहीं चाहिए l
अमेरिका में महिलाओं को मतदान का अधिकार प्राप्त करने के लिए आधीशतितक लड़ना पड़ा l अमेरिका के
१९वीं घटनादुरुस्ती ने १९२० में वह अधिकार प्राप्त हुआ l इंग्लैंड में यह अधिकार महिलाओं को १९१८ में
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मर्यादित रूप में और पूरी तरह से १९२८ में प्राप्त हुआ l विश्व के ज्यादातर प्रजातंत्र देशों में महिलाओं को
मतदान का अधिकार अंदाजन इसी दो-तीन दशकों में प्राप्त हुआ लेकिन कुछ देशों में इसके लिए २०वीं शती
के मध्यकाल तक इंतजार करना पड़ा l अमेरिका में कृष्णवर्णीय पुरषों को मतदान का अधिकार भले ही
१८७० में मिला हो लेकिन महिलाओं को मिलने के लिए १९६५ की सुबह का इंतजार करना पड़ा l यह
अपनेआप नहीं हुआ अपितु इस हक़ के लिए दीर्घकाल तक लड़ना पड़ा l
इन देशों की तुलना में अपने देश की स्वातंत्र्योत्तर यात्रा ने अभी भी युवावस्था में प्रवेश किया नहीं है ऐसा
कहना पड़ेगा l परिपक्वता की शुरुआत युवावस्था में होती है l इस अर्थ के कारण भारतीय जनतंत्र परिपक्वता
की सीमा पर खड़ी है ऐसा शायद कह सकते थे l लेकिन डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जैसे महान घटनापंडित ने
अपना संविधान तैयार किया और उसका समर्थन करनेवाले महात्मा गांधी जी, पंडित नेहरु जी तथा सरदार
वल्लभभाई पटेल जी जैसे जनतंत्र पर गाढ़ा विश्वास रखनेवाले महान नेता होने के कारण स्वतंत्र भारत का
निर्माण होते ही अल्पावधि में बहुत ही परिपक्व एवं मजबूती बुनियादी पर खड़े संविधान ने इस देश के
प्रजातंत्र को आधार दिया l इस संविधान ने सामाजिक, आर्थिक एवं राजकीय न्याय, अभिव्यक्ति, धर्म,
श्रध्दा, उपासना का स्वातंत्र्य, अवसर एवं स्तर की समानता, हर व्यक्ति की प्रतिष्ठा, राष्ट्र की विविधता की
एकता एवं एकात्मता रखनेवाले बंधुत्व को स्वीकृत किया l हमारे संविधान ने अस्पृश्यता नष्ट कर दी और
महिलाओं को पुरषों जैसे समान अधिकार प्रदान किए l भारत की केंद्र सरकार मजबूती से काम कर सकेगी
और विविध राज्यों का शासन भी दुर्बल साबित नहीं होगा ऐसा प्रबंध किया l सत्ताधारी पक्ष पर अंकुश
रखने के लिए प्रबल विरोधी पक्ष होगा, संविधान का अर्थ केवल विविध धाराएँ तथा कानून नहीं अपितु इस
देश के कारोबार की संविधानिक एवं सार्वजनिक नैतिकता की बुनियाद होगी, सामाजिक सदविवेक बुद्धि के
अनुसार देश का कारोबार जारी रहेगा और पाशवी बहुमत के आधार पर सत्ताधारी पक्ष तानाशाही की ओर
खिंचा नहीं जाएगा ऐसी अपेक्षा भी डॉ. आंबेडकर जी ने व्यक्त करके रखी थी l पूरी तरह से विचार करके
उन्होंने अपने देश के लिए संसदीय जनतंत्र प्रणाली स्वीकृत की l
परिवारवादी पद्धति पर इस देश का कारोबार नहीं चलेगा, कोई व्यक्ति ऐसा नहीं कह सकता की मैं सर्वज्ञ हूँ
और मेरे द्वारा लिए गए सभी निर्णय सभी को बंधनकारी होंगे l हर निर्णय सांसद में चुनकर आए
लोकप्रतिनिधि चर्चा के अनुसार लेंगे ऐसी भी अपेक्षा उन्होंने व्यक्त की थी l सरकार का प्रमुख प्रतिनिधिक
होगा, देश चलाने का काम सही अर्थ में लोकप्रतिनिधि करेंगे ऐसा उन्हें अभिप्रेत था l इन लोकप्रतिनिधियों
को जनता का विश्वास कुछ समय बाद चुनाव के माध्यम से प्राप्त करना होगा l थोड़े में कहा जाए तो उन्हें
अस्वीकृत करने का अधिकार जनता को रहेगा l
परिवारवाद का अर्थ बाबासाहब की दृष्टी से ऐसा था कि जनमत का निर्णय न लेते हुए सत्ता पर रहनेवाली
‘पीढ़ी दर पीढ़ी’ l उसके साथ ही बाबासाहब ने संविधान के ‘प्रिएंबल’ याने ‘उद्देशिका’ में समाजवाद एवं
धर्मनिरपेक्षता इन दो शब्दों का समावेश नहीं किया l आगे चलकर इंदिरा गांधी जी ने संविधान में दुरुस्ती
करके इन दो शब्दों को संविधान में प्रविष्ट करने के बाद हिंदुत्ववादीयों ने इन शब्दों को डॉ. आंबेडकर जी
का विरोध था ऐसा झूठा प्रचार शुरू किया l हिंदुत्ववादीयों को इन दो शब्दों की घृणा थी यह स्वाभाविक
था l लेकिन बाबासाहब तो पूरी तरह से लोकतंत्रीय समाजवादी थे l वे देश को समाजवादी राजव्यवस्था की
ओर ले जाना चाहते थे l गरीबों का भला, दलितों का उध्दार तथा औद्योगिक प्रगति हेतु देश को समाजवाद
की आवश्यकता है अमीरों के पूँजीवाद की नहीं, ऐसा उनका दृढ़ विश्वास था l अनिर्बंध निजी धनदौलत उन्हें
स्वीकृत नहीं थी l उद्योग, खेती, जमीन एवं बीमा का राष्ट्रीयकरण होना उन्हें आवश्यक लगता था l भले ही
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बाबासाहब संविधान समिति के अध्यक्ष थे लेकिन इस समिति में कुल २९७ सदस्य थे, सभी अंतिम निर्णय
पूरी तरह की चर्चा करके ही लिए जाते थे, इस बात को हम भूल नहीं सकते l बाबासाहब के इन प्रस्तावों को
समिति के कुछ सदस्यों ने विरोध किया था l इनमें से अनेक सदस्यों की बडी मात्रा में जायदाद एवं उद्योग थे
l डॉ. आंबेडकर जी की इच्छा थी की देश को संविधान के जरिए समाजवादी राजव्यवस्था की ओर लिया
जाए l लेकिन वह संभव नहीं हुआ इस बात का उन्हें बहुत अफ़सोस था l इतना होने पर भी उन्होंने
संविधान में समाजवाद शब्द सम्मिलित नहीं किया क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि इस शब्द का समावेश
करने का अर्थ है कि जनता पर विशिष्ट प्रकार की राजव्यवस्था लादना । भविष्य में अगर इससे भी बेहतर
राज्यव्यवस्था निर्माण हुई तो उसे स्वीकृत करने का अधिकार जनता को होना चाहिए इतनी व्यापक दृष्टी
इसके पीछे थी l जिंदगी के अंतिम पड़ाव में उन्होंने महान समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया जी के
साथ मिलकर ‘रिपब्लिकन सोशालिस्ट पार्टी’ स्थापन करने का निर्णय लिया था l
बाबासाहब के अचानक निधन के कारण इस देश के इतिहास को अच्छा मोड़ देने की क्षमता रखनेवाली या
राजनीतिक योजना सफल नहीं हो सकी लेकिन बाबासाहब का समाजवाद पर जो विश्वास है उसका यह
संविधान निदर्शक है l बाबासाहब की ओर से ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द सम्मिलित न करने की वजह अत्यंत
सामान्य थी l उनकी सोच के अनुसार संविधान की बाकी सभी तत्त्व इस देश को धर्मनिरपेक्ष रखने के लिए
पूरक है अतः इस शब्द को स्वतंत्ररूप से सम्मिलित करना आवश्यक नहीं l इन तत्वों के जरिए स्वतंत्र भारत
में सभी को अपने धर्म की श्रध्दा, उपासना एवं रूढ़ी-परंपराओं को जतन करने का हक़ रहेगा l बल्कि स्वतंत्र
भारत अब व्यावहारिक तौर पर ऊँपर से नीचेतक हिंदूओं के पक्ष में जा रहा है l शासन
एवं देश की हर व्यक्ति में हिंदूओं की सवर्णों का अमल रहनेवाला है और इसके कारण दलितों की आवाज
कुचल दी जाएगी ऐसी मजबूत डर उन्हें लगता था l अगर आज हम अतीत की ओर देखते है तो उनका यह
डर कितना सही था इस बात का यकीन होता है l
बाबासाहब ने संविधान के आधार पर जाती भेद नष्ट किया और बहुजनों को आरक्षण दिया, इसके कारण
हिंदुत्ववादियों को यह देश स्वतंत्र हुआ नहीं ऐसा लग रहा था l शायद यह सब घटित होने के डर के कारण
उन्होंने १९२० के दशक में व्यूहरचना करना आरंभ कर दिया l हिटलर एवं मुसोलिनी के नाझी पक्ष के
आधार पर राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने का उद्देश केवल हिंदू संघटन नहीं था, हिंदू राष्ट्र स्थापन
करना नहीं था, तो जब संभव हो तब मनुवादी व्यवस्था इस देश में स्थापित करना यह था l अतः
हिंदुत्ववादी प्रदीर्घ मुसलमान सल्तनत के खिलाफ नहीं लड़े तथा नाझी पक्ष के आधार पर संघ की स्थापना
करने पर भी ब्रिटिशों के विरुद्ध नहीं लड़े l उनके सहभाग के बिना देश स्वतंत्र हुआ l
लेकिन देश के ज्यादातर समाज पर हमने हजारों साल धर्माधिष्ठित एवं जन्माधिष्ठित गुलामी का बोझ डाल
दिया और विदेशियों की गुलामी के साथ इस गुलामी से भी देश मुक्त हुआ इससे हिंदुत्ववादी खुश नहीं हुए l
हमारा देश विदेशी सत्ता के कब्जे में जाने की अपेक्षा मनुवादी व्यवस्था में अटके रहना ज्यादा महत्वपूर्ण था l
आजादी मिल गई और हिंदुत्ववादीयों का यह सपना भंग हो गया l देश सत्याग्रह जैसे अहिंसक मार्ग से
स्वतंत्र हुआ यह भी उन्हें पसंद नहीं था l उन्हें खूनभरी क्रांति चाहिए थी l उसके लिए प्रयास करने के लिए
उन्हें किसी ने रोका नहीं था l भगतसिंह जैसे असंख्य क्रांतिकारियों ने इस मार्ग को स्वीकृत करके उसके लिए
बलिदान भी दिया था l लेकिन जब किसी देश में सशस्त्र क्रांति होती है तब उसे मुट्ठीभर क्रांतिकारक ही कर
सकते हैं, उस क्रांति में जनता का व्यापक सहभाग नहीं होता l ऐसी क्रांति होने के बाद सत्ता चंद्लोगों के
हातों में जाती है l इस क्रांतिद्वारा हुक्म्शाही होने की संभावना बडी मात्रा में होती है l महात्मा गांधी जी के
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सत्याग्रह के मार्ग के कारण देश की करोडो आम जनता को जाती, धर्म, पंथ, भाषा तथा लिंगभेद के परे
जाकर देश के स्वतंत्रता संग्राम में सहभागी हो सकते हैं इसका साक्षात्कार हुआ l यह धागा आगे जारी रहा
और आजादी प्राप्त हुई, प्रजातंत्र व्यवस्था स्वीकृत की गई l जहाँ मनुस्मृति का हजारों वर्ष राज्य था उस देश
में एक अस्पृश्य व्यक्ति ने स्वतंत्र देश का संविधान लिखा l स्त्री शूद्रतिशूद्रों को धर्म के गुलामी से मुक्त किया,
अन्य धर्म के लोगों को भी यह संदेश दिया की यह देश तुम्हारा भी है और हिंदुओं के बराबर तुम्हें भी समान
हक प्राप्त होगा l हिंदुत्ववादीयों को लगा यह हमारी हार है l भारत का जनतंत्र उपरी तौर पर स्वीकृत किया
लेकिन दूसरी ओर अपने षडयंत्री कारनामे जारी रखे l वर्ण श्रेष्ठत्व समाजरचना के कारण सदियों से जारी
यह प्रक्रिया संविधान ने बहुजनों को कितने भी अधिकार क्यों न दिए हो अपितु उनके पास बहुत ही धीमी
गति से जानेवाली थी l अनेक दशकों तक भारतीय समाजरचना के आसपास हर क्षेत्र में ब्राम्हण समाज का
प्रभुत्व जारी रहा और आज भी है l कांग्रेस में भी हिंदुत्ववाद एवं ब्राम्हणवाद की ओर झुकनेवाले अनेक लोग
थे और अब भी है l
इस बात को हमें मानना पड़ेगा की नेहरु जी ने स्वतंत्र भारत की विविध क्षेत्रों में जो आधुनिक नींव डाली
थी उसपर देश आज भी खड़ा है । नेहरु जी समाजवाद की ओर झुकनेवाले और धर्मनिरपेक्षता का मजबूती
से समर्थन करनेवाले थे l हिंदुत्ववादियों को तिरस्कृत करनेवाली ये दो बातें l इंदिरा गांधी जी ने देश को
तगड़ा नेतृत्व दिया, स्थिरता दी, पाकिस्तान को दो टुकड़ों में विभाजित करके बांगला देश को स्वतंत्रता प्राप्त
कर दी l संस्थानिकाओं के तनखाँ बंद कर दिए l बैंकों का सरकारीकरण किया l लेकिन देश में सभी ओर और
अपनी पक्ष की सत्ता होनी चाहिए इस जिद से जो अच्छा किया उस पर पानी फेर दिया और वे घातक
राजनीति की ओर मुड गई l आपातकाल ने देश को हुक्मशाही की ओर कुछ समय तक ढकेल दिया l लेकिन
बाद में उन्होंने ही आपातकाल हटाया और प्रमाणिकता से चुनाव का सामना किया l पराजय स्वीकृत करके
फिरसे उसमें से खुद को संभलकर वे फिर सत्ता पर आ गई l उनकी हत्या के बाद सीख समुदाय पर जो
हत्याकांड हुआ इससे देश एवं कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की प्रतिमा को ठेंस पहुँची l राजीव गांधी ने संगणक
युग का आरंभ किया लेकिन श्रीलंका एवं तमिल इलाम के बारे में लिए गए गलत निर्णयों के कारण उनकी
हत्या हुई l नरसिंह राव ने डॉ. मनमोहन सिंग को देश में वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था शुरू करने की अनुमति
दी l राजीव गांधी की पत्नी सोनियाजी का राजनीति में प्रवेश हुआ, उन्होंने निर्विवाद बहुमत भी प्राप्त किया
लेकिन प्रधानमंत्री का पद उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंग को बहाल किया l कुछ समय बाद राहुल गांधी भी
कांग्रेस के नेता बने l प्रियंका ने भी राजनीति में प्रवेश किया l वास्तव में परिवारशाही इस देश में कोनसे
क्षेत्र में नहीं ? विपक्ष में हम कहेंगे कि राजनीति में परिवारशाही को अगली पीढ़ी के लोगों को जनता की
अनुमति – हाँ या ना लेने की आवश्यकता होती है; बंधन होता है l लेकिन हिंदुत्ववादियों ने अपने पक्ष के
अनेक बच्चों को राजनीति में लाकर नेहरु परिवार की परिवारशाही पर गहरी आलोचना करने की दोहरी
नीति अपनाई l अगर नेहरु परिवार ख़त्म किया गया तो कांग्रेस भी समाप्त होती है इसका उन्हें एहसास था l
दुर्दैव इस बात का है कि कांग्रेस ने भी केवल नेहरु परिवार ही हमारा आधार नहीं है ऐसा कभी भी अपनी
कृति से दिखाई नहीं दिया l
कांग्रेस ने इंदिरा गांधी जी के शासन में समाजवाद इस शब्द का समावेश संविधान के मूल तत्वों में किया l
लेकिन दूसरी ओर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर सफर जारी रखी l कांग्रेस के शासन में हमारे देश में
विविध क्षेत्रों में भरसक प्रगति की l देश अनेक योजनाओं में आधुनिकता की ओर बढ़ता गया l धन इकठ्ठा हो
गया l इस संपत्ति के कारण अनेक गरीब लोगों को माध्यमवर्ग में लाकर खड़ा कर दिया l मध्यमवर्ग के लोग
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उच्च् मध्यमवर्गीय बन गए और नए धनवान लोग निर्माण हुए l धनदौलत आ गई, विज्ञान की सहायता से
उपभोग के साधन हाथ में आ गए, कीमती वाहन आ गए, हवाई जहाज से प्रवास, विदेशदौरा हमेशा की
तरह हो गया, मकान उच्चभू हो गए l कीमती होटल बडी मात्रा में निर्माण हुए, चमकदार मॉल्स निर्माण
हुए, मल्टिप्लेक्स में एक ही समय हजार-दो-हजार का खर्च यह हर दिन की बात हो गई l लेकिन दूसरी ओर
आर्थिक एवं स्वाभाविकतः सामाजिक विषमताभी बढ़ गई l दारिद्रय चरमसीमा पर पहुँच गया l जिनका
आर्थिक स्तर ऊँचा हो गया उनके गरीबों के साथ संबंध टूट गए l वे ‘इंडिया’ नामक अलग देश में जीवन
बिताते रहे l खासगीकरण की नीति से शिक्षण एवं आरोग्य का व्यापारीकरण होता गया और आम जनता के
बस की वह बात नहीं रही l बहुत बड़ा समाज शिक्षा से वंचित रह गया l आर्थिक विषमता के कारण नई
वर्णव्यवस्था निर्माण हुई l समाजिक विषमता की एक विशेषता होती है l सामाजिक दृष्टी से उच्च स्तर का
जो वर्ग होता है वह आर्थिक नब्ज-सूत्र अपने ही हाथ में रखने में यशस्वी होता है l अतः सत्ता किसी की भी
हो हर क्षेत्र के सूत्र सामाजिक दृष्टिकोन से उच्च स्तर के समाज के हाथ में होते हैं l देश में पहले से ही हजारों
वर्षों से धर्माधिष्ठित वर्णव्यवस्था अस्तित्त्व में है और उसमें वृद्धी करनेवाली यह नई वर्णव्यवस्था l सत्ता
किसी की भी हो अनेक क्षेत्रों के मूल सूत्र पारंपारीय ब्राम्हणवादी तथा आर्थिक स्तर बढ़ जाने के कारण
‘नवब्राम्हणवादी’ लोगों के हाथों में रह गए l हिंदुत्ववादीयों ने अत्यंत सूचारूढंग से इस वर्ग को अपने हाथ
में ले लिया l इसके साथ साथ आरक्षण का मुद्दा उठाते हुए विदेश में स्थित उच्चशिक्षित वर्ग की मदद से
विदेश में भी जाल बिछाया l हिंदुत्ववादियों की देश को खोखला बनाने की प्रक्रिया को जनता पक्ष के प्रयोग
के कारण बहुत बडी गति मिल गई l इस प्रयोग में समाजवादी पक्ष, संघ का जो राजकीय चेहरा है उस
जनसंघ के साथ विलीन हो गया और भारत आजाद होने पर पहलीबार संघ को सीधे सत्ता में प्रवेश मिल
गया l इस पक्ष का कायम रहना असंभव था l जनता पक्ष में फुट पड़ने पर मूलतः जो जनसंघ, वह बाहर पड
गया और दूरदृष्टि दिखाकर उन्होंने पुरानी शराब, भाजप नामक नई बोतल में डालकर ठंडे दिमाग से अपनी
सफर जारी रखी l इस षडयंत्र को पहचानकर हम भी स्वतंत्र न होकर समाजवादी लोग जनतादल नामक
नए पक्ष के प्रति निष्ठा साबित करते रहे, अपने ही समाजवादी नेताओं को दूर रखकर वी.पी.सिंग जैसे
आयात किए हुए नेताओं का नेतृत्व निर्माण करते रहे l वी.पी. सिंग जी तो मंडल आयोग स्वीकृत करके
‘मंडल मसीहा’ बन गए l हिंदुत्ववादियों का दलित द्वेष इसके कारण बडी मात्रा में व्यक्त हुआ l समूचे देश में
आरक्षित स्थानों के विरुद्ध अभाविप जैसी विद्यार्थी संघटना के नेतृत्व में सवर्ण विद्यार्थी खड़े हो गए l
दलितों के विरोध में आंदोलन करके आगे जाना भाजप की सत्ता को क्षति पहुँचे l यह बात ध्यान में आने पर
‘मंडल’ के विरोध में ‘कमंडलू’ हाथ में पकड़ने का निर्णय लिया गया l यह ‘कमंडलू’ अब ‘मंडल’ के न लड़ते
हुए ‘मस्जिद’ के विरोध में लड़ेगा ऐसा भी तय हुआ l मुस्लीम द्वेष हिंदू समाज को इकठ्ठा करता है और वह
एक मतों का बक्सा बन जाता है l इस बक्से के आधार पर पहले सत्ता काबिज करके और हिंदू राष्ट्र घोषित
करके मनुस्मृति को संविधान के स्थान पर प्रथापित किया तो दलितों का उच्चाटन करना आसान होगा l
इसलिए मुसलमान इस देश के दुश्मन हैं ऐसी रचना पहले से ही की जा रही थी l हिंदुत्ववादियों के बालबच्चे
अमेरिका जैसे देश में दस-पंद्रह सालोंतक रहकर वहाँ का नागरिकत्व प्राप्त करके भारत में सैंकडों सालों से
रहनेवाले मुसलमानों को राष्ट्रीयत्व नामंजूर करके हिंदुराष्ट्र की निर्मिती के लिए आर्थिक मदद करने लगे l
बाबर ने इ.स. १५२८ में अयोध्या में निर्माण की हुई मस्जिद रामजन्मभूमि होने के कारण गिराकर वहाँ
राम मंदिर निर्माण होना चाहिए इस माँग हेतु विश्व हिंदू परिषद् ने १९८० से देश में विद्रोह निर्माण करना
आरंभ कर दिया था l इसलिए चुनाव में केवल दो स्थानों पर जहाँ भाजपा था वह १९८९ में ८९ सीटों पर
पहुँच गया l अतः इस मुद्दे पर देश में असंतोष फ़ैलाने का काम शुरू हो गया l लालकृष्ण अडवाणी के नेतृत्व
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में २५ सितंबर १९९० में सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा शुरू हुई l उस समय भाजपा के समर्थन से केंद्र में
वी.पी. सिंग का शासन था l ‘एअरकंडीशन टोयोटो वॅन’ का रथ में परिवर्तन की हुई यह रथ यात्रा अनेक
राज्यों में से, सैंकड़ों गाँवों से १० हजार की.मी. का फासला काँटकर गई l इस रथयात्रा में अडवाणी के एक
सामान्य सहयोगी के रूप में हाथ में भोंगा लेकर नरेंद्र मोदी संचार कर रहे थे l रथयात्रा की सफ़र में हर
स्थान पर अडवाणी को धनुष-बाण, तलवार तथा त्रिशूल भेटस्वरुप दिया जा रहा था l रास्ते में दंगा-फसाद
होने लगे l ‘गर्व से कहो हम हिंदू है’ इस घोषणा को तथा कारसेवक नामक संज्ञा को रथयात्रा ने जन्म दिया l
रथयात्रा दिल्ली में पहुँच ने पर पूरा माहौल पूरी तरह से भड़क उठा फिर भी प्रधानमंत्री वी.पी.सिंग ने
अडवाणी तथा अन्य नेताओं को प्रक्षोभक भाषण देने के उपलक्ष्य में गिरिफ्तार नहीं किया l अडवाणी को
२३ अक्तूबर १९९० को बिहार के मुख्यमंत्री श्री. लालूप्रसाद यादव ने गिरफ्तार किया l लालूप्रसादजी पर
हिंदुत्ववादियों का जो गुस्सा था उसका यही एक मात्र कारण था l आगे चलकर लालूजिको भ्रष्ट ठहराकर
कारावास में डाल दिया l डेढ़ लाख कारसेवकों को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायमसिंग ने गिरफ्तार किया
l फिर भी ४० हजार कारसेवक हाथ से छुटकर आगे जाते रहे l उसवक्त जो लाठीहमला हुआ उसमें कुछ
कारसेवकों की मृत्यु भी हो गई l इसके कारण भाजप ने मुलायमसिंग पर मुसलमान प्रेमी ऐसी स्थायीरूप में
मुहर लगाई l इस रथयात्रा के दरमियान देश में कुल १६६ धार्मिक दंगे हो गए और ५६४ मृत्यु l इसमें से
ज्यादा तर मुसलमान थे l इस घटना से देश की सामान्य जनता को जहिरिली हिंदुत्व की दीक्षा देने का कार्य
किया गया यह बात सच है l भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने से वी.पी.सिंग की सरकार गिर गई l
चंद्रशेखरजी ने कांग्रेस की मदद से अल्पावधि के लिए जनता दल से बाहर निकलकर एक अत्यंत सक्षम
शासनकाल दिया l वी.पी.सिंग के प्यार में पागल समाजवादियों ने इसके लिए मूलतः अपनेही नेता को कभी
भी माफ़ नहीं किया l १९९१ के सार्वजनिक चुनाव में भाजपा ८९ से १२० सीटों पर पहुँच गया l कांग्रेस
की सरकार आई और नरसिंह राव प्रधानमंत्री चुने गए l इसके बाद हिंदुत्ववादी अधिक आक्रमक बन गए l
उनके आत्मविश्वास में वृद्धी हो गई l सीधे बाबरी मस्जिद गिराकर राममंदिर खड़ा करने के लिए अयोध्या में
चले गए l ६ दिसंबर १९९२ में जब बाबरी गिर रही थी तब नरसिंह राव ठंडे दिमाग से शांति से पूजा कर
रहे थे l नरसिंह राव एक विद्वान एवं सक्षम नेता थे l उन्होंने अपने कार्यकाल में बहुत अच्छा काम किया
लेकिन बाबरी गिरते समय उनके द्वारा किया गया वर्तन अतर्क्य था l उसके बाद मुंबई में जो दंगा हुआ उसमें
कम से कम ९०० लोग मरे गए l इन सभी का परिणाम अंत में अल्पावधि के लिए अटल बिहारी वाजपेयी
प्रधानमंत्री बनने में हुआ l यह सरकार केवल १६ दिनों में ढह गया l इसके बाद जनता दल के देविगौडा
तथा इंद्रकुमार गुजराल हरेक की एक वर्ष से भी कम कालावधि की सरकार नियुक्त हुई और उसके बाद
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने अपना कालावधि पूरा किया l यह सत्ता अगले चुनाव
में अप्रत्याशित तौर पर कायम नहीं रख सकी लेकिन देश के सभी क्षेत्रों में पाँव फ़ैलाने का अवसर
हिंदुत्ववादियों ने अच्छी से पूरा किया l उसके बाद डॉ. मनमोहन सिंग के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार आई l
इस सरकार ने करीबन १० सालों तक अपनी सत्ता कायम रखी । इन सभी शासन काल में हिंदुत्ववादी
उचित ढंग से देश को खोखला कर रहे थे l दृक-श्राव्य क्षेत्र को अपने हाथ में ले रहे थे l उनकी मदद से झूटी
प्रचार मोहिमों का आयोजन किया जा रहा था l हिंदुत्ववादी अनेक दशकों से भविष्य की सत्ता की बोआई
करते रहे l हिंदुत्ववादियों का असली चेहरा मनमोहनसिंग, सोनियाजी, राहुल या कांग्रेस का कोई नेता
पहचान नहीं सका l वैसे देखा जाए तो देश के हर बगैर भाजपा प्रधानमंत्री को हिंदुत्ववादी प्रणाली ने भ्रष्ट
ठहराकर बदनाम करने का और अगर यह संभव नहीं हुआ तो उसका चारित्र्यहनन करने का प्रयास हमेशा
किया l इनमें से किसी के भी ऊँपर के आरोप सिद्ध नहीं हुए l गुजरात राज्य की सत्ता, नरेंद्र मोदी जैसे
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अपरिचित चेहरे का चयन, वे सत्ता में आते ही घटित हुआ गोध्रा हत्याकांड, उनमें से गुजरात में शुरू हुआ
दंगा-फसाद, उसवक्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी के मना करने पर भी मोदी को दिया हुआ समर्थन,
(पान१३) आतंकवादियों की जड़ उखाड़ देनेवाले हेमंत करकरे जैसे उच्च पदस्थ अधिकारी की मृत्यु यह
कल्पनातीत है l उनके साथ-साथ अन्य दो उच्च पदस्थ अधिकारियों – साळसकर एवं कामथे को अपनी जान
गँवानी पड़ी l इन सभी घटनाओं के बारे में महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस संचालक श्री मुश्रिफ ने ‘हु किल्ड करकरे?
– ( करकरे को किसने मारा? ) नामक अभ्यासपूर्व किताब लिखकर अनेक सवाल खड़े किए तथा अनेक बातों
की विस्तृत जानकारी सम्मुख रखी l
इस कालावधि में सरकारी यंत्रणा के ‘कॅग’ के मुख्य विनोद राय जैसे उच्च पदस्थ हिंदुत्ववादीयों ने – जिनकी
निष्ठा सरकार तथा देश की अपेक्षा संघ के साथ बडी मात्रा में थी, उचित ढंग से सत्ताधारी पक्ष को भ्रष्ट
साबित करने का काम शुरू किया l मिडिया के हिंदुत्ववादीयों ने तथा हिंदुत्ववादी
समाजमाध्यमों ने कांग्रेस के विरोध में हँकवा कर देना आरंभ किया l २००७ में टू जी स्पेक्ट्रम बिक्री में देश
का कम-से-कम एक लाख पचहत्तर हजार करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ ऐसा विनोद राय ने दावा किया l
देश सुलग उठा l यह षडयंत्र समझमें न आने के कारण मनमोहनसिंगजी ने अपने ही मंत्रियों को गिरफ्तार
किया l मोदी सत्ता में आने के बाद विनोद राय सेवानिवृत्त हो गए और उन्होंने खुलेआम कबुली दी की मैंने
जो आरोप किया वह आँकड़ा अंदाजन था l आगे चलकर इस टू जी घोटाले से संबंधित सभी लोग मोदीजी के
शासन काल में निर्दोष साबित हुए l बोफर्स मामला भी भाजपा बारबार दोहरा रही थी लेकिन इससे कुछ
साबित नहीं हुआ l कांग्रेस को बदनाम करने में यशस्वी होते रहे l दूसरी ओर नेहरु परिवार, सोनिया तथा
राहुल के विरोध में चारित्र्यहनन का हमेशा हथियार चलाया जा रहा था l यह सब जब हो रहा था तब देश
के राजकीय क्षितिज पर केजरीवाल नामक धूर्त एवं महत्वकांक्षी हस्ति का अचानक उदय हुआ l
आय.आय.टी. से पदवी लेकर आय.आय.एस. होकर सरकारी नोकरी में उच्च पद पर वे आसिन हुए और देश
के लिए त्याग करके मजबूत वेतनवाली नौकरी लताड़कर उन्होंने एन.जी.ओ. शुरू की l इस महाशय ने
दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षण विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया था l इस आदमी ने अन्ना हजारे नामक
महात्मा गांधी का व्यंगचित्र के रूप में शोभा देनेवाला उतनाही घँटा हुआ तथा अल्पशिक्षित, व्यक्ती
प्रतिगांधी के रूप में पेश किया l इन लोगों ने ५ एप्रिल २०११ को जनलोकपाल नामक आंदोलन छेड़ दिया l
कांग्रेस के भ्रष्ट शासन पर एक ही उपाय ‘जनलोकपाल’ l रामलीला मैदान पर अन्ना की १९ अगस्त २०११
से उपोषणलीला शुरू हुई l देश के अनेक मॅगसेस अॅवॉर्ड विजेता इस आंदोलन में कैसे सहभागी हो गए यह
भी एक गूढ़ है ? योग उद्योगपति रामदेवबाबा तथा पूर्व लष्कर प्रमुख वी.के.सिंग भी सहभागी हुए l हमेशा
की तरह देश के समूचे समाजवादियों तथा पुरोगामी लोगों को गांधीजी के साथ साधर्म्य लगनेवाला नेता
अपनेआप मिल गया और उत्साह के साथ साथ उन्होंने दुसरे स्वतंत्रता संग्राम की तैयारी शुरू की l यह
आंदोलन प्रत्यक्षरूप में संघ द्वारा चलाया जा रहा है इसका उन्हें पता नहीं लगा l इस आंदोलन के समर्थन में
अमेरिका, वर्ल्ड बैंक, आय.एम.एफ. भी अप्रत्यक्षरूप में होने की संभावना थी l उसी स्थिति में दिल्ली में
निर्भया प्रकरण हुआ l हररोज खुलेआम देश में कहीं ना कहीं दलित महिला पर बलात्कार होता है और
उनकी हत्या होती है, अनेक सालों से ऐसा होता आ रहा है l इसके लिए यह देश भड़क उठा ऐसा कभी
दिखाई नहीं दिया l २९ दिसंबर २००६ में हुए खैरलांजी हत्याकांड से जनता की चेहरे की लकीरे भी नहीं
हिल सकी l लेकिन १६ दिसंबर २०१२ को निर्भया प्रकरण हुआ और देश के कोने कोने में सफ़ेद टोपी
पह्नकर युवक-युवती निषेधार्थ खड़े हो गए l लेकिन भाजपा के सत्ताकाल में ४ जून २०१६ को उनाऊ,
जनवरी २०१८ में कथुआ, तथा १४ सितंबर २०२० में हाथरस जैसी अत्यंत भयानक बलात्कार तथा
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हत्याओं के मामले हुए लेकिन युवाओं के माथे पर निषेध की टोपी नहीं चढ़ सकी l कांग्रेस कि
गलती ऐसी हुई की २६/११ या निर्भया प्रकरण के मामले में उनके नेताओं ने तुरंत संवेदनशील प्रतिक्रिया
देना आवश्यक था l वे उन्होंने नहीं दी l यह सब एक के बाद एक घटित हो रहा था, यह घटित हो रहा था
या अपघात था, या इसके पीछे कोई अदृश्य शक्ति ये सब कर रही थी इसके उत्तर आज ना कल ढूँढने पड़ेंगे l
लेकिन कुछ भी हो अंत में २०१४ के सार्वत्रिक चुनाव में भाजपा को २८२ सीटें मिलकर बहुमत मिला l
मतों का प्रतिशत था केवल ३२% । बहुमत प्राप्त किए हुए पक्ष द्वारा अपना नेता चुनना होता है यह संसदीय
जनतंत्र का संकेत अव्हेर कर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी दिल्ली के तख्त पर विराजमान हुए l मोदी
उथला तथा प्रभावी वक्ता हैं l उन्होंने कांग्रेस की गलतियों पर निर्देश करते हुए आश्वासनों की बौछार की l
मोदी के इस वकृत्व के झंझावत को काबू में रखनेवाला नेता कांग्रेस के पास नहीं था l प्रणव मुखर्जी को
राष्ट्रपति बनाकर सक्रिय राजनीति से बाहर निकालने की गलती कांग्रेस कर बैठी l मोदी आ गए और अन्ना
गायब हो गए l मदद करनेवाली हर व्यक्ति को उपहार के रूप में पद बाँटे गए l यह प्रथा आज भी जारी है l
नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने का अर्थ कांग्रेस की गच्छंति तथा भाजपा सत्ता में आना इतना ही नहीं था l
भाजपा संघ का राजकीय चेहरा है l भाजपा हुक्मशाही, एकाधिकारशाही, हिंदुत्ववाद या मनुवाद पर
विश्वास रखनेवाला है l संघ में आज भी महिलाओं को प्रवेश नहीं है l सरसंघचालक राजेंद्र सिंग, राजपूत थे l
उनके अलावा सभी संघचालक जाती से ब्राम्हण थे l संघ के सरसंघचालक बहुजन या दलित बनने की
संभावना नहीं, महिला सरसंघचालक बनने का सवाल ही नहीं उठता l संघ- गांधी हत्या तथा मुख्यतौर पर
हिंसा का समर्थन करता रहा है l संघ का आर्थिक विचार चुटकीभर पूँजीवाद का है l संघ को स्वातंत्र्य संग्राम
अमान्य था l संघ ने भारतीय स्वातंत्र्य, संविधान, राष्ट्रिय प्रतिक तथा तिरंगा इनमें से किसी को स्वीकृत नहीं
किया l संघ को हिंदू धर्म के परिवर्तनवादी, पुरोगामी मान्य नहीं है l देश की बुवाबजी, भोंदू बाबा तथा
बाबा महाराज का संघ ने कभी विरोध नहीं किया l बल्कि उनका समर्थन किया और इन सभी ने हिंदुत्व की
सहायता की l संघ ने आरक्षण का हमेशा विरोध किया l इस विरोध के मासूम कारण देने में उनकी कोई
बराबरी नहीं कर सकता l संघ को विज्ञानवादी समाज नहीं चाहिए l संघ पूरे देश में अन्यान्य नाम से अनेक
संघटनाओं तथा संस्थाओं का निर्माण करके उन्हें चलता है l इन सभी का मिलकर संघ परिवार बन जाता है
l संघ की अपने परिवार पर मजबूत गिरफ्त है लेकीन यह रिमोकंट्रोल है l संघ परिवार के हरेक की निष्ठा
देश की अपेक्षा संघ एवं धर्म के प्रति बडी मात्रा में है l अतः विदेश में जाकर यह निष्ठा कायम रहती है l संघ
का अंतिम ध्येय हिंदुराष्ट्र है लेकिन संघ को यह हिंदुराष्ट्र मनुवादी व्यवस्था पर अभिप्रेत है l मनुवादी
व्यवस्था स्त्री शुद्रतिशुद्रों की गुलामी की व्यवस्था है l इस व्यवस्था में अन्य धर्म के लोगों को स्थान नहीं l यह
व्यवस्था प्राचीन वेद-स्मृति-पुरानों पर खड़ी रहनेवाली है l ब्राम्हण इस व्यवस्था के शीर्षभाग पर
रहेगा यह सच है ।
ऐसे संघ ने मोदी जैसी ओबीसी व्यक्ति को बढ़ावा देकर देश के प्रधानमंत्रीपद पर बिठाया यह बात कुछ
हजब नहीं होती l लेकिन प्राचीन भारत में ब्राम्हण कभी लड़ते नहीं थे, लड़ने का काम क्षत्रिय तथा बहुजनों
का था l उनके मत के अनुसार मोदी मुसलमानरूपी रावण के विरोध में लड़नेवाले प्रभुराम हैं l अमित शाह
उनके हनुमान है l अगर प्रस्थापित करना है तो मुसलमानद्वेश का प्याला पिलाकर समूचे हिंदू समाज की
एकजुत मतपेटी प्राप्त करने में ही होशियारी है l यह काम निर्वेधता से पूरा करने का काम मोदी की प्रतिमा
गगन की तरह बडी दिखाने में संघ परिवार पीछे नहीं हटा l मोदीजी की स्वप्रेमी, स्वमशगूल तथा
हुक्मशाही मनोवृत्ति को उन्होंने पूरा प्रोत्साहन दिया l मोदी जी ने भी अपनी व्यावसायिक तथा श्रध्दालुओं
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की स्वतंत्ररूप से प्रचार यंत्रणा खड़ी की है l हिंदुराष्ट्र की ओर मार्गक्रमणा देश का जनतंत्र तथा संविधान का
एक एक आधारस्तंभ ध्वस्त किए बिना असंभव है l इसके लिए देश की जनता को झूठी आशा, विकास तथा
आर्थिक प्रगति का सपना दिखाने का काम शुरू किया गया l विकास के नाम पर देश चुटकीभर उद्योगपति
लोगों को बिकने का काम शुरू हुआ l सार्वजनिक संपत्ति कौड़ी के भाव से नीलामी होने लगी l देश की
आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी l रूपया एवं जीडीपी की पिचेहाट रुक नहीं सकी l बढ़ती हुई महँगाई एवं
बेरोजगारी को रोक लगाना मुश्किल हो गया है l नोटबंदी, तालाबंदी तथा
जीएसटी जैसे एक के बाद एक निर्णय मंत्रिमंडल को बिना पूछे मोदीजी खुलेआम घोषित करने लगे l सीएए,
कृषि कानून सांसद में चर्चा न होकर स्वीकृत होने लगे l आम आदमी का जीना हराम हो गया l अल्पसंख्य
डरने लगे l दूसरी ओर इस अपयश को छुपाने के लिए हिंदुत्ववादी परिवार आवश्यकतेनुसार भावनिक
विद्वेश का माहोल खड़ा करने लगा l मोदिविरोध का अर्थ है राष्ट्रद्रोह ऐसी सुलभ व्याख्या करके हर विरोधी
आवाज दबोचने की क्रिया शुरू हुई l सहायता के लिए कब्जे में ली हुई गोदी मीडिया तो था ही l आयटी सेल
की किराए की ट्रोल की अक्तित गरल ओंकने तथा विरोधों के छिलके उड़ाने का काम करती थी l केवल
चुनाव जितना इतना ही ध्येय बन गया l इसके लिए किसी भी प्रकार के साधनों का इस्तेमाल करके
साधनशुचिता की हर मर्यादा तोड़ दी गई l भाजपा चुनाव जितनेवाला यंत्र होने लगा l मदद हेतु इ.वी.एम.
नाम संदेहयुक्त यंत्र था l देश का प्रशासन, न्यायव्यवस्था, लश्कर, पुलिस यंत्रणा, जाँचयंत्रणा तथा शिक्षण
संस्थाओं में योग्य-अयोग्य के निकष अमान्य करके संघनिष्ठ लोग तैयार करने पर जोर दिया गया l पूरा देश
मोदी तथा अप्रत्यक्षतौर पर संघ नियंत्रित करने लगा l ३४% मतोंपर केंद्र में २०२९ साल में ३०३ सीटें
प्राप्त करके बहुमत हासिल किया लेकिन अनेक राज्य काबू में नहीं आ रही थी l समाजवादी गुट राजकीय
ताकत गवाकर बैठे थे, कम्युनिस्ट कमजोर होते जा रहे थे l अगर एक बार कांग्रेस
पर हमला बोल दिया कि देशस्तर पर प्रबल विरोधी पक्ष का अस्तित्व ख़त्म होता है l इस कार्य को बडी
तेजी से हाथ में लिया गया l दूसरी और प्रादेशिक पक्षों में इ.डी.; सी.बी.आय तथा पद एवं पैसों का लालच
दिखाना ओर इसके आधार पर उनमें दरार निर्माण करना और सत्ता काबिज करना यह नीति अपनाई गई l
हुक्मशाही में सबसे पहले प्रचार यंत्रणा एवं मीडिया को कब्जे में लिया जाता है l हुक्मशाही का अंतिम
शिकार होती है न्यायव्यवस्था l ऐसा समय जब किसी देश में आता है तब उस देश की स्वतंत्रता तथा
संविधान की धोखे की घंटा बजना शुरू हो जाती है l
हमारा देश स्वतंत्रता का अमृत महोस्तव मना रहा है अर्थात लोकशाही के युवामंच पर खड़े होकर एक ही
जल्लोष शुरू हुआ है l अनेक हिंदुत्ववादियों ने मोदी की सत्ता आने पर खुलेआम कहा था कि भारत को
१९४७ में स्वातंत्र्य मिला यह हमें मंजूर नहीं है l यह देश पारतंत्र्य में ही था l अब देश १९४७ के बाद किसे
के पारतंत्र्य में था यह सूचित नहीं किया लेकिन इन हिंदुत्ववादीयों के मतानुसार २०१४ में मोदी सत्ता में
आएँ और देश स्वतंत्र हुआ l तो अब हमारे मन में ऐसा सवाल खड़ा होता है कि ये लोग इस देश के स्वतंत्रता
का अमृतमहोत्सव क्यों मना रहे है?
देश की सच्ची स्वतंत्रता की मृत्यु घंटा का तो यह जल्लोष नहीं है ?

