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 *निरर्थक है मुद्देविहीन बहस*

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शशिकांत गुप्ते इंदौर

हम प्रतिमाह कैलेंडर के पन्ने पलट ते हैं। सिर्फ कैलेंडर के पन्ने पलटते हुए हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में पहुंच गए हैं।
सवाल यह है कि,हम मानसिक रूप से इक्कीसवीं सदी में कब पहुंचेंगे?
उक्त सवाल जेहन में उपस्थित होने का कारण है,जब किसी व्यक्ति पर भ्रष्टाचार के आरोप सार्वजनिक होते हैं? भ्रष्टाचार भी करोड़ों रूपयों का होता है? मतलब किसी का पूरा तन भ्रष्टाचार में सना होने के बावजूद भी सनातन धर्म की दुहाई देने में हमें किसी तरह का कोइ संकोच नहीं होता है।
इस दोहरी मानसिकता का कारण यह है कि,हम बाह्य स्वरूप में सज संवर कर स्वयं को प्रगतिशील समझते हैं। लेकिन वास्तव में हमने स्वयं को यथास्थतिवादी सोच में जकड़ रखा हैं।
यह मानसिकता ठीक वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था जैसी ही है।
अपने देश में तकरीबन सभी राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त प्रायः दिखाई देता है। आश्चर्य सभी दल विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में राजनीति करते हैं।
उपर्युक्त मानसिकता संकीर्ण सोच की द्योतक है। इसीलिए हम पूंजीवाद,केंद्रीय करण, व्यक्ति पूजक,यथास्थितिवादी और इन सारे अलोकतांत्रिक सोच के साथ विद्रोह करने का साहस कर नहीं पाते हैं।
उक्त मानसिकता पर व्यंग्य करते गीत का स्मरण होता है।
यह गीत सन 1960 में प्रदर्शित फिल्म पतंग का है। इस लिखा है, गीतकार राजेंद्र कृष्णजी ने।
तू आप है अपना चोर,काहे रपट करे कोतवाली
वही बगीचा लूटा रे तूने,था तू जिसका मालि
जिस पर बैठा मूरख काट रहा वही डाली
इस मानसिक संकीर्णता का मुख्य कारण है। हम देश-काल और परिस्थिति के नियम को भूल जातें हैं।
तात्पर्य जबतक हम मानसिक रूप से स्वयं को update नहीं करते हैं,तबतक हम दकियानूसी सोच से बाहर नहीं आएंगे।
हमे अपने सनातन सत्य को भी update करना होगा।
नहीं तो एक और हम पाश्चात्य असभ्यता को अंगीकृत करते रहेंगे और दूसरी ओर हमारी अपनी से सुसंस्कृत सभ्यता से विमुख होते जाएंगे।
इस मुद्दे पर व्यापक बहस टीवी की आवश्यकता है।

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