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अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भागीदारी घटने का मतलब भुखमरी की ओर बढ़ता देश

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रोहित मिश्रा

स्वतंत्रता के बाद का दौर वह दौर था जब कृषि क्षेत्र भारत देश के अर्थव्यवस्था की परिभाषा को आकार दे रहा था और सकल घरेलू उत्पाद में 51.9 % की भागीदार था और इस 51% पर देश की 93% जनसंख्या जीवन यापन कर रही थी,और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर सिर्फ 11% के आसपास योगदान दे रहा था और सेवा क्षेत्र लगभग 34.5 % का भागीदार था।
1951 में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के नाम पर कुछ अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गई कम्पनियां जो लगभग पूर्वी भारत जैसे बंगाल और पश्चिमी और दक्षिणी भारत को छूती हुई कुछ एक्का दुक्का कम्पनियां थी ज्यादातर टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज थी और सर्विसेज के नाम पर कुछ अंग्रेजियत होटल और फिर जमशेद जी द्वारा बनाया हुआ होटल ताज,फिर भारत सरकार बनने के बाद डाक एवम तार सेवाएं, यातयात सेवा,शिक्षा सेवा, और रेल सेवाएं थी और कुछ बैंकिंग सेक्टर था,जिसमे देश की लगभग 7 प्रतिशत जनसंख्या का जीवन यापन निर्भर था।

फिर अगले एक दशक में कृषि के योगदान का ग्राफ घटकर 47% के आसपास आ गया और सर्विसेज और मैनुफैक्चरिंग का ग्राफ लगभग बढ़ गया और समयानुसार अगले दो दशक में कृषि क्षेत्र में एक बड़े लेवल पर डाउनफाल आ गया था। 1960 से 1965 के दशक में कृषि क्षेत्र पर सरकारें उतना बेहतर काम नही कर पायीं क्योंकि उन्हें लगा कि कृषि तो वैसे ही अग्रणी है तो ज्यादा प्रभावित नही होगा और सरकार ने जमकर उद्योगों के विकास के नागरिकों के भागीदारी पर ज्यादा ध्यान दिया जिसमें कई सारे पीएसयूज और महरत्ना और नवरत्ना जैसी कम्पनियों का ढाँचा बनना सुरु हुआ,बैंकों की स्थापना और मुद्रा भंडार को स्थापित करने जैसे सेवाएं सुरु की गई।

1970 से लेकर 1980-1985 सरकार की सोच लगभग कामयाब होती दिखी जिसमें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के स्थिति थोड़ी बेहतर हुई और सर्विसेज सेक्टर अपने कॉन्स्टेंट ग्रोथ के साथ आगे बढ़ता रहा,अब सर्विस सेक्टर की भागीदारी कृषि क्षेत्र से आगे निकल चुकी थी लेकिन तबतक भी हिंदुस्तान की 85 प्रतिशत जनसंख्या कृषि आधारित थी। सेवा क्षेत्र के ग्रोथ होने का कारण निश्चित थी कि चाहे मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का ग्राफ बढ़े या फिर एग्रीकल्चर क्षेत्र का,दोनो में अल्टीमेट एन्ड कंज्यूमर तक उत्पाद की पहुंच सर्विस द्वारा ही होगा।
हालाकि 1980-1985 तक तत्कालीन सरकारों ने फिर कृषि क्षेत्र की बेहतरी के लिए काम किया ,बजट एलोकेशन को और बढ़ाया,मृदा उर्वरा शक्ति पर काम किया गया, अच्छी गुणवत्ता और उत्पादकता वाली बीजों की आपूर्ति सुनिश्चित की गई। किसानों की उपज व प्रसंस्करण व मार्केटिंग के लिए पहली बार सस्ते दरों पर लोन की व्यवस्था सुरु की गई। किसानों के बेहतरी में सबसे बड़ी भूमिका भूमि अधिग्रहण ने निभाया जिसमे एक निचले स्तर के कमजोर वर्गों को भी किसान के रूप में बदला जा सका।
फिर इन सबके बावजूद भी 1990 का सुरुआती साल एक परवान चढ़ती हुई भारतीय अर्थव्यवस्था को एक ग्रेट रेससन देखना पड़ा हालाकिं उस दौर में सरकार ने बहुत ही बेहतरीन तरीके से कंट्रोल किया और फिर सुरु हुआ मिक्स्ड इकॉनमी का जादुई इकनोमिक ग्रोथ जिसमे पब्लिक प्राइवेट पार्टनर शिप के दरवाजे खोले गए,एफडीआई पर सरकार का एक बहुत बड़ा स्टैंड रहा जिसमे कंट्रोलिंग अपने हाथ मे रखते हुए प्राइवेट इन्वेस्टर्स को न्योता दिया गया जिससे देखते देखते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स और सर्विसेज सेक्टर की जीडीपी शेयरिंग % सुरुआती दौर से दोगुने पर पहुंच गए और कृषि क्षेत्र की भागीदारी आधी हो गयी और जो घटी तो घटती ही गयी हालाकि फिर भी इस क्षेत्र ने अभी भी सबसे ज्यादा रोजगार देने का जिम्मा उठा रखा है।

1996 से 2001 तक सेवा क्षेत्र में क्रांति पैदा करने की आधारभूत सरंचना बनाई जा चुकी थी और फिर 2001 से लेकर आजतक सेवा क्षेत्र ने ग्रोथ की है वो वाकई एक क्रांति से कम नही,लेकिन दुखद ये रहा कि इन सबके पीछे जो छूटा वो रहा कृषि क्षेत्र,जिसकी सुध लगभग सभी सरकारों ने छोड़ जहां चौधरी चरण सिंह जी की सरकार और फिर इंदिरा जी और उसके बाद राजीव जी की सरकार ने कृषि के योगदान के लिए सतत प्रयास करते रहे वही पी वी नरसिम्हा राव जी से लेकर और 2004 तक अटल बिहारी बाजपेयी जी की सरकार तक किसानों के लिए जो अस्थिरिता दिखाई वो कहीं न कहीं किसानों को खुदकुशी की तरफ धकेलना सुरु कर दिया क्योंकि उस बीच निजी सेवा क्षेत्रों के लिए आधारभूत सपना देखा गया था वो 2005-06 के आसपास अपना आकार ले चुका था जिसे चाहकर भी रोक पाना आने वाली सरकार के नियंत्रण में नही था,और सबसे ज्यादा इन सर्विसेज क्षेत्रों का नुकसान ये रहा कि इसने जॉब क्रिएशन के नाम पर सिर्फ सरकारों से सब्सिडी खाई है और एक बड़ी बेरोजगारी के तरफ धकेल दिया जो अब एक बड़ा विशालकाय मूर्तरूप ले चुका है।

वर्तमान सरकार ने भी कृषि क्षेत्र के लिए कुछ सोचा भी तो वो सिर्फ झूठ की बुनियाद पर खड़ा किया गया तीन अग्रिकलचलरल रिफार्म लॉ जिसके बारे में खुद सरकार को पता था कि हम ये कानून किन उद्योगपतियों के लाभ पहुचाने के लिए ला रहे है जिसे बाद में खुद शर्मिंदा होते हुए वापस लेना पड़ा।

आज जिन किसानों और कृषि क्षेत्र की बेहतरी के लिए कुछ करना है तो मुझे लगता है कि सरकारों इन नीचे मुख्य बिंदुओं और मुखरता के सतह काम करने की जरूरत है:
●क्रोपिंग पैटर्न्स
●बफर स्टॉक प्रबंधन
●स्टोरेज प्रबंधन
●फार्म सब्सीडी
●एग्रीकल्चरल मार्केटिंग लेकिन उसमें ये निश्चित किया जाय कि इसको मोनोपोली से पूरी तरह दूर रखा जाये
●अपस्ट्रीम एंड डाउनस्ट्रीम रिक्वायरमेंट
●एग्रीकल्चरल सप्पलाई चैन मैनजमेंट
●मैक्सिमम सपोर्ट प्राइस(एमएसपी निर्धारण)
●स्पेशल सपोर्ट एंड बेनिफिट्स फ़ॉर वीमेन फार्मर्स
●रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑन क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर
●फ़र्टिलाइज़र का सरल आपूर्ति
●आर एन्ड डी फ़ॉर सीड डेवलपमेंट
●फार्म वेस्ट प्रबंधन
●मैक्सिमम बजट एलोकेशन फ़ॉर एग्री
●कमोडिटी फ्यूचर मार्केट्स मैनेजमेंट
●फ़ूड प्रोसेसिंग सिस्टम

क्योंकि भारत जैसे एक बड़ी विशालकाय वाली जनसख्या के देश में जैसे जैसे एग्री सेक्टर की भागीदारी काम होती जाएगी वैसे वैसे हम एक बड़े फ़ूड क्राइसिस और भुखमरी की तरफ बढ़ते जाएंगे।

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