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*अमरीकी अर्थव्यवस्था में गहराता संकट और ट्रम्प का व्यापारिक साम्राज्यवाद* 

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बी सिवारमन 

कुछ समय के लिए ट्रंप पुतिन से मिलकर  यूक्रेन पर यूरोप की पीठ पीछे अस्वीकार्य करार थोपने की कोशिश करते भी दिखे लेकिन यूरोप के अनुमोदन के बिना करार कैसे हो सकता है। और यूरोप को साइडलाइन करने की ट्रंप की लापरवाह कूटनीति ने उन्हें अलग थलग कर दिया है। ट्रंप यूरोप को चीन पर 100 फीसदी और भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने के लिए नहीं मना पाए। इसके विपरीत ईयू ने चीन से एक व्यापारिक करार किया है और जल्द ही भारत से भी करेगा। भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद करने से इनकार कर दिया है जो उसे  लाखों डॉलर बचाने में मदद करता है। भारत रूसी हथियार  खरीदने पर भी अड़ गया है। ट्रंप की आक्रामकता अमरीका की कमज़ोरी छिपाती है। ज़ी पुतिन मोदी की शंघाई मुलाकात को  अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह लेनिन के मार्गदर्शन में 1920 में आयोजित तृतीय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की दूसरी सभा थी, जिसने घोषणा की कि यह साम्राज्यवाद और युद्ध का समय था। 2025 में एक सदी के बाद भी उस घोषणा की वैधता बनी हुई है। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का समय अपेक्षाकृत शांति का रहा जिस दौरान वियतनाम, कोरिया और अफ्रीका, लातिन अमेरिका जैसे विकासशील देशों में साम्राज्यवादी आक्रामकता देखी गई लेकिन दो साम्राज्यवादी ताकतों के बीच युद्ध नहीं देखा गया। इससे कुछ उदारवादियों में यह भ्रम पैदा हुआ लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के बीच युद्ध संभव नहीं है। 

लेकिन आखिरकार, पुतिन और ट्रम्प जैसों को आगे आकर उस भ्रम को तोड़ना पड़ा। सोवियत संघ में पूंजीवाद की बहाली ने रूसी साम्राज्यवाद को एक नई शक्ल दी।  रूसी विस्तारवाद के खिलाफ बफर के रूप में यूरोपीय साम्राज्यवादी ताकतों की ओर से तैयार किए गए यूक्रेन के खिलाफ पुतिन का युद्ध, संभावित शांति वार्ता को यूरोप की तरफ से बाधित करना ताकि रूस यूक्रेन में नुकसान उठाता रहे और यूरोपीय शक्तियों आदि को धमकाने और पीछे धकेलने के लिए पुतिन के हाल में पोलंड में गतिविधियों आदि जैसी घटनाएं संकेत देती हैं कि यूरोप में सैन्य संघर्ष एक वास्तविक आशंका बन गया है।

इसी तरह अमेरिका की दक्षिणी चीनी समुद्र में आक्रामक उकसावे ने भी ट्रैन्स पेसिफिक में दो सबसे शक्तिशाली वैश्विक ताकतों के बीच सैन्य संघर्ष की आशंका को लगभग हकीकत बना दिया है। 

व्यापारिक साम्राज्यवाद की जड़ें 

अमेरिका के राष्ट्रपति की दूसरी पारी में डोनाल्ड ट्रम्प ने ताज़ा व्यापार युद्ध शुरू किया है। व्यापार युद्ध आपसी साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता का नतीजा होता है जो अक्सर वास्तविक युद्ध की जमीन तैयार करता है। पूंजीवाद का साम्राज्यवाद में बदलना, दूसरे शब्दों में साम्राज्यवाद के इतिहास की शुरुआत वास्को डे गामा और कोलंबस के पंद्रहवीं शताब्दी में व्यापारिक मार्ग ढूंढ निकालने से हुई। जिसके बाद औपनिवेशीकरण, पूंजी का निर्यात और वित्तीय पूंजी के युग में उच्च तकनीकी प्रभुत्व के दौर आए। पूंजी के विस्तारित पुनरुत्पादन की एक मुख्य प्रॉप के रूप में मिलिटरी इन्डस्ट्रीअल कॉम्प्लेक्स के उभरने ने स्थायी युद्ध आर्थिकी, के बने रहने के जोखिम को पैदा किया जिसके लिए सैन्य संघर्ष आवश्यकता बन गए। ट्रम्प के नए व्यापारिक युद्धों के साथ यह वापस अपनी जगह आ गया है। व्यापार राजनीति एक बार फिर साम्राज्यवादी राजनीति के केंद्र में आ गई है। 

साम्राज्यवाद के आकर्षक सिद्धांत 

साम्राज्यवाद के समूचे इतिहास में वाम हलके में कई आकर्षक सिद्धांतों को सामने लाया। माइकल हार्ड और अंटोनियो नेगरी ने साम्राज्यवाद के विकल्प के रूप में “साम्राज्य’ का इस्तेमाल किया। उत्तर साम्राज्यवाद या बल्कि नए साम्राज्यवाद के कई कम जाने जाने वाले सिद्धांत भी थे। ऐकडमिया में वैश्वीकरण विमर्श साम्राज्यवाद के विकल्प के रूप में दिखने लगा। हमारे यहाँ वाम रुझान के शिक्षाविदों उत्सा पटनायक और प्रभात पटनायक ने पूंजी और साम्राज्यवाद किताब प्रकाशित की जिनमें उन्होंने कहा कि “उत्तर और दक्षिण अथवा “विकसित”, “अविकसित’ अथवा “पिछड़े” देशों के बीच पुराना द्वन्द्व अब वैध नहीं है.. साम्राज्यवाद का विचार उत्तर-दक्षिण अथवा विकसित-पिछड़े देश के संदर्भ में करना कि पहला दूसरे का शोषण करता है, त्रुटिपूर्ण है।” (पृष्ठ 81)

डोनाल्ड ट्रम्प का अमरीकी राष्ट्रपति के रूप में दूसरी बार आना और उनका अपने “दोस्त” मोदी की बांह मरोड़ने व प्रमुख प्रतिद्वंद्वी चीन के प्रति आक्रामकता – भारतीय वस्तुओं पर 50 फीसदी टैरिफ और चीन पर 50-100 फीसदी टैरिफ की धमकी – ने इन विचारों की हकीकत दर्शा दी है। 

असामान्यता साम्राज्यवाद का नियम है 

आपसी साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता के अभाव की लंबी अवधि में दुनिया भर के कई बुर्जुवा पर्यवेक्षकों को “ट्रम्प की कूटनीति में असामान्य मोड़” ने स्तब्ध किया है। लेकिन मार्क्स के छात्रों को साम्राज्यवाद से जुड़ी किसी “सामान्यता” को लेकर कोई भ्रम नहीं था। साम्राज्यवाद का हमेशा अर्थ रहा है असामान्यता। यदि युद्ध साम्राज्यवाद के विकास के साथ आम नियम है तो व्यापारिक युद्ध का छोटा पैक भी अपवाद नहीं है। तथाकथित वैश्वीकरण ने राष्ट्रसत्ताओं की  प्रतिद्वंद्विता को खतम नहीं कर दिया है।

अमरीकी नीतियों पर ट्रम्प की निजी छाप 

कुछ विचारक वर्तमान व्यापार युद्ध को ट्रम्प की निजी चारित्रिक विशिष्टताओं से जोड़ रहे हैं। कुछ दूसरे विचारक इसे अमेरिका के अपने आर्थिक संकट और राजनीतिक गिरावट से बाहर आने की छटपटाहट से। दोनों की आंशिक वैधता हो सकती है। मोदी की तरह ट्रम्प मसीहा मोड में दिख रहे हैं। शायद, यह नोबेल पाने की इच्छा हो। या फिर कुछ बड़ा हासिल कर इतिहास में स्थायी जगह बनाने की महत्वकांक्षा। इसीलिए खुद को महान दिखाने के लिए “मेक अमेरिका ग्रेट अगैन” का नारा। 

ऐसे निजी पूर्वाग्रहों के अलावा ट्रम्प की नई व्यापारिक आक्रामकता कुछ वस्तूपरक कारकों के कारण भी है जैसे कि अमरीकी अर्थव्यवस्था का गतिहीनता के भंवर में फंस जाना। अपनी नीतियों को लेकर वह कितने भी अपरंपरागत या सनकी हों लेकिन जब तक उनमें संकट से निकालने के लिए अमरीकी साम्राज्यवादी बुर्जुआजी की छटपटाहट की गूंज है, वह उपयुक्त नेता बने रहेंगे। इससे पहले के लेख में हमने इसी विषय पर विस्तार से लिखा था। यहाँ उसे संक्षेप में दोहरा रहे हैं। 

अमरीकी अर्थव्यवस्था में गहराता संकट 

अमरीकी अर्थव्यवस्था में उत्पादकता वृद्धि में आधी से अधिक की गिरावट आई है – 1970 के दशक में 2.8 फीसदी प्रति वर्ष से लेकर 1.3 फीसदी (2005-2025 की अवधि में) और अमरीकी विनिर्माण चीन, दक्षिण कोरिया, भारत और वियतनाम से आने वाली सस्ती वस्तुओं का मुकाबला नहीं कर पा रहा है और यूरोप व कनाडा जैसे उच्च तकनीक क्षेत्र भी कई मामलों में अमरीका को पछाड़ते दिख रहे हैं। अमरीकी अर्थव्यवस्था को कम पारिश्रमिक देशों को आउट्सोर्स और औद्योगीकरण में गिरावट खाए जा रही है। ट्रम्प एप्पल के सीईओ टिम कूक को भारत से निवेश वापस लाने को कह रहे हैं। वह बेरोजगारी से अपने समर्थकों – अमेरिका के औद्योगिक मजदूर –  को होने वाली परेशानी के प्रति संवेदनशील हैं। अमरीकी मिडल क्लास जो पिछले दशक में तेजी से बढ़ा, अब लड़खड़ा रहा है चूंकि एआई उसकी नौकरियां खा रही है और यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के समय से ही महंगाई उसे परेशान कर रही है। असाधारण परिस्थितियाँ राजनीतिक नेताओं से “असामान्य” कदम उठवाती  ही हैं। तो इस तरह ट्रम्प की सनक बिना वजह नहीं है। 

दूसरे देशों से सस्ते आयात से अपने यहाँ नौकरियां जा रही हैं और अमरीकी उत्पाद विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं। अमेरिका का लगभग सभी व्यापारिक साझीदारों से ट्रेड सर्प्लस है इसलिए ऊंचा टैरिफ विदेशी वस्तुओं की प्रतिस्पर्धात्मक धार भोथड़ी करने के लिए एक हथियार है और विदेशी बाजार खोलने के लिए भी जहां अमेरिकी उत्पाद बेचे जा सकें। ट्रम्प की निजी विशिष्टताओं के कारण उनकी नीतियाँ टुच्ची दिख रहीं हैं और मनमानीपूर्ण दिखाई दे रही हैं। 

ट्रम्प की आक्रामकता की सीमाएं 

कइयों को उम्मीद है कि ट्रम्प के ऊंचे टैरिफ के नतीजतन नौकरियों में कटौती और उत्पादन में गिरावट जैसे नुकसान जो अमरीकी अर्थव्यवस्था को होंगे, उनकी आक्रामकता की सीमा बनेंगे। लेकिन इतिहास बताता है कि साम्राज्यवादी अपनी महत्वकनकक्षाओं का पीछा करते हुए भारी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहते हैं। हिटलर ने 1939 से 1945 के बीच 1.5 ट्रिल्यन डच मार्क युद्ध में झोंक दिए जो आज काफी बड़ी रकम होती है। युद्ध ने जर्मनी की लगभग आधी जीडीपी साफ कर दी। इसी तरह अमरीका ने वियतनाम युद्ध के लिए आज के मूल्य के एक ट्रिल्यन खर्च कर दिए जबकि कोई महत्वपूर्ण लाभ नहीं हासिल कर पाया। ट्रम्प को कुछ मामूली नुकसान रोक नहीं पाएंगे। 

और यह बिल्कुल अलग मामला है कि ऊंचे टैरिफ से लाभ से अधिक नुकसान हो। छटपटाहट में उठाए कदम हमेशा तार्किक गणना पर आधारित नहीं होते हैं। 

लेकिन इस वक्त, अमेरिकी साम्राज्यवादी बुर्जुआजी के हित और ट्रंप नीतियां लगभग समान सीमा की हैं और प्रशासन के मुद्दों पर भी आपस में टकराती हैं। ट्रंप की सभी व्यापारिक नीतियां अमरीकी कांग्रेस की सहमति से भी नहीं हैं। ट्रंप ने टैरिफ लगाने के लिए अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल किया है, जिससे यह अधर में हैं क्योंकि अदालतों ने इनमें से कुछ की अनुमति नहीं दी है। उनकी संवैधानिकता को चुनौती मिली हुई है। ट्रंप की आक्रामकता की छलांगों जितनी ही पीछे हटने की मिसालें भी हैं। ब्लैकमेल और धमकियों के बाद एकतरफा करार किए जाते हैं। इससे भविष्य की तस्वीर धुंधली हो जाती है यानी इसका अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है। नए वैश्विक पुनर्गठन नए ट्रंपवाद ने नए वैश्विक शक्ति संतुलन को बढ़ावा दिया है। ट्रंप खुद यह स्वीकारते हैं जब वह कहते हैं, “हमने भारत और रूस को चीन के पाले में डाल दिया है।” कई देशों ने ऊंचे अमरीकी टैरिफ का त्वरित प्रतिकार नहीं किया। ब्राजील और भारत जैसे कुछ देश अड़े हुए हैं और कई भविष्य में ट्रम्प के खिलाफ जुट सकते हैं। यदि चीन अमरीका को रेयर अर्थ आपूर्ति रोक दे तो अमरीकी उद्योग ठप्प हो सकता है। 

कुछ समय के लिए ट्रंप पुतिन से मिलकर  यूक्रेन पर यूरोप की पीठ पीछे अस्वीकार्य करार थोपने की कोशिश करते भी दिखे लेकिन यूरोप के अनुमोदन के बिना करार कैसे हो सकता है। और यूरोप को साइडलाइन करने की ट्रंप की लापरवाह कूटनीति ने उन्हें अलग थलग कर दिया है। ट्रंप यूरोप को चीन पर 100 फीसदी और भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने के लिए नहीं मना पाए। इसके विपरीत ईयू ने चीन से एक व्यापारिक करार किया है और जल्द ही भारत से भी करेगा। भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद करने से इनकार कर दिया है जो उसे  लाखों डॉलर बचाने में मदद करता है। भारत रूसी हथियार  खरीदने पर भी अड़ गया है। ट्रंप की आक्रामकता अमरीका की कमज़ोरी छिपाती है। ज़ी पुतिन मोदी की शंघाई मुलाकात को  अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

ट्रंप डी डॉलराइजेशन पर भी खफा हैं और ब्रिक्स गठजोड़ उनके निशाने पर है जोकि इस विचार को बढ़ावा देने वाला मुख्य खलनायक है। उनका गुस्सा यूरो या चीन रॅन्मिन्बी/युआन  पर उतना नहीं है भले दोनों डॉलर की कीमत पर बढ़ रहे हैं। बड़ा संकट तो छोड़िए, डॉलर पर मामूली संकट भी डी डॉलराइजेशन के विचार को उछालेगा। डॉलर के मूल्य में हल्की गिरावट भी अमरीका से निवेश पलायन का कारण बनेगी और अमरीकी ट्रेज़री एक बिंदु के बाद डॉलर टिका नहीं पाएगी। आक्रामकता लंबे समय तक शक्तिशाली अमरीकी पूंजीवाद को बचा नहीं पाएगी। अभी बहुत कुछ होना बाकी है। (बी सिवारमन का लेख। अनुवाद : महेश राजपूत)

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