अग्नि आलोक

रोकना होगा गहराती विषमता की खाई को

Share

डॉ. विवेक एस. अग्रवाल
संचार और शहरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञ

वैश्विक पटल पर जनसंख्या वृद्धि को सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों ही दृष्टि से देखने वाले वर्ग सक्रिय हैं। वे अपने तर्क-वितर्क रखते हंै, लेकिन कई बार यथार्थ से बहुत दूर तक सोचने लगते हैं। जनसंख्या वृद्धि का सबसे नकारात्मक पहलू है आपूर्ति से अधिक मांग का होना, आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन एवं संसाधनों के लिए संघर्ष। जनसंख्या वृद्धि के अनियंत्रित होने के पीछे सामान्यतया आर्थिक रूप से वंचित वर्ग को दोष दिया जाता है। साथ ही इस वर्ग को समस्त विषमताओं, जिनमें पर्यावरण प्रदूषण भी सम्मिलित है, के लिए जिम्मेदार माना जाता है। वास्तविकता यह है कि कुल प्रदूषण का आधा दुनिया की सबसे अमीर 10 प्रतिशत आबादी करती है। अत: प्रदूषण के लिए वंचित वर्ग को दोष देना उचित नहीं है।
विडंबना तो यह है कि बढ़ती आबादी को लेकर हल्ला मचाने वाले अधिसंख्य वही हंै, जो मन में यह धारणा लिए चलते हैं कि जीने का अधिकार मात्र उन्हीं को है। वे चाहे जो करें, उसके कोई विपरीत प्रभाव नहीं होंगे। यदि वैश्विक दोषों का आकलन करें तो इसके लिए अनुत्तरदायी ही सर्वाधिक प्रभावित होते हैं और अपनी आर्थिक व जीवन जीने की अक्षमताओं के मद्देनजर सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। हर स्तर पर प्रयास के बावजूद समावेशी समाज अब भी कल्पनातीत है, उसके बिना सामंजस्य एवं आपसी उत्तरदायित्व का भाव विकसित हो ही नहीं सकता। साथ ही, सामाजिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति को बढ़ती आबादी के लिए मात्र महिला पर लांछन की प्रवृत्ति से मुक्त होने की आवश्यकता है। यह मूलत: पुरुष प्रधान समाज द्वारा स्वयं को उत्तरदायित्वों से मुक्त करने का दूषित प्रयास है। असल में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, समानता पर सार्थक निवेश से होने वाले विकास से पृथ्वी पर बढ़ती आबादी नियंत्रित हो जाएगी। नियंत्रण की आवश्यकता अवश्यंभावी है, किंतु समानता का अधिकार ही नहीं इसका मूल भावना है। बेहतर जीवन के अवसर, जीवन की सुनिश्चित और स्वच्छ, आनन्दमयी वातावरण इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक तत्त्व हैं।
भारत में विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर आजादी के अमृत महोत्सव को दृष्टिगत रखते हुए खुशी और समृद्धि के लिए परिवार नियोजन के लिए शपथ पखवाड़े का आयोजन किया जा रहा है। सीमित क्षेत्रफल और संसाधन को ध्यान में रखते हुए आबादी नियंत्रण आवश्यक हो जाता है। विश्व की सर्वाधिक युवा आबादी वाला देश होने के कारण चुनौतियां भी अनंत हो जाती हंै। जहां नैसर्गिक संसाधन तो सीमित हैं ही, वहीं अप्राकृतिक संसाधन भी सीमित होते जा रहे हैं। विकास के साथ भी अनेक विषमताएं स्वत: जन्म लेती हैं। न विकास पर विराम लगाया जा सकता है, न ही विषमताओं पर। किन्त, इनमें संतुलन अति आवश्यक है। वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्य विषमताओं के गहरे महासागर का स्वरूप ले लेगा, जिसमें अनेकानेक भंवर अपने साथ डूबने को आकर्षित करेंगे। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने ‘विश्व जनसंख्या रिपोर्ट 2023Ó जारी की थी। लेकिन, इस रिपोर्ट में इंसानों से जुड़ी अनेक चुनौतियों की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। इस रिपोर्ट के प्रारंभ में ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग किया गया है, जो अपने आप में अवसरों को कम करने का द्योतक है।
सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी का निरंतर विकास जहां मानव जीवन को सुगमता, सुलभता एवं सहजता दे रहा है, वहीं इनके उन्नयन से सामान्यजन का भविष्य भी चुनौतीपूर्ण लग रहा है। बढ़ती आबादी के साथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, आय की अभिवृद्धि या कम से कम अवसर। इन तकनीकों के विकास के साथ कुशल, अभियांत्रिकी, प्रबंधकीय विषयों के लिए मानव दिवसों का सृजन हो रहा है, किन्तु अकुशल एवं गैर तकनीकी व्यक्ति के लिए अवसर निरंतर कम होते जा रहे हैं। चुनौती यह है कि हर व्यक्ति तकनीकी रूप से दक्ष नहीं हो सकता और यदि वह उचित कौशल प्राप्त नहीं करता तो आर्थिक तंगी में ही जीवनयापन करता है। तकनीकी कौशल प्राप्ति के लिए उसको वहन करने की क्षमता सबसे बड़ी बाधक है। साथ ही यदि इनकी संख्या बढ़ भी जाए तो उनका हश्र भी वही होगा जो सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र का हुआ। अनेकानेक सूचना प्रौद्योगिकी आधारित कम्पनियों ने रातों-रात हजारों कर्मियों को कार्य मुक्त कर दिया। हजारों युवा एक झटके में सड़क पर आ गए। बड़े-बड़े पैकेज पर काम करने वाले इन युवाओं की ऐसी हालत डराती है। तकनीक वैसे भी गतिमान होती है और निरंतर परिवर्तनशील होती है। इसमें व्यक्ति को स्वयं उतना गतिमान रखना गंभीर चुनौती है।
अत: भविष्य की चुनौतियों को दृष्टिगत रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर ठोस रणनीति बनाने की आवश्यकता है। इंसानों के मध्य गहराती विषमता की खाई को महासागर का रूप लेने से पहले ही पाटने के लिए हर स्तर पर ठोस प्रयास करने होंगे। किंचित क्षेत्रों में सूचना एवं जैव प्रौद्योगिकी पर अंकुश लगाना जरूरी है। साथ ही, खुशी बढ़ाने, तनाव घटाने, समानता एवं संतुलन के लिए स्कैंडिनेवियाई देशों के जैसे कार्यक्रम लागू करने होंगे ताकि बेहतर यानी गुणवत्तापूर्ण जीवनयापन हो।

Exit mobile version