अनुराधा भसीन
दस नवंबर के लाल किला विस्फोट, जिसमें 13 लोग मारे गए थे, के चंद घंटों बाद भारतीय मीडिया ने एक बार फिर दिखा दिया कि जानकारी देने से ज्यादा वह भ्रम फैलाने की क्षमता रखता है। जहां सरकारी अधिकारियों ने जांच के जारी रहते हुए जानबूझ कर चुप्पी साधे रखी, वहीं देश भर के समाचार कक्षों ने “उच्च स्तरीय सूत्रों” और “वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों” के हवाले से दावों की सुनामी बहा दी।
यहाँ मैं लगभग बिगड़ चुके ब्रॉडकास्ट स्पेस की बात भी नहीं कर रही, जो बिना किसी रोकटोक के 24/7 टेलिविज़न चैनलों के जरिए नफरत और झूठ फैलाने का साधन बन चुका है। आतंकवाद या बड़े अपराधों के मामले में, हमेशा की तरह, प्रिन्ट माध्यम के सबसे सम्मानित और जिम्मेदार माने जाने वाले पत्रकार भी स्कूप और एक्सक्लूसिव की दौड़ में अस्पष्टता और चुप्पी के कोहरे को भेद पाने का सब्र नहीं जुटा पाते।
प्रवृत्ति “उच्च स्तरीय सूत्रों” अर्थात ऐसे अधिकारियों, जो या तो जिम्मेदारी या आधिकारिक रूप से कुछ कहने के मामले में बचना चाहते हैं या फिर जो किसी घटना का कोई स्वरूप प्लांट करना चाहते हैं, पर निर्भरता की होती है।
नतीजा : अखबारों के पन्ने ऐसी एक्सक्लूसिव खबरों से भर जाते हैं जिनमें कोई नाम, कोई जवाबदेही, कोई पुष्टि नहीं होती।
रिपोर्टर अपने सूत्रों से बिना कोई सवाल पूछे डिक्टेशन लेते हैं और संपादक खबरों के विरोधाभासी स्वरों को देख पाने में असफल रहते हैं। हर कोई बस सबसे पहले खबर देना चाहता है। तथ्यपरकता पीछे छूट जाती है और परिणामों के बारे में सोचा तक नहीं जाता।
विस्फोट और आतंकी मॉड्यूल के बीच लिंक
दिल्ली लाल किला विस्फोट में हर अखबार ने विस्फोट और कश्मीर-फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल के लिंक के बारे में जांच शुरू होने से पहले छापना शुरू किया।
आतंकी नेटवर्क का खुलासा एक दिन पहले आया था जब जम्मू एवं कश्मीर पुलिस ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की कि उसने जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवात-उल-हिन्द से जुड़े अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय आतंकी मॉड्यूल को ध्वस्त किया है।
विज्ञप्ति में कहा गया कि 19 अक्टूबर को श्रीनगर में जेईएम के धमकी भरे पोस्टर मिलने के बाद जांच में पाकिस्तान और अन्य देशों से समन्वय करने वाले कट्टर पेशेवरों और छात्रों के एक नेटवर्क का पता चला है। दो डॉक्टरों – डॉ. मुजाम्मिल अहमद गनई और डॉ. अदील- समेत सात लोगों को जम्मू एवं कश्मीर, फरीदाबाद और हरियाणा के विभिन्न ठिकानों से गिरफ्तार किया गया है।
इस बयान के बाद कुछ खबरों में एक “पुलिस प्रवक्ता” के हवाले से “2900 किलो आईईडी बनाने वाली सामग्री” या “विस्फोटक” बरामद होने का जिक्र किया गया। विस्फोटकों की इतनी बड़ी बरामदगी प्रेस विज्ञप्ति का हिस्सा क्यों नहीं थी?
जानकारी चुनिंदा रिपोर्टरों को और ऐसे अधिकारियों द्वारा क्यों जारी की गई जो अपना नाम नहीं देना चाहते थे? किसी रिपोर्टर ने यह सवाल पूछने में दिलचस्पी नहीं दिखाई कि जेईएम (जिसके पोस्टर जांच की जड़ का कारण बने) और अंसार गजवात-उल-हिन्द में क्या संबंध है?
जेईएम, जिसका मुखिया मसूद अज़हर है और जो 2019 पुलवामा हमले समेत कई हमलों के लिए जिम्मेदार है, पाकिस्तान से है जबकि अंसार गजवात-उल-हिन्द 2017 में कश्मीर में बना छोटा सा समूह है, जिसके अल कायदा से संबंध होने का दावा किया जाता है लेकिन इसका सीमित गतिविधियों का इतिहास है।
जहां हर किसी ने इस ‘तथ्य’ को हाथोंहाथ लिया, उन्होंने दिल्ली विस्फोट लिंक और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल की थ्योरी को भी पूरा सच मान लिया। अखबारों ने दावा किया कि दिल्ली लाल किला विस्फोट में इस्तेमाल विस्फोटकों और फरीदाबाद में बरामद विस्फोटकों की तहरीर एक जैसी थी।
यह इसके बावजूद कि, कुछ अज्ञात अधिकारियों के हवाले से कहा गया था कि वह “प्रमाण जुटा रहे हैं” और पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि विस्फोट में किस तरह के विस्फोटक इस्तेमाल किए गए जिसमें छर्रे नहीं थे।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट ने अधिकारियों के हवाले से विस्फोट को ‘सेना ग्रेड’ का बताया जबकि इसी अखबार में एक और रिपोर्ट ने बिना किसी का हवाला दिए कहा कि ऐसा लगता है कि फरीदाबाद ऑपरेशन में जब्त अमोनियम नाइट्रैट जैसा इस्तेमाल किया गया है।
ऐसे हालात में, विरोधाभासी बयान और थ्योरी आएंगी ही और स्वाभाविक रूप से रहेंगी। लेकिन पत्रकार का काम है कि तार्किक व्याख्या की मांग करे और सिर्फ जो ज्ञात है, प्रस्तुत न करे बल्कि जानकारी कहाँ से आ रही है, यह भी बताए। संपादक का काम है कि हर विरोधाभास को स्वीकार न करे या यूं ही न छाप दे बल्कि व्याख्या के साथ प्रकाशित करे जो कि हर पाठक डिज़र्व करता है।
आई-20 कार के चालक की पहचान
सबसे चौंकाने वाली बात, सफेद हुंडई कार जिसमें कि कथित रूप से विस्फोटक थे, के चालक की पहचान पुलवामा से लेकिन फरीदाबाद के अल फलह स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च सेंटर में कार्यरत डॉक्टर इनाम उन नबी के रूप में सामने आना था, बिना किसी प्रमाण के संकेत के। हिंदुस्तान टाइम्स से लेकर हिंदू तक अधिकांश अखबारों ने उसी किस्म के विरोधाभास प्रस्तुत किए जबकि यह व्यक्ति इस गुत्थी में सबसे चौंकाने वाली कड़ी है।
अखबार स्रोतों के हवाले से कहते हैं कि वह सीसीटीवी फुटेज से खोजा गया, कुछ कहते हैं कि उनके पास फुटेज है और कुछ खबरों के साथ धुंधली तस्वीर है जिसमें एक पुरुष मास्क पहने कार चालक की सीट पर बैठ दिखता है। स्पष्ट रूप से पहचान विस्फोट के अगले दिन की गई जबकि उस व्यक्ति के परिजनों के डीएनए टेस्ट अभी होने थे।
अपने 13 नवंबर के संस्करणों में अखबारों ने स्रोतों के हवाले से कहा कि उस शख्स को बिना मास्क एक मस्जिद के बाहर और कनाट प्लेस में देखा गया था, पर इसकी कोई तस्वीर नहीं दिखी।
लोगों में डॉक्टर का नाम पहली बार विस्फोट के बाद ही आया। लेकिन सूत्रों ने यह भी दावा किया कि इस डॉक्टर के दूसरे डॉक्टर मुजाम्मिल से संबंध थे। दोनों फरीदाबाद मेडिकल कॉलेज में साथ काम करते थे और दोनों पुलवामा के एक ही गाँव से थे। इसके बाद सूत्र दावा करते हैं कि इनाम उन नबी तब से फरार था जब से छापे पड़ने शुरू हुए थे और कश्मीर-फरीदाबाद आतंकी नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ था।
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि जांचकर्ता दावा कर रहे हैं कि वह गिरफ़्तारी से बच रहा था और फरार था तो उसके लिए कोई लुकआउट नोटिस क्यों नहीं जारी किया गया था? मुजाम्मिल को 31 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया था। तो जांचकर्ता इस डॉक्टर को क्यों नहीं ढूंढ पाए थे? वह कैसे और कहाँ गायब हो गया।
इनाम के परिवार का कहना है कि उन्होंने उससे कुछ दिन पहले बात की थी। जाहिर है कि यदि वह रडार पर था तो कश्मीर के अति निगरानी वाले ज़ोन में उनके परिवार से पूछताछ की गई होनी चाहिए थी।
वही अखबार जिन्होंने बताया था कि जांचकर्ता इनाम को तलाश रहे थे और वह फरार था, सूत्रों और अज्ञात अधिकारियों के हवाले से कहते हैं कि कार विस्फोट की सुबह फरीदाबाद से निकली थी जहां विभिन्न जांच एजंसियाँ उसकी सरगर्मी से तलाश कर रही थीं, तो उन्हीं सार्वजनिक स्थानों पर इतने समय रहकर वह गिरफ़्तारी से कैसे बचा रहा?
सूइसाइड बम या घबराहट में विस्फोट?
खबरों का केंद्रबिन्दु यह सवाल भी है कि इनाम उन नबी सूइसाइड बॉम्बर था या उससे यह काम घबराहट में हो गया। यहाँ भी वह विरोधाभासी अनुमानों के जाल में उलझे हैं। कई रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया कि विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि कार चालक के शव का नामोनिशान नहीं मिला और फिर भी सूत्रों के हवाले से कहा कि बम “समय से पूर्व” और “दुर्घटनावश” फटा हो सकता है जब इनाम विस्फोटकों के प्रमाण मिटाने की कोशिश कर रहा था या भागने की कोशिश कर रहा था। विस्फोटकों की प्रकृति के बारे में थोड़ी खोजबीन आवश्यक थी।
“सूत्रों” ने पत्रकारों को बताया कि आतंकी योजना के खुलासे के बाद इनाम, आई-20 के चालक के रूप में अज्ञात सूत्रों ने जिसकी शिनाख्त की थी, घबरा गया होगा। यह कैसे हो सकता है? कोई कैसे यकीन करे कि जो व्यक्ति दस दिनों से (कुछ खबरों के अनुसार वह छापों का संकेत मिलने के बाद 28 अक्टूबर को ही गायब हो गया था) गिरफ़्तारी से बच रहा था, अपनी जान बचाने के बजाय, देश की राजधानी में विस्फोटकों से भरी कार के साथ प्रवेश करेगा? और फिर अंतिम पलों में घबरा जाएगा?
जब से विस्फोट हुआ है, अखबार ऐसी थ्योरियों और कहानियों से भरे हैं जो असंगत हैं और फिर भी विश्वासपूर्वक लिखी जा रही हैं, ऐसे अधिकारियों के हवाले सो जिनके नाम कभी सामने नहीं आएंगे।
पत्रकारिता को खाने वाली यह बीमारी हालांकि नई नहीं है। जब आतंकी हमलों या अपराध की बड़ी घटनाओं की बात आती है तो पत्रकार कहानी पाने के लिए बेहद हड़बड़ी में होते हैं और सूत्रों व उच्च स्तरीय सूत्रों का चारा बनने को तत्पर रहते हैं जो खबरों के भूखे पत्रकारों को विशेषज्ञों की भाषा में अपने सर्कल की कोरी अफवाहें परोसते हैं।
हर अपराध के बाद लापरवाह खबरों का खतरा
यह सिर्फ लापरवाह रिपोर्टिंग का मामला नहीं है। यह खतरनाक भी है। यह स्पष्टता को बाधित करता है और अपुष्ट धारणाओं पर मीडिया ट्रायल रचता है, जाँचकर्ताओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने में विफल रहता है और अंतत: सच व न्याय को बाधित करता है। ऐसी कई घटनाओं में, जहां बेनाम जांचकर्ता पत्रकारों के लिए कल्पनाओं के जाल बुनते हैं और पत्रकार श्रद्धापूर्वक इन्हें फैलाते हैं, वर्षों बाद मामले अदालतों में ढह जाते हैं क्योंकि खबरों में जो सामग्री सूत्रों के हवाले से आई होती है और जांच दस्तावेज़ों में जो होती है उसमें कोई मेल नहीं होता।
सवाल न पूछकर, पत्रकार न अपने पेशे का भला कर रहे हैं न अपने सूत्रों का। जानकारी प्राप्त करने व परोसने का यह चक्र दोनों – पत्रकारों और जाँचकर्ताओं – के आलस को बढ़ाता ही है। जहां पत्रकार और ज्यादा आसान टेबल पत्रकारिता पर निर्भर होते जाते हैं, जांचकर्ता बिना ठोस प्रमाण जुटाने के “काम करते दिखते हैं” और कई बार सुविधाजनक बलि के बकरों की तलाश में रहते हैं।
दिल्ली विस्फोट की खबर के साथ एक और खबर आई, निठारी हत्याओं में आरोपी के बरी होने के बाद जेल से रिहाई की। वर्षों भारतीय मीडिया ने सुरिंदर कोली का “कसाई” और “नरभक्षी” के रूप में खलनायिकीकरण किया। मीडिया ट्रायल हुआ और उसे दोषी ठहराया गया और फांसी की सज़ा सुनाई गई, जो अंतिम समय में रोकी गई। वह शख्स आज आजाद है क्योंकि अदालतों ने दो दशकों बाद कहा कि हत्याओं से उसे जोड़ने के लिए अदालत में पर्याप्त प्रमाण नहीं पेश किए गए।
19 महिलायें और बच्चे बलात्कार और हत्या का शिकार हुए और उनके शव विखंडित किए गए थे। क्या कोली को बलि का बकरा बनाया गया था या जांच इतनी सुस्त, कमजोर थी कि वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ मजबूत केस बनाया नहीं जा सका? किसी ने तो हत्याएं की थी। क्या उसका नाम कभी सामने आया ही नहीं?
निठारी हत्याकांड मामले का ढहना पत्रकारों, जो जाँचकर्ताओं की परोसी कपोल कल्पनाएं लपकते हैं, के लिए सबक है कि आलसी पत्रकारिता के नतीजे खतरनाक होते हैं। पर उन्होंने एक बार फिर दिखा दिया है कि ब्रेकिंग न्यूज, एक्सक्लूसिव स्कूप के लिए पागल दौड़ में वह बहुत व्यस्त हैं।
(अनुराधा भसीन का लेख कश्मीर टाइम्स से साभार। अनुवाद : महेश राजपूत)

