शशिकांत गुप्ते
क्या लोकतंत्र में चेहरे को महत्व देना उचित है? चेहरे का महत्व बढ़ने से व्यक्ति का महत्व बढ़ता है। जनता भ्रम से व्यक्ति को देश का पर्याय समझने लगती है।
ऐसे व्यक्ति में अहंकार जागृत हो जाता है। अंहकार, तानाशाह प्रवृत्ति को जन्म देता है। तानाशाह प्रवृत्ति लोकतंत्र को कमजोर करती है।
इनदिनों लोकतंत्र में देश या किसी भी सूबे का प्रमुख कौन बनेगा? यह व्यक्ति के चेहरे पर निर्भर हो गया है? यह अलोकतांत्रिक सोच है।
जनता भावनावश चेहरे पर विश्वास कर लेती है। लेकिन जब चेहरे पर से मेकअप हट जाता है,तब जनता स्वयं को ठगी सी
मेहसूस करती है।
लोकतंत्र और चेहरा यह बात कुछ हज़म नहीं होती है।
अपने देश में प्रधानमंत्री या प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए सीधे मतदान नहीं होता है। संसद के चुनाव के बाद जिस दल को बहुतमत मिलता है। उस दल सभी निर्वाचित सदस्य अपने दल के जिस सदस्य को दल का नेता चुनते है। वह व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद की शपथ लेता है।
इसी प्रक्रिया के तहत विधानसभा निवाचित सदस्यों द्वारा जिस व्यक्ति को विधायक दल का नेता चुनते है। वह व्यक्ति मुख्यमंत्री बनता है।
दुर्भाग्य से लोकतांत्रिक देश के राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी होने से, प्रत्येक दल के हाईकमान के द्वारा चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का चेहरा थोपा जाता है। चुनाव के बाद सर्वसम्मति के नाम पर महज़ औपचारिकता निर्वाह करते हुए, हाईकमान के द्वारा थोपे हुए व्यक्ति नेता चुना जाता है।
यह प्रक्रिया अलोकतांत्रिक है। हाईकमान के निर्देश का पालन करना निर्वाचित सदस्यों की बाध्यता हो जाती है।
चेहरे पर विचार करते हुए, अचानक सन 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म असली नकली का यह गीत याद आ गया। इस गीत को लिखा है गीतकार हसरत जयपुरी ने।
लाख छुपाओ छुप ना सकेगा राज हो कितना गहरा
दिल की बात बता देता है असली नकली चेहरा
लोग तो दिल को खुश रखने को क्या क्या ढोंग रचाते हैं
भेस बदल कर इस दुनिया में बहरूपे बन जाते हैं
मन दर्पण में मुखड़ा देखो उतरा रंग सुनहरा
अब ना हमको और बनाओ हमने तो पहचान लिया
जिसके मन में चोर छूपा हो सामने कब वो ठहरा
सन 2014 में हम चेहरे के महत्व के कारण तानाशाह प्रवृत्ति को महसूस कर रहें हैं।
लोकतंत्र में चेहरे का महत्व बढ़ने का मुख्यकारण है। राजनेताओं द्वारा जनता की मूलभूत समस्याओं के लिए सड़क पर फैशनेबल जनांदोलन करना।
सत्ता प्राप्त करने के बाद जनांदोलनों को तवज्जों नहीं देना भी तानाशाह प्रवृति का द्योतक है।
हाई कमान का वर्चस्व बढ़ने का मुख्य कारण है। लोकतंत्र की बुनियाद असहमति को नजरअंदाज करना।
लोकतांत्रिक देश जबतक राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा चेहरे को थोपा जाएगा। एक धारणा बन जाएगी, जिस व्यक्ति पर
हाईकमान की अनुकंपा होगी। वही व्यक्ति राजनैतिक दल में समझदार, योग्य, और अकल वाला है। बाकी सारे हाँ में हाँ मिलाने के मजबूर सदस्य है?
चुनाव के बाद बहुमत की जुगाड़ करते हुए दूसरे दलों के सदस्यों की खरीदफरोख्त भी अलोकतांत्रिक प्रक्रिया ही है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

