शशिकांत गुप्ते
लोकतंत्र की मजबूती बगैर विपक्ष के सम्भव ही नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष का मजबूत होना जरूरी है। जिनका सोच अलोकतांत्रिक होता है, वे विपक्ष को मजबूत होने के बजाए मजबूर होतें देखना चाहतें हैं।
दुर्भाग्य से लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति करने वाले दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है।
लोकतंत्र में सामूहिक नेतृत्व होना चाहिए। अलोकतांत्रिक सोच के बढ़ते तकरीबन तमाम राजनैतिक संगठन व्यक्ति केंद्रित मानसिकता से ग्रस्त हो गएं हैं।
व्यक्ति के हावी होने से व्यक्ति में अधिनायकवादी मानसिकता पनपती है।
अधिनायक मानसिकता तानाशाही का पर्याय बन जाती है। ऐसी मानसिकता पनपने से जनहित के मुद्दे हाशिए पर रह जातें हैं,और निहितस्वार्थ ( Vested interests) के मुद्दे हावी हो जातें हैं।
निहित शब्द ही यथास्थितिवाद का पर्याय है। यथास्थितिवाद परिवर्तन का विरोधी और सिर्फ सुधार का समर्थक होता है।
वर्तमान में हम उक्त मानसिकता को प्रत्यक्ष देख रहें हैं।
रोजगार के स्रोत पैदा करने बजाए, अनुत्पादक (Unproductive) कार्यो में बेतहाशा खर्च किया जा रहा है।
शिक्षा में अमूलचूल परिवर्तन के बजाए महंगी शिक्षा को बढ़वा दिया जा रहा है। लोकतंत्र में शिक्षा और चिकित्सा मुफ्त ना भी हो तो कम-से-कम आमजन के देयशक्ति में होना चाहिए।
लोकतंत्र मानव समाज की व्यापकता का जीवंत उदाहरण है।लेकिन समाज के व्यापक स्वरूप को जिस तरह विभिन्न जातियों और जातियों के भी उपजातियों में बांट दिया है। वैसे ही लोकतंत्र में प्रत्येक राजनैतिक संगठन में विभिन गुट बन गए हैं।
यह लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं है। गुटबाजी के पनपने के पीछे मुख्य कारण राजनीति में व्यक्तिवाद का हावी होना ही है।
लोकतांत्रिक देश में सक्रिय दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव निंदनीय है।
प्रख्यात समाजवादी विचारक, जनहित के मुद्दों बखूबी उठाने वाले नेता स्व. राजनारायण जी ने कहा था। लोकतंत्र को बरक़रार रखने के लिए यदि पच्चीस बार भी पार्टी तोड़ना पड़ी तो तोडूंगा।
समाजवादी चिंतक,विचारक डॉ रामनोहर लोहियाजी ने कहा है।
वाणी की स्वतंत्रता के साथ कर्म पर नियंत्रण होना चाहिए
वाणी की स्वतंत्रता तो हरएक देशवासी को संविधान ने दी है।
कर्म पर नियंत्रण को समझना जरूरी है।
कर्म पर नियंत्रण मतलब चर्चा,बहस,और विरोध करते समय व्यक्ति की भाषा मर्यादित होनी चाहिए।
आज वाणी स्वतंत्रता का बेजा फायदा उठाते हुए अमर्यादित, हिसंक और निम्नस्तर की भाषा का उच्चारण निर्भीकता से किया का रहा है। इस तरह की निर्भीकता को अलोकतांत्रिक सोच प्रश्रय देता है। इस कहावत को चरितार्थ करते हुए कि, जब सैयाँ भए कोतवाल तो डर काहे का?
उपर्युक्त मुद्दों पर गम्भीरता से विचार करने पर लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका की एहमियत समझ में आती है।
विपक्ष को व्यापक स्वरूप में समझना जरूरी है।
लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ विपक्षीदल नहीं होता है।
विपक्ष का मतलब हरएक वह व्यक्ति जो सत्ता के जनविरोधी नीतियों का विरोध करने का साहस रखता है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका का सबसे ज्यादा उत्तरदायित्व सजगप्रहरियों पर होता है।
देश के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास साक्षी है। आजादी के आंदोलन में सजगप्रहरियों की भूमिका अविस्मरणीय है।
दुर्भाग्य से वर्तमान में बहुत से सजगप्रहरियों को सत्ता की गोदी रास आ रही है।
लोकतंत्र में कोई एक दल कमजोर हो जाए तो, यह नहीं समझना चाहिए कि, देश का विपक्ष कमजोर हो गया है।
लोकतंत्र बगैर विपक्ष के अधूरा है।
अंत में लोकतंत्र के लिए इस
अहम मुद्दा को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि, भारत के लोकतंत्र को और धर्मनिरपेक्षता को कोई भी मिटा नहीं सकता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

