मुनेश त्यागी
आजादी के बाद से आपातकाल को छोड़कर, भारत आज सबसे काले समय से गुजर रहा है। संविधान, जनतंत्र और न्यायपालिका की आजादी पर गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं। आज संवैधानिक मूल्यों, मर्यादाओं और मानवीय मूल्यों पर व्यवस्थित तरीके से हमला जारी है। जनतंत्र, चुनाव और विधायिका की सर्वोच्चता से कहीं बड़ी चीज है। इसमें धर्मनिरपेक्षता, सहनशीलता, तर्कशीलता, सद्भाव, पब्लिक ऑर्डर, भेदभावहीनता और इंसाफ शामिल हैं। ये भारतीय संविधान की उद्देशिका के सिद्धांत और मूल्य हैं। सिविल राइट्स और मानवाधिकारों की हिफाजत किए बिना, जनतंत्र जिंदा नहीं रह सकता। ये सब इतने जरूरी है कि इनकी बहुमत की ताकत से सुरक्षा की जानी चाहिए।
अगर विधायिका की सर्वोच्चता को ही जनतंत्र का पैमाना मान लिया जाए तो, यह जनतांत्रिक तरीके से ही अधिनायकवाद और फासीवाद की ओर जायेगा। जब यहां आंतरिक मतभेद हैं तो जनतंत्र के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को इस तरह संतुलित किया जाए कि इन सारे मुद्दों की हिफाजत की जा सके।
हमारे संविधान की उद्देशिका में लिखे गए मुद्दे भारत के जनतांत्रिक उद्देश्यों को स्पष्ट करते हैं और यह सब भारत के संविधान की मूलभूत संरचना है। हमारा संविधान आवश्यक रूप से कहता है कि देश के प्रबंधन को संसदीय जनतंत्र और राज्य सिद्धांतों द्वारा नियंत्रित किया जाएगा। मगर राजनीतिक कार्यपालिका, राज्य मशीनरी का दुरुपयोग करके, संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों की व्यवस्थित तरीके से अवहेलना कर रही है।
राज्यपाल जो राज्य की के मुखिया हैं वे राज्य सरकारों को अस्थिर करने और अस्थिर रखने के, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि बन गए हैं और वे केंद्र सरकार के पिछलग्गू बन गए हैं और इस प्रकार वे संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का हनन कर रहे हैं। अब स्थिति इतनी खराब हो गई है कि वे अपनी राज्य सरकारों के खिलाफ काम कर रहे हैं। अब वे संवैधानिक कर्तव्यों का हनन करके राज्य मंत्रीमंडल सरकार द्वारा दिए जा रहे परामर्श का निरादर कर रहे हैं।
हाल के दिनों में देखा गया है कि केंद्र सरकार के मंत्री और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग न्यायपालिका द्वारा विधायिका के कानूनों के, पुनर्विचार की शक्ति की खुलकर गैरजरूरी और मनमानी आलोचना कर रहे हैं जो किसी भी दशा में सदालोचना नहीं है। वे गलत तरीकों से न्यायपालिका पर दबाव डाल रहे हैं जो देश को अधिनायकवाद की तरफ ले जा रहा है। इसलिए आज संविधान को बचाना हमारा पहला कदम और कर्तव्य है। ऐसा करके ही हम जनवाद पर हो रहे हमलों का मुकाबला करके संविधान और जनतंत्र की रक्षा कर पाएंगे।
यह बात सही है कि हमारे संविधान में सुधार की जरूरत है क्योंकि यह पूर्ण यानी परफेक्ट संविधान नहीं है। इन कठिन परिस्थितियों में यह हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है कि जनतंत्र को बचाने के लिए संविधान के प्राथमिक मूल्यों और सिद्धांतों की हिफाजत की जाए। हमारा यह भी कर्तव्य है कि हम सरकार की जनविरोधी नीतियों और जनता के ध्रुवीकरण की सरकारी नीतियों के बारे में जनता को बताएं जो संवैधानिक मूल्यों सिद्धांतों की अवहेलना कर रही है।
केंद्र सरकार, हमारी न्यायपालिका और खासकर सर्वोच्च न्यायालय की कार्यप्रणाली से खुश नहीं है। वह न्यायपालिका को अपनी कठपुतली और पिछलग्गू बनाना चाहती है, उसकी स्वतंत्रता को खत्म करना चाहती है, उसकी विधायिका द्वारा बनाए गए कानून की न्यायिक रिव्यू की शक्ति को लेकर खुश नहीं है, इसलिए एक सोची समझी राजनीति के तहत उसकी कटु आलोचना की जा रही है, उस पर नाजायज दबाव डाला जा रहा है। अब वह उसे डराने और धमकाने पर उतर आई है।
सरकार के मंत्री और संवैधानिक पदों पर बैठे लोग खुलेआम कह रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय को सब लोगों को जमानत नहीं देनी चाहिए। अब मामला इतना खराब हो गया है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में जजों की नियुक्ति का मामला अधर में लटक गया है। अब केन्द्र सरकार कोलिजियम द्वारा चुने गए न्यायाधीशों को अपनी अनुशंसा करते को तैयार नहीं है। हमारे देश में इस वक्त 5 करोड से भी ज्यादा मुकदमे अदालतों में पेंडिंग हैं। निचली अदालतों में जजों के 20 से लेकर 30% पद खाली पड़े हुए हैं और 90% बाबुओं के पद पिछले 15-20 साल से खाली पड़े हुए हैं, सरकार उन्हें नहीं भर रही है। भारत के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 40% पद खाली पड़े हुए हैं और सर्वोच्च न्यायालय में 25% पद खाली पड़े हुए हैं सरकार इन पदों पर न्यायाधीशों की नियुक्ति करने के लिए कतई भी इच्छुक नहीं है। जनता को सस्ता और सुलभ न्याय उसकी नीति और नीयत में नहीं है और राज्य सरकारों के साथ साथ अब तो केंद्र सरकार ने भी इस ओर से आंखें मूंद ली हैं।
इन सब परिस्थितियों के देखते हुए यह नितांत जरूरी हो गया है कि संविधान व मूलभूत सिद्धांतों और आदर्शों को बचाने के लिए, सशक्त जनतांत्रिक व्यवस्था को बचाने के लिए और न्यायपालिका की आजादी को बचाने के लिए, नवजागरण अभियान चलाया जाए और सरकार की जनतंत्र विरोधी, संविधान विरोधी और न्यायपालिका की आजादी विरोधी मुहिम का भंडाफोड़ किया जाए। आज के जागरूक नागरिकों का यह सबसे बड़ा और सबसे जरूरी काम हो गया है।

