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बिहार के संदर्भ में लोकतंत्र चुनाव और तानाशाही:यानी” वी वोट, दे डिसाइड”

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जयप्रकाश नारायण

80% से ज्यादा सीटें जीतकर एनडीए ने बिहार में पुनः अपना परचम लहरा दिया और नीतीश 10वीं बार मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके हैं। देश और विदेश में जो भी लोग भारत में सतह पर राजनीति, लोकतंत्र और समाज में चल रही अंत: क्रियाओं पर पैनी नजर रखे हुए थे। उन सभी की आश्चर्य मिश्रित प्रतिक्रिया आ रही है। महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश में एकतरफा जीत के बाद मोदी-शाह और नीतीश की तिकड़ी बिहार जीत पाएगी या नहीं। इस विषय पर अलग-अलग विचार  थे।

जमीनी हालात को देखते हुए प्रेक्षकों की राय थी कि इंडिया और एनडीए के मध्य तीखे संघर्ष होंगे। 5 वर्ष पहले हुए चुनाव के परिणाम विवादास्पद थे। उस समय एनडीए ने 10 सीटों की बढ़त मतगणना में धांधली से बनाई थी। ऐसा आम जन मानस की धारणा है। ऐसा लग रहा था कि लोग जनादेश के अपहरण का हिसाब करने के लिए 5 वर्षों से इंतजार कर रहे हैं। लेकिन चुनाव परिणाम ने सभी आकलनों को झूठा साबित करते हुए सिर्फ अमित शाह को सही ठहराया।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणामों ने पहले से ही महागठबंधन और विश्लेषकों को हैरत में डाल रखा था। राहुल गांधी के द्वारा चुनाव में हेरा-फेरी और धांधली के तार्किक भंडाफोड़ के बाद चुनावी भ्रष्टाचार और वोट चोरी का सवाल राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। एसआईआर में 70 लाख वोट काटे जाने के बाद बिहार में वोट चोरी का नारा गली-गली गूंजने लगा। “वोट चोर, गद्दी छोड़ ” का नारा आम बात चीत और प्रचलन में आ गया । जिससे 70 के दशक के बिहार की याद ताजा हो रही थी। इस चुनाव में दोनों गठबंधनों के मुद्दे स्पष्टत: अलग-अलग विचारों और सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्त कर रहे थे।

एनडीए घुसपैठिये और बांग्लादेशियों को बाहर निकालने तथा लालू राज के गढ़े गये नरेटिव “जंगलराज” को मुख्य मुद्दा बनाए हुए था। ऑपरेशन सिंदूर सेना का पराक्रम और विकास जैसे मुद्दे भी बीच- बीच में उठ जा रहे थे। हिंदुत्व का तड़का मिलाए बिना तो भाजपा चुनाव लड़ ही नहीं सकती। सो पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था। पाकिस्तान, इस्लाम और आंतरिक दुश्मन का मुद्दा भाजपा के लिए संजीवनी है। तो उसे वह छोड़ नहीं सकती।

भाजपा के प्रत्याशियों, नेताओं और मोदी-शाह जैसे चुनाव के मुख्य चेहरों के पास बिहार के बुनियादी सवालों पर बात करने के लिए समय बहुत कम था। एक प्रत्याशी से पत्रकार ने पूछा कि आपके चुनाव का मुख्य एजेंडा क्या है? तो उस महिला प्रत्याशी ने कहा कि हम अलीनगर का नाम बदलकर सीता नगर कर देंगे। वे अली नगर से भारी मतों से विजयी भी हो गईं। 

चुनाव में एनडीए प्रत्याशियों के ऐसे कारनामे बाहर आ रहे थे। जो चुनाव को भ्रष्ट और अश्लील बना देने के लिए काफी थे। लेकिन मीडिया ने सचेतन तौर से विमर्श से गायब कर दिया। झारखंड भाजपा नेत्री ने (जो महीनों से पटना के एक महिला छात्रावास में डेरा डाले हुए थीं) जो कुछ कहा उस पर तो सरकार गिर जानी चाहिए थी। लेकिन मुख्य धारा की मीडिया के लिए यह सवाल ही नहीं बना। प्रधानमंत्री ने भाषा के स्तर को इस चुनाव में और गिरा दिया। यह उनके अंदर मौजूद पतनशील सांस्कृतिक चेतना और मानव द्रोही प्रवृत्तियों का स्वाभाविक प्रदर्शन था।

महागठबंधन की कोशिश थी कि बिहार चुनाव को जनता के मुद्दे के इर्द-गिर्द केंद्रित रखा जाए तथा अन्य राज्यों में हुए चुनावों में धांधली को लोकतंत्र के लिए खतरे तथा बेरोजगारी, पलायन, कानून व्यवस्था पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के दमन उत्पीड़न के साथ संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के सवाल को चुनावी एजेंडा बनाया जाए। असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों जीविका दीदी शिक्षा मित्र आंगनबाड़ी आदि के सवाल को इंडिया गठबंधन के एजेंडे में प्रमुख जगह मिली थी।

किसानों की कर्ज माफी, गरीब मजदूर महिलाओं के ऊपर माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के कर्ज जाल से मुक्ति को मुद्दा बनाया गया। महागठबंधन ने संकल्प पत्र जारी कर विभिन्न तबकों और वर्गों के सवालों को ठोस करने की कोशिश की। अति पिछड़ों के लिए विशेष पैकेज और अधिकार की मांग की गई। महागठबंधन ने एनडीए के विभाजन कारी अभियान के खिलाफ वास्तविक जन मुद्दों और बिहार के पिछड़ेपन के सवाल के इर्द-गिर्द चुनाव को केंद्रित रखने की कोशिश की।

एनडीए सत्ता में था इसलिए वह पहले से ही महागठबंधन के मुकाबले बेहतर स्थिति में था। उसने इस चुनाव में दो नए प्रयोग किये। एक था महिलाओं के खाते में चुनाव के समय ₹10 हजार डालना। जिसे सीड मनी कहा गया। चुनाव के ठीक पहले यह स्कीम घोषित हुई और सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया के दौरान महिलाओं के खाते में दश हजार रुपए डाले जाते रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने तब तक चुनाव की घोषणा नहीं कि जब तक सरकार ने मनी ट्रांसफर योजना‌ का ऐलान नहीं कर दिया। इसके पहले महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भाजपा महिलाओं के खातों में अलग-अलग नामों से पैसा ट्रांसफर कर चुकी थी। इसका लाभ उन राज्यों में भाजपा को मिला था। यह ऐसा नैरेटिव है जिसकी आड़ में चुनाव आयोग की पक्षधरता और चुनावी भ्रष्टाचार छिपा लिया गया।

दूसरा प्रयोग एसआईआर का था। यह चुनावी राजनीति का अनूठा प्रयोग है। विशेष सघन पुनरीक्षण की योजना जून महीने में अचानक बिहार पर थोप दी गई। जिसके लिए सिर्फ एक महीने का समय दिया गया। नागरिकों और राजनीतिक दलों के लिए यह घोषणा आश्चर्य चकित करने वाली थी। ऐसा लगता है कि मोदी शाह की जोड़ी ईसी के साथ मिलकर इस पर लंबे समय से काम कर रही थी। एसआईआर का समय तरीका जरूरी दस्तावेज तथा लागू कराने वाली मशीनरी सोच समझकर योजनाबद्ध तरीके से खास लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तैयार की गई थी।

इसलिए अनेकों विसंगतियों कमियों जटिलताओं के बावजूद चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार एक इंच भी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हुए। पूर्व चुनाव आयुक्तों से लेकर विपक्ष और सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने एसआईआर की कष्ट साध्य जटिल अव्यवहारिक और संविधान विरोधी अंतर्वस्तु पर सवाल उठाए। न्यायालय के बार-बार सुझाव देने के बावजूद चुनाव आयुक्त प्रस्तुत किए जाने वाले 12 दस्तावेजों में संशोधन परिवर्धन के लिए तैयार नहीं थे। अभी तक पहचान तय करने वाले मान्य  डॉक्यूमेंट जैसे निर्वाचन कार्ड आधार कार्ड राशन कार्ड पासपोर्ट बैंक पास बुक पैनकार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे दस्तावेजों को एसआईआर के लिए अमान्य करार दिया गया। अंत में जब न्यायालय ने आधार कार्ड को शामिल करने का आदेश दिया तब जाकर इसे बेमन से मान्यता दी गई। 

इस सम्पूर्ण घटनाक्रम से स्पष्ट है कि सरकार और चुनाव आयोग का एसआईआर के पीछे छिपा और सुचिंतित एजेंडा था। जो एसआईआर पूरा होने के बाद सामने आया। जब 67 लाख मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए। इसके बाद हुए प्रतिवाद और विभिन्न तरह के कानूनी तथा राजनीतिक दबाव के बावजूद चुनाव आयोग विसंगतियों को दूर करने का दिखावा करता रहा।

इसकी आड़ में भी उसने कई खतरनाक खेल-खेले। यही नहीं बार-बार सूची सार्वजनिक करने की मांग के बावजूद चुनाव आयोग तरह-तरह की हीला हवाली करता रहा और अंत तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। जिस कारण से वास्तविक मतदाता जब मतदान पहचान पत्रों के साथ पोलिंग बूथों पर गए तो पता चला की सूची से उनका नाम गायब है। 

इस संदर्भ में जांच पड़ताल करने वाली संस्थाओं का कहना है कि एसआईआर की कवायद के शिकार अल्पसंख्यकों दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और कमजोर वर्गों को होना पड़ा है। चुनाव परिणाम आने के बाद डरा देने वाली खबरें आ रही हैं। कथित तौर पर 100 के आसपास ऐसी विधान सभाएं हैं जहां एनडीए के प्रत्याशियों की विजय उतने ही मतों से हुई है जितने मतदाता लोकसभा के चुनाव में मतदान करने के बावजूद सूची से बाहर किए गए थे।

मतगणना के बाद चुनाव परिणाम में कई ऐसे संयोग देखे गए हैं जो चिंतित कर देने वाले हैं। कई मंत्रियों को एक जैसे वोट मिले हैं जिसमें शुरू के तीन डिजिट एक ही थे। जैसे 1 लाख 224, के बाद के ही अंकों मे फर्क दिखाई देता है। आपको याद होगा कि हरियाणा में एक ही विधानसभा में कुछ बूथों पर एक ब्राज़ीलियन हेयर ड्रेसर का फोटो 22 जगह चस्पा मिला था। देश जानता है कि यह मोदी काल है। जहां सब कुछ मुमकिन है।

अब बिहार चुनाव का परिणाम आ चुका है और अप्रत्याशित रूप से एनडीए ने 80% से ज्यादा सीटें जीत ली हैं। नीतीश कुमार 10वीं बार ‌मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। यहां बिहार चुनाव के सवाल पर कोई तफसीली रिपोर्ट लिखने का उद्देश्य नहीं है। बिहार में चली एसआईआर सहित समग्र चुनाव प्रक्रिया के भविष्य में भारत के लोकतंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव के गहन अध्ययन की जरूरत है। इस समय बारह राज्यों में एसआईआर चल रहा है ।

अमृत काल में हुए बिहार चुनाव के बाद में क्या हमारे लोकतंत्र के चरित्र और स्वरूप में गुणात्मक बदलाव होने जा रहा है। क्या सार्वभौम मताधिकार पर आधारित संवैधानिक लोकतंत्र अंतिम सांसें गिन रहा है। बिहार में एसआईआर की छाया तले संपन्न हुए चुनावों को देखते हुए इन सवालों पर हमें विचार करने की जरूरत है।

पिछले 25-30 वर्षों से भारत में राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रकिया मूलत: दो गठबंधनों के बीच से गुजर रही है। इन गठबंधनों की नींव 20 वीं सदी के आखिरी दशक में पड़ी थी। जब कांग्रेस कमजोर हो चुकी थी और सोवियत संघ का विघटन हो चुका था। उदार वादी लोकतंत्र की परिधि विश्व भर में धीरे-धीरे सिकुड़ रही थी।

मंदिर और मंडल के तीखे अंतर्विरोध में देश में विध्वंस, आग, हत्या, दंगा, नफरत जैसी बर्बरताएं न्यू नॉर्मल होती गईं। जिससे उपनिवेशोत्तर भारत में विकसित हुए लोकतांत्रिक संस्थानों और न्यायिक ढांचे को गंभीर चुनौती मिलने लगी थी। भारतीय समाज का बहुलवादी ढांचा “जो लगभग चार दशकों से चल रही लोकतांत्रिक गतिविधियों के कारण समावेशी समाज बनने की तरफ बढ़ रहा था “पर प्राणांतक हमले होने लगे।नागरिक समाज, लोकतांत्रिक संस्थाएं और बहुलता वादी समाज तीनों इस हमले की जद में आ गए ।

सवर्ण सामंती ढांचे पर खड़ा सांप्रदायिक फासीवाद का इसी दौर में कॉरपोरेट घरानों के साथ गठजोड़ ठोस शक्ल ले रहा था। यह गठबंधन धीरे-धीरे समग्र लोकतांत्रिक परिवेश और संस्थाओं को बुरी तरह से जकड़ लिया। भारत में 40 वर्षों के लोकतांत्रिक प्रयोग से नागरिक चेतना में वृद्धि हुई थी। तर्कवादी वैज्ञानिक चेतना के विस्तार के साथ समाजिक जीवन में बदलाव आने लगा था। धर्म और जाति के लौह ढांचे में थोड़ी सी शिथिलता आई थी। कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के ठोस शक्ल लेने के साथ ही उसमें प्रतिगामी बदलाव शुरू हुआ। 21वीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते भारतीय समाज के लोकतांत्रिकरण का पहिया उल्टी दिशा घूम गया है। 

विश्व साम्राज्यवादी पूंजी के नेतृत्व में शुरू हुए उदारीकरण के बाद पूंजीवाद की लोकतांत्रिक प्रगतिशील क्रांतिकारी ऊर्जा चुक गई। पूंजीवाद उपनिवेशवाद से साम्राज्यवाद में बदल चुका है। इसलिए नव उदारवादी दुनिया में लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना संभव नहीं है। नव उदारवाद के सिद्धांतकार पूंजी के विश्व बाजार में निर्दुंद विचरण के लिए सीमित लोकतंत्र की मांग करने लगे थे। सच तो यह था कि एलपीजी की प्रक्रिया ही लोकतंत्र के निषेध पर खड़ी थी।

जैसे-जैसे भारत में उदारीकरण आगे बढ़ा। उसने भारत की सार्वभौमिकता, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिकता के प्रवाह को अंदर से सोखना शुरू किया। जैसे ही वैश्विक पूंजी के लिए भारत में दरवाजे खोल गए। वैसे ही भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता खत्म होने लगी। 90 के दशक के बाद के 25-30 वर्षों में भारतीय समाज के सोच जीवन शैली और नैतिक मूल्यों में गुणात्मक बदलाव आने लगा।

शुरुआत में ऐसा लगा की मंडल और मंदिर के अंतर विरोध के तेज होने से लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार होगा और भारतीय राज्य में वंचित सामाजिक समूहों का समायोजन होगा। लेकिन वित्तीय पूंजी नियंत्रित मार्केट के साथ भारतीय बाजार के जुड़ते ही भारत के राजनीतिक मंच पर दिखाई देने वाली नई सामाजिक राजनीतिक शक्तियां अपना लोकतांत्रिक आवेग खोने लगीं। 21वीं सदी में प्रवेश करते ही उनकी आंतरिक गतिशीलता और लोकतांत्रिकता समाप्त हो गई। जिसका तार्किक परिणाम हुआ कि वे अर्ध सामंती अर्ध पूंजीवादी राज्य व्यवस्था और दलाल पूंजी द्वारा पचा ली गईं। जिससे फासीवाद के भारतीय मॉडल हिंदुत्व कॉर्पोरेट गठजोड़ के लिए रास्ता साफ हो गया। 

चूंकि अब सामाजिक न्याय और उदारवादी जनतंत्र के अवशेष ही भारतीय राजनीति में बचे थे। इसलिए खालीपन का लाभ संगठित हिंदुत्व के आक्रामक ताकतों को मिला और हिंदुत्व कॉर्पोरेट फासीवाद ने भारतीय लोकतंत्र के संपूर्ण स्पेस को घेर लिया।

21वीं सदी के शुरुआत में दो गठबंधन ठोस शक्ल ले रहे थे ।1990 में से शुरू हुई राजनीतिक तरलता में क्षेत्रीय शक्तियों का महा विस्फोट हुआ था। बाबरी मस्जिद  विध्वंस का दाग झेलते हुए भाजपा अलगाव में चली गई थी। दलित-पिछड़ों और क्षेत्रीय अस्मिताओं वाले राजनीतिक दलों की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता के छीजने के साथ हिंदुत्व गैंग को नया मौका मिला। 90 के दशक में ‌भारत में गठबंधन की राजनीति संयुक्त मोर्चे की अल्पकालीन सरकारों के रास्ते आगे बढ़ते हुए अंततः एनडीए के रूप में 21वीं सदी के पहले ही स्थायित्व ग्रहण कर लिया था। जब अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में एनडीए का गठन हुआ और सरकार बनी।

शुरुआती डगमगाहट के बाद भाजपा नियंत्रित एनडीए1998 में अस्तित्व में आया और  सामाजिक वर्ण क्रम के विभिन्न संस्तरों की ताकतों को अपने साथ समाहित करना शुरू किया। जिसमें ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, अन्ना द्रमुक, अकाली दल, हरियाणा में चौटाला और अजीत सिंह, शरद यादव जैसे नेता और उनकी पार्टियां थीं। उग्र मराठा राष्ट्रवाद की पार्टी शिवसेना पहले से ही भाजपा के साथ गठजोड़ में थी। बीजेपी ने लचीलापन दिखाते हुए जार्ज फर्नांडीज को एनडीए का संयोजक बनाकर हिंदुत्व के सामाजिक विस्तार और स्वीकृति को नया‌ आयाम दिया। तेलुगू देशम  बीजद भाजपा के लिए कठिन समय में संकटमोचक का दायित्व निभाती रही हैं।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के अपराध के बाद जब बीजेपी अलगाव झेल रही थी ।तो आक्रामक दलित राजनीति का उत्तर भारतीय मॉडल बसपा ने भाजपा के साथ सरकार बनाकर बीजेपी को नया जीवन दिया। इसके बाद 2002 में गुजरात जनसंहार के समय एक बार फिर बीजेपी और हिंदुत्व के विरोध में देश और विदेश में माहौल बन गया था तो सुश्री मायावती ने गुजरात चुनाव में भाजपा का प्रचार कर लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष समावेशी राजनीति विरोधी चरित्र को पुन: उजागर किया। उस समय के विश्वास घात के पुरस्कार स्वरूप बसपा मोदी की कृपा पात्र बनी हुई है। धीरे-धीरे बसपा अपनी दलित पक्षधरता खोती गई और अंततोगत्वा हिंदुत्व कॉरपोरेट गठजोड़ के भारतीय राज्य पर कब्जा कर लेने के बाद लगभग अप्रासंगिक हो गई है। खैर इस प्रसंग को यहीं छोड़ते हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव तक आते-आते राजनीतिक ध्रुवीकरण दो खेमों में ठोस शक्ल ले चुका है। एक एनडीए और दूसरा इंडिया यानी महागठबंधन। ये गठबंधन भारत में दो भिन्न सामाजिक राजनीतिक दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

एनडीए- जिसकी कमान भाजपा के हाथ में है जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक शाखा है। संघ घोषित तौर पर हिंदूवादी संगठन है। जो भारतीय राष्ट्रवाद को संस्कृति के झीने आवरण में लपेट कर धर्म के आधार पर परिभाषित करता है।संघ ने आधुनिक लोकतंत्र के प्रति अपनी नफरत कभी छुपाई नहीं। लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व का मूलतः विरोधी है। वर्णाश्रम व्यवस्था समर्थक संघ धर्मनिरपेक्ष संघात्मक समावेशी राष्ट्र-राज्य को हिंदुत्व परियोजना का शत्रु समझता है ।वह सार्विक मताधिकार के आधार पर बने लोकतांत्रिक राष्ट्र राज्य को भारतीय संस्कृति सभ्यता और चिंतन का निषेध समझता है।

संघ उपनिवेशवाद विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन का भी विरोधी था । इसलिए जब भारत की समस्त श्रेष्ठतम शक्तियां हमारी ज्ञात सभ्यता के सबसे विराट संघर्ष द्वारा आधुनिक राष्ट्र के सृजन में अपना सब कुछ कुर्बान कर रही थी तो संघ उस प्रकिया से पूर्णतः विलग रहा। अपने सम्पूर्ण चिंतन और कर्म में संघ उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन का विरोधी है । इसीलिए भारत सहित दुनिया में कहीं भी आजादी और उत्पीड़ित के खिलाफ चल रहे जन गण के संघर्ष का समर्थन नहीं करता। संघ नीति भाजपा से लोकतंत्र, समानता और बंधुत्व के मूल्यों का आदर करने की उम्मीद करना व्यर्थ है।

 एनडीए में शामिल अन्य शक्तियां धीरे-धीरे अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिकता खो चुकी हैं। चाहे वह नीतीश हो, लोक दल हो, नायडू हों या किसी भी तरह के सामाजिक न्याय वाले राजनीतिक गुट हों। जैसे राम विलास की पार्टी दलितों के किसी लोकतांत्रिक आंदोलन से निकली हुई राजनीतिक पार्टी नहीं है ।वस्तुत: सवर्ण सामंती ताकतों की कृपा पर पलने वाला जनविरोधी गुट है। यही हालत मांझी कुशवाहा का भी है । 

भूमि सेना (कुर्मी) जब बिहार की नालंदा और पटना के इलाके में दलितों पिछड़ों का नरसंहार कर रही थी। तो नीतीश किसके साथ थे। बाद के दौर में लालू से लड़ते हुए सामंती ताकतों के गोद में जा बैठे। इसलिए भाजपा के साथ उनकी एकता स्वाभाविक है। उनके जीवन का राजनीतिक व्यतिक्रम नहीं । भाजपा की सबसे मजबूत सहयोगी शिवसेना अंततोगत्वा भाजपा की देश विरोधी नीतियों के कारण उसका साथ पहले ही छोड़ चुकी है।

उत्तर प्रदेश सहित हरियाणा कर्नाटक पंजाब या भारत के किसी भी कोने में जो राजनीतिक पार्टियां एनडीए के साथ जुड़ी हैं वे मूलतः सत्ता लोलुप हैं।या हिंदुत्व फासीवाद की गिरफ्त में कैद हैं। जिनका जन सरोकारों से कुछ भी लेना देना नहीं है। इसलिए एनडीए गठबंधन मूलत: लोकतंत्र विरोधी कॉर्पोरेट परस्त अवसर वादी गठजोड़ है। जो भारत की जनता के बुनियादी हितों और लोकतांत्रिक आकांक्षा के विरोध में खड़ा है। 

दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन तीन धाराओं से मिलकर बना है। एक स्वतंत्रता आंदोलन की गांधी नेहरू लीगेसी का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस है। जो मूलत: उदारवादी जनतंत्र की पक्षधर और कमोबेश लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध है। जिसने भारतीय राष्ट्रवाद को समावेशी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद में बदलने के लिए संघर्ष किया  तथा आजादी के संघर्ष की अगुवाई करते हुए देश के लिए कुर्बानी देने की विराट परंपरा कायम की है। अनेक विचलन फिसलन और उतार-चढ़ाव के बावजूद कांग्रेस लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाती है । साथ ही उसका उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद विरोधी इतिहास रहा है।

दूसरा लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल है। जिसने सांप्रदायिक शक्तियों के साथ कभी भी समझौता नहीं किया ।एक दौर में वह पिछड़ों दलितों के स्वाभिमान सम्मान और अस्मिता को बुलंद करने वाली राजनीतिक ताकत थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान फुले अंबेडकर पेरियार लोहिया की परंपरा को कुछ हद तक आगे बढ़ने का प्रयास किया। हालांकि कई मामलों में उसका रिकार्ड संदिग्ध है। इसके अलावा महागठबंधन में कुछ अति पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां भी शामिल हैं।

 तीसरा वामपंथी दल है। जो स्वतंत्रता आन्दोलन से लेकर आज तक लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता सामाजिक न्याय और समता मूलक समाज के लिए चल रहे संघर्ष की अगुवाई करने वाली अडिग अविचल नेतृत्वकारी धारा हैं । कम्युनिस्टों ने आजादी के संघर्ष में महान कुर्बानियां दी हैं। आजादी के बाद धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक समाजवादी गणराज्य के लिए चल रहे  संघर्ष की अग्रिम कतार में शामिल रही हैं और आज भी इन मूल्यों के लिए किसी भी तरह की कीमत चुकाने के लिए तैयार है। वामपंथी दल साम्राज्यवाद उपनिवेशवाद विरोधी तथा दलितों पिछड़ों आदिवासियों व मजदूर वर्ग के हितों के लिए संघर्ष करने वाली शक्तियां हैं।जिनकी जन पक्षधरता असंदिग्ध है ।लोकतांत्रिक नैतिकता आचरण की सुचिता  भ्रष्टाचार व सांप्रदायिकता विरोधी योद्धा के रूप में वामपंथी दलों का गौरवशाली रिकार्ड है । मुख्यतः इन तीन धाराओं के समायोजन से इंडिया गठबंधन ने बिहार का चुनाव लड़ा था।

अब सवाल यह है कि बिहार में दोनों गठबंधनों का उद्देश्य सिर्फ चुनाव जीतकर बिहार में सरकार बनना ही था। या उनके समक्ष कोई दूरगामी कार्यभार थे। जहां तक इंडिया गठबंधन का सवाल है तो उसके समक्ष संविधान और लोकतंत्र की रक्षा का महत्वपूर्ण कार्यभार था। पिछले 12 वर्षों में मोदी और भाजपा ने भारत की समस्त लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है । लगभग सभी संस्थाएं मोदी के समक्ष आत्मसमर्पण  कर चुकी हैं।

बिहार चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका ने इस बात का संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली किस दिशा में आगे बढ़ने वाली है। नौकरशाही न्यायपालिका और  स्वायत्त संस्थाएं सरकार के समक्ष घुटने टेक चुकी है ।कानून का शासन अंतिम सांसें गिन रहा है। धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को तिलांजलि देकर भारतीय राज्य खुलकर बहुसंख्यकवादी हो गया है। खुले आम हिंदू राष्ट्र के धर्म ध्वजाधारी अल्पसंख्यकों को डरा धमका रहे हैं और आए दिन भीड़ हत्या हो रही है। नागरिक समाज कमजोर हो चुका है। उस पर हमले जारी हैं। 

 भीड़ न्याय का सिद्धांत थोपा जा रहा है। मीडिया पर सरकार का कब्जा है।विपक्ष को खलनायक और विरोधियों को देशद्रोही  पाकिस्तान परस्त कहकर गालियां दी जा रही हैं। अल्पसंख्यकों स्त्रियों दलितों आदिवासियों पर हिंदुत्व वादियों और पुलिस प्रशासन का हमला बढ़ रहा हैं।  मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और राज्य के बुलडोजरी न्याय को सामाजिक स्वीकृति मिल रही है।ऐसी स्थिति में भारत के लोकतांत्रिक ढांचे कानून के राज और सामाजिक एकता को बचाना बिहार में चुनाव का मुख्य परिप्रेक्ष्य था। 

 कॉर्पोरेट के संघ भाजपा में विलय ने भारतीय राज्य के चरित्र में नई अंतर्वस्तु जोड़ दी है। मित्र पूंजीवाद यानी ओलीगार भारत में ठोस शक ले चुका है।बिहार चुनाव के मध्य में ही भागलपुर के पीरपैंती में 1080 एकड़ जमीन एक रुपए प्रति एकड़ के मूल्य पर अडानी को लीज पर  दी गई। जो दो फसली और घने पेड़ पौधों वाला क्षेत्र था।

चुनाव में मित्र कॉरपोरेट एक बड़ा मुद्दा था। चुनाव के दौरान सहारा इंडिया की लगभग एक लाख 80 हजार करोड़ की संपत्ति अदानी को सौंप दी गई । साथ ही जेपी एसोसिएट का अधिग्रहण भी अडानी इंटरप्राइजेज ग्रुप द्वारा किया जा चुका है। महागठबंधन की पराजय ने इन सभी सवालों को नेपथ्य में धकेल दिया है ।

मोदी शाह के लिए बिहार का चुनाव जीतना फासीवादी परियोजना के लिए आवश्यक था। जहां से वे नई राज्य व्यवस्था की यात्रा शुरू कर सकते हैं। अधिकांश उत्तर भारत मोदी और शाह के नियंत्रण में पहले से ही है। बिहार में भी 20 वर्ष से उनके गठबंधन की सरकार थी। इसलिए यह सिर्फ सरकार की वापसी का चुनाव नहीं था। बल्कि बिहार से भारत में लोकतंत्र का भविष्य तय होना था। मध्य प्रदेश महाराष्ट्र दिल्ली हरियाणा के चुनाव में वोट हेरा फेरी के  सफल प्रयोग के बाद बिहार आखिरी चौकी ” बिहार में एसआईआर और  मतगणना से प्राप्त परिणामों “को देख कर स्पष्ट हो जाता है कि भारत में सात्विक मताधिकार पर आधारित चुनाव प्रणाली” दम  तोड़ चुकी है।

बिहार मोदी और शाह के नये भारत की परियोजना का प्रयोग स्थल था । जहां वह हिंदुत्व कॉरपोरेट फासीवाद के चुनावी मॉडल का परीक्षण करने में सफल रहे। अब भारत दुनिया की उन 73% आबादी वाले‌ देशों में शामिल हो गया है । जहां चुनावी तानाशाही अबाध गति से चल रही है। बाकी सब भविष्य में दिखाई देगा।

यानी” वी वोट, दे डिसाइड”। (भागवत जी ने तो कह दिया है कि भारत हिंदू राष्ट्र है। इसे घोषित करने आवश्यकता नहीं है ।)

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