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नोटबंदी….सुप्रीम कोर्ट के पास कोई विकल्प था भी नहीं

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राजेश ज्वेल

6 साल पहले नोटबंदी पर जो फैसला मोदी सरकार ने लिया था , उस पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है.. वैसे भी अब इन याचिकाओं की सुनवाई का कोई मतलब नहीं था , क्योंकि 6 साल पहले लिए गए फैसले पर पूरे देश में अमल हो चुका है और अब अगर सुप्रीम कोर्ट नोटबंदी के फैसले को असंवैधानिक करार दे देता तो पुराने 1000 और 500 के बंद किए गए नोट फिर चलन में लाने पड़ते ,जो संभव ही नहीं होता ..

चूंकि भूतकाल में नहीं लौटा जा सकता तो सुप्रीम कोर्ट के पास इन 58 याचिकाओं को खारिज करने के अलावा अन्य कोई विकल्प था भी नहीं…2016 के पुराने आर्थिक फैसलों को अब नए सिरे से इसलिए भी नहीं पलटा जा सकता है क्योंकि नए नोट न सिर्फ चलन में बल्कि बंद किए गए नोटों की तुलना में दोगुना से ज्यादा बाजार में खप चुके हैं ..इसलिए गोदी मीडिया चाहे तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नागिन डांस कर सकता है और सत्ता पक्ष इसे अपनी जीत बता सकता है ,जो जायज भी है …

लेकिन किसी भी विधि विशेषज्ञ से अगर पूछेंगे तो वह यही कहेगा कि सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले में नोटबंदी को वैध ही बताने का एक मात्र अंतिम विकल्प था… अवैध बता देने पर देश में एक नया भूचाल आ जाता और नोटबंदी वाली कवायद फिर से दोहराना पड़ती जो भारत जैसे विशाल देश में किसी सूरत में संभव नहीं हो सकतीं.. बहरहाल जो सवाल नोटबंदी के वक्त उठे थे वे आज और आगे भी कायम रहेंगे… मसलन क्या कालाधन और भ्रष्टाचार खत्म हो गया, क्या आतंकवाद से लेकर नशीले कारोबार से मुक्ति मिल गई या नगदी का चलन घट गया..क्या विदेशों में जमा कलाधन वापस आ गया..या ऐसे तमाम वे दावे जो नोटबंदी को सफल बताते हुए किए थे ? #

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