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*आश्रित बनाम दानवीर?*

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शशिकांत गुप्ते

निराश्रित,अनाथ और जरूरतमंदो की सहायता की खबरें पढ़ने, सुनने और देखने के बाद सखेद आश्चर्य होता है। देश के पिच्चासी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मुक्त हस्त से दिया जा रहा है। एक सौ चालीस करोड़ में पिच्चासी करोड़ घटाओं तो पचपन करोड़ शेष रहते हैं।
पचपन करोड़ में धनकुबेर कितने होंगे और उच्च,मध्य और लघु आय वाले कितने होंगे यह सांख्यिकी विशेषज्ञों का विषय है?
पिच्चासी करोड़ मुफ्त का लुफ्त उठा रहे है,फिर भी निराश्रित अनाथ,और जरूरतमंद हैं ये कौन लोग हैं?
सबका,विकास और विश्वास के साथ, है?….. तो मुमकिन है?
और अमृतकाल के स्लोगन को बार बार स्मरण करने पर तो सतयुग का आभास होना चाहिए?
कुपोषण,बेरोजगारी,महंगाई, मंहगी शिक्षा,महंगी चिकित्सा और भी जो मूलभूत समस्याएं हैं,वे सभी समस्याएं विपक्ष के लिए विरोध करने के मुद्दे हैं?
पक्ष हो या विपक्ष सभी आमजन के हितेषी हैं। राजनैतिक पक्ष और विपक्षी दलों के साथ तमाम सामाजिक,धार्मिक संस्थाएं, सभी दिन हीन जरूरतमंदो के लिए तत्पर हैं। बावजूद मंदिरों के सामने भिखारियों की कतार देख कर आश्चर्य होता है?
देश की जनता को पहली बार दानवीर सरकार मिली है। देश में आदतन दान कर्म को अपना धर्म समझने वाले दानवीरों की कमी नहीं है,ये दानवीर धार्मिक स्थानों के परिसर या सामने भीख पाने के लिए लालायित लोगों को मुक्त हस्त से दान देते हैं। यह सब देख कर कुपोषण,भुखमरी की खबरे मिथ्या लगती है?
दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते हैं इसी कहावत को चरितार्थ करने वाले धनकुबेरों द्वारा दान के रूप जो धन दिया जाता है,उस धन पर कभी भी प्रश्न उपस्थित नहीं होता है? यह धन श्वेत रंग का है या श्याम रंग का है?
जिस तरह देशवासियों के पाप,पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाने धूल जातें हैं, ठीक इसी तरह दान में दिया धन स्वच्छ सफेद हो जाता होगा।
मंदिरों की दान पेटियों से निकलने वाले बेतहाशा धन की गणना की खबरें पढ़ने सुनने के अपने देश निर्धन कहने वालों पर क्रोध आता है।
दान को रेवड़ियां कहना दान का अपमान है?
जो दान देने में समर्थ हैं वे निश्चित ही पुण्यवान हैं,और जो आश्रित हैं उन्हे पूर्व संचित पाप कर्मों की सजा मिल रही है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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