*सुसंस्कृति परिहार
मंहगाई को लेकर मध्यम या निम्न वर्ग में शायद ही कोई ऐसा परिवार हो जहां रोजाना इसे लेकर किचकिच ना होती हो किंतु ग्यारह दिवसीय दीपोत्सव के पर्व पर जो बाजारों में जो चहल-पहल है और जिस तरह दीप जले,रोशनी हुई ,बम पटाखे चले उससे तो ऐसा आभास नहीं हुआ कि इन दिनों देश मंहगाई की मार से त्रस्त है। वाकई यह सब जादुई सा नज़र आता है। हमें इस बात को समझने की ज़रूरत है यह सब कैसे संभव होता है और आम लोग कैसे इतनी हिम्मत जुटा लेते हैं।
इसमें आस्था और साल भर का त्यौहार की भावना के साथ जो सबसे बड़ी बात है वो यह है कि लक्ष्मी जी के प्रति लगाव का भाव है।वे धन की देवी हैं।एक वक्त था जब कुबेर धन देवता के रूप में ज्यादा लोकप्रिय थे ।आज के वक्त में धन कौन नहीं चाहता जबकि वह देख रहा है आजकल धनबल से सब कुछ प्राप्त होते। हमारे यहां पहले कहा जाता था गौधन,गजधन,बाजधन और रतन धन खान /जब आबै संतोष धन सब धन धूरि समान। लेकिन ये सब बातें थोथी हो गई है ।ज़माना बदल गया है और ज़माने के साथ चलने का समय है।अब तो लूट और शोषण से प्राप्त धन को भी लोग मानते हैं लक्ष्मी मां वरदान में देती है आपमें काबिलियत है तो लूटो।कुछ लोग तो यह भी कहते नहीं रखते राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट /अंत काल पछतायेगा प्राण जायेंगे छूट। किंतु आज भी कुछ ऐसे हैं जो सब धन धूरि समान की रट ना केवल लगाए हैं बल्कि उस लीक पर चलने रहे हैं ।उनकी मान्यता है पूत कपूत तौ का धन संचय /पूत सपूत तौ का धन संचय ।
तो आज जनभावनाओं में लक्ष्मी की पैठ बढ़ गई है और उसको ख़ुश करने तबियत से उनकी सेवा,पूजन अर्चन,रात जागरण वगैरह की जाती है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो अमीरों की संगति में गलत तौर तरीके अपनाकर अपनी दीवाली जगजमागाते हैं। लेकिन बहुसंख्यक वे होते हैं जो अपनी मेहनत,लगन और कर्मठता से जो कमाते हैं उसमें से अपनी ज़रूरी आवश्यकताओं की कटौती कर दिए -बाती और प्रसाद की व्यवस्था करते हैं। पिछले दो साल कोरोना ने दीवाली अच्छी नहीं मनाने दी ।इस बार वह भी जोश बराबर देखा गया। खरीदारी कम हुई।बाजार में सरगर्मी अधिक रही ।
बहरहाल, मंहगाई के इस जटिल दौर में भी बढ़ती उत्सवधर्मिता इस बात का संकेत देता है कि आस्थावादी बहुल यह देश मंहगाई के बारे में कतई चिंतित नहीं वह आज भी सिर्फ़ भाग्य के भरोसे है।तिस पर देश में बकौल रवीश कुमार आजकल मंहगाई के प्रखर समर्थक हैं।जो मंहगाई की उठने वाली आवाज को दफ़न कर देते हैं। हमारे देश के लोगों की सहनशक्ति काबिले गौर है।वे अयोध्या में बारह लाख दिए जलाए जाने पर इतने आल्हादित होते हैं मानों उनके बारहमास का सब इंतजाम हो गया हो।बंटते राशन से जो ख़ुशी पा लेते हैं और रोज़गार की बातें भूल जाते हैं। अंग्रेज इसे भिखमंगों का देश कहते थे । भारत आज भी दुनिया का सबसे बड़ा भिखारियों का देश हैं।इसे हम गौरव के रूप में लेते हैं यह भी देश का दुर्भाग्य है।दानवीरों की यशगान होता है।पूजन,वंदन,और अभिनंदन भी बराबर होता है।
लोकतांत्रिक देश किसी राशन या दान से नहीं चलना चाहिए। खाद्य सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन रोजगार हमारा अधिकार है।आस्था मन की शांति के लिए उचित है किन्तु इससे धन प्राप्ति कदापि संभव नहीं है।यह तो धोखा है,छलावा है। मंहगाई की वजहें जाने उन पर चोट करें। मंहगाई के प्रबल समर्थकों की बातों में ना आएं।सब कुछ चंगा सी।कहने वाले से सवाल करें।चुप रहे तो यह तय है अमीर -गरीब की खाई इतनी गहरी हो जाएगी कि मनुवादी व्यवस्था यहां कायम हो सकती है मतलब दो लोगों का आधिपत्य और सब गुलाम।जागे और मंहगाई से समझौता नहीं संघर्ष करें। लोकतंत्र और संविधान के प्रति आस्था रखें।
मंहगाई के बावजूद रौनक की करें तहकीकात

