जूली सचदेवा (दिल्ली)
जब टेलीविजन मेरे घर आया, मैं किताबें पढ़ना ही भूल गई।
जब कार मेरे दरवाज़े पर आयी, तो मैं चलना भूल गई।
जिस दिन से मेरे हाथ में मोबाइल आया, मैं चिट्ठी लिखना भूल गई ।
जब कम्प्यूटर मेरे घर आया तो मैं शब्दों की स्पेलिंग भूल गई ।
जब मेरे घर में एसी आ गया तो ठंडी हवा के लिए पेड़ों के आसपास जाना मैंने बंद कर दिया।
जब मैं शहर में रहने लगी , तो मैं मिट्टी की गंध ही भूल गई ।
बैंकों और कार्डों के माध्यम से लेन-देन करते हुए मैं पैसों की क़ीमत ही भूल गई.
परफ़्यूम की महक में मैं ताज़े फूलों की महक ही भुला बैठी।
फ़ास्ट फ़ूड के आने के बाद मैं पारंपरिक व्यंजन बनाना भूल ही गई!
हमेशा यहां-वहां दौड़-भाग करती हुई मैं भूल गई कि रुका कैसे जाता है।
समृद्धि का अर्थ जब से दौलत मात्र हुआ, मै मोहब्बत और हवस का अंतर ही भूल गई..!
और अंतत: जब मैं फेसबुक,व्हाट्सएप जैसे ऐप्स पर आई, तो अब मैं वास्तविक

