#विश्व गुरु की अवधारणा को स्थापित करने का प्रयास*
हरनाम सिंह
केंद्र सरकार इन दिनों वर्ष 2047 तक भारत के विकसित हो जाने के विचार को प्रचारित करने के लिए विभिन्न मंचों का उपयोग कर रही है। शिक्षण संस्थानों के अलावा विभिन्न मीडिया संस्थानों के माध्यम से एजुकेशन कॉन्क्लेव के नाम पर प्रचार अभियान जोरों पर है। विगत दिनो मंदसौर में भी “विकसित भारत प्राप्ति और प्रातव्य” विषय अंतर्गत एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी संपन्न हुई थी। शासकीय महाविद्यालय परिसर में स्थित कुशाभाऊ ठाकरे ऑडिटोरियम में आयोजित गोष्ठी के राजनीतिक निहितार्थ लोगों को सहज ही समझ में आ गए थे। शायद यही कारण रहा कि इतना महत्वपूर्ण आयोजन श्रोताओं के लिए तरस गया।न विद्यार्थी पहुंचे और नहीं शहर के जागरूक नागरिक।
आमजन के अनुसार देश में लगभग 11 वर्षों तक सत्ता में काबिज राजनीतिक दल अब चाहता है कि मतदाता उसके चुनावी वादों को याद न करते हुए भविष्य के सुनहरे स्वप्न देखे और वह शासको से अब तक के कार्यकाल का हिसाब न पूछे, इसलिए स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष 2047 को लक्ष्य बनाकर वर्तमान के सवालों से बचने का प्रयास किया जा रहा है।
#विश्व गुरु की अवधारणा*
#विकसित भारत @ 2047 प्राप्ति और प्रातव्य* विषय पर तीन दिवसीय संगोष्ठी में देश-विदेश के चयनित विद्वानों द्वारा शोध पत्र पढ़े गए।
सरस्वती पूजन और वंदना से प्रारंभ गोष्ठी के उद्घाटन सत्र के अतिथियों में भाजपा के पूर्व विधायक और अनुषांगी संगठन विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री मौजूद थे। वक्ताओं ने शासक दल की विचारधारा के अनुरूप विकसित भारत की अवधारणा को उपनिषद, वेदांत, महर्षि पतंजलि को जोड़ते हुए और आयुर्वेद को बौद्धिक शक्ति को आधार बताते हुए पश्चिम की सभ्यता को कोसा। कहा गया कि भारत की सोच वसुदेव कुटुंबकम और नारी तू नारायणी जैसे मूल्यों पर आधारित है।(इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है) शोध पत्रों में वर्ष 2015 से 2025 तक के अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया कि भारत की वैश्विक स्तर पर नेतृत्व कर्ता (विश्व गुरु) के रूप में उभरने की पूरी संभावना है।
आलोचकों के अनुसार “विकसित भारत 2047 यह नारा आज के भारत में जितनी बार दोहराया जा रहा है, उतनी ही बार यह सवाल भी उठता है कि क्या यह भविष्य का रोड मेप है या वर्तमान की नाकामियों पर पर्दा डालने का प्रयास है?
भारत सरकार और सत्ताधारी नेतृत्व इसे राष्ट्रीय संकल्प बताते हैं, लेकिन ज़मीनी यथार्थ में यह नारा अक्सर जवाबदेही से बचने के रूप में ही समझा जाता है।
#नारा, जो सवालों को स्थगित करता है*
2047 की बात करते हुए आज की पीड़ा को “धैर्य” का पाठ पढ़ाया जा रहा है। बेरोज़गारी पूछे तो भविष्य दिखा दो, महँगाई बोले तो राष्ट्रवाद का शोर बढ़ा दो, किसानों की आय अटकी हो तो अमृतकाल का पोस्टर थमा दो। यह राजनीति का वह पुराना दाँव है, जिसमें कल की चमक से आज का अँधेरा ढक दिया जाता है।
विकास की परिभाषा सत्ता ने अपने मुताबिक तय कर ली है—हाईवे, रैंकिंग, निवेश सम्मेलन, चमकदार आंकड़े।लेकिन सवाल यह है कि क्या मज़दूर स्वयं के भविष्य को सुरक्षित मानता है? क्या किसानों को फसलों का वाजिद दाम मिल रहा है है? क्या शिक्षा सबको समान रूप से उपलब्ध है ? क्या नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी सुरक्षित है ?
अगर विकास का मतलब चंद लोगों की की संपन्नता बढ़ना और मुनाफ़े की रेखा ऊपर जाना है, तो यह लोकतांत्रिक विकास नहीं, कॉर्पोरेट उन्नति है।
#लोकतंत्र के बिना ‘विकसित भारत’?*
एक ओर “विकसित भारत” का दावा, दूसरी ओर असहमति पर मुक़दमे, संस्थाओं पर दबाव, मीडिया का विज्ञापन-निर्भर चुप्पी। क्या ऐसा भारत विकसित कहलाएगा जहाँ सवाल पूछना देशद्रोह और चुप रहना देशभक्ति बताई जाती हो?विकास, लोकतंत्र का विकल्प नहीं हो सकता।
यह नारा भविष्य से ज़्यादा वर्तमान नेतृत्व की छवि गढ़ने का प्रयास है। दरअसल यह संदेश देना है कि आज की हर नीति कल की महानता का बीज है—भले ही आज की तकलीफ़ें अनसुनी रह जाए।
#जनता से अपेक्षा, सत्ता से छूट*
जनता से त्याग, धैर्य और सहभागिता की माँग की जाती है, लेकिन सत्ता से जवाबदेही की कोई समय-सीमा तय नहीं है। यदि लक्ष्य 2047 है, तो जवाब 2026 में भी चाहिए—वरना यह लक्ष्य लोकतांत्रिक नहीं, प्रचारात्मक है।
“विकसित भारत 2047”अगर सवालों से डरता है,अगर वर्तमान की सच्चाइयों से मुँह मोड़ता है,अगर लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को बोझ समझता है तो यह सपना जनता क्यों देखना चाहेगी ?
विकसित भारत पोस्टरों से नहीं बनेगा, नहीं गोष्ठियों और सेमिनारों से । वह रोज़गार, बराबरी, स्वतंत्रता और जवाबदेही से बनेगा। और ये सब आज चाहिए, 2047 का सपना दिखाना उचित नहीं है।
हरनाम सिंह

