शशिकांत गुप्ते
दिन-ब-दिन प्रगति बड़ी हो रही है। विकास भी बड़ा हो रहा है।
प्रगति, फैशन की दौड़ में अव्वल आने के प्रयास में अपनी सुध-बुध खो रही है। गरीबी की रेखा के नीचें पलने-बढ़ने वाली प्रगतियाँ तारतार होते वस्त्र से अपने तन को मतलब अपनी आबरू बचाने का असफल प्रयास कर रही है। कथित प्रगतिशील समाज की प्रगतियाँ, महंगे परिधान में अंगप्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा कर रहीं हैं।
फिल्मी भाषा में अंग प्रदर्शन को Bold scene कहतें हैं। बोल्ड सीन का शाब्दिक अर्थ होता है साहसिक दृश्य। व्यंग्यात्मक मतलब होता है, अंग प्रदर्शन के बाद भी धृष्ट, ढीठ या निर्लज्ज होना।
एक अहम प्रश्न जहन में उपस्थित होता है,ऐसी निर्जलज्जता को लोग चटखारे लेकर देखतें हैं?लेकिन हिज़ाब पर बवाल मचाने में अपनी बहादुरी समझतें हैं? आज इक्कीसवी सदी में बहुत से समाज में पर्दा प्रथा का पालन सख्ती के साथ करवाया जा रहा है?
किसी प्रगति के साथ कोई जघन्य अपराध होता है। प्रगति का शारीरिक शोषण होता है।प्रगति की निर्मम हत्या होती है। मरणोपरांत उसे निर्भया कहा जाता है?
विज्ञापनों में प्रगति का ढिंढोरा पीटने वाले, सिर्फ कागजों पर प्रगति दर्शातें हैं। छद्म प्रगति को दर्शाने के लिए अपना फर्ज अदा करने के लिए कर्ज के बोझ को छिपातें हैं।
कारण कर्ज का बोझ विज्ञापन कर्ताओं को वहन नहीं करना है। कर्ज और कर्ज का व्याज तो देश की मालिक जनता पर लादा जाता है।
इश्तिहारों में विकास चारो ओर दौड रहा है। कागजों पर विकास की ऊँचाई असीमित है।
कितने विकास,पढ़लिखकर शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि कर रहें हैं? कितने ही विकास उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं?
देश की आर्थिक रूप से विकास दर को कागजों पर बनाएं गए सांख्यकी ग्राफ में कितना भी बढ़ा चढ़ा कर दर्शाया जाए लेकिन महंगाई से त्रस्त आमजन की खाली जेब असलियत बयाँ करती ही है।
प्रगति और विकास की वास्तविकता में उन्नति कब होगी यह बहुत ही जटिल प्रश्न हैं
जब विकास और प्रगति को सिर्फ विज्ञापनों में दर्शाया जाता है,तब बाबाओं के विज्ञापनों का स्मरण होता है।
विज्ञापन करने वाले बाबाओं के पास जनता की हरएक समस्याओं का समाधान होता है।
प्रायः बाबाओं के विज्ञापनों में दावों के साथ वादे लिखे होतें हैं?
यदि आमजन अपने सामान्यज्ञान का उपयोग कर ले तो आमजन उक्त ढोंगी बाबाओं द्वारा की जारही लुटपाट से बच जाएगा।
सामान्यज्ञान का उपयोग कर इतना ही समझना है कि,यदि किसी बाबा के पास मानव की हर समस्या का इलाज़ है, तो उसे विज्ञापन करने की आवश्यकता हो क्यों पड़ती है?
शशिकांत गुप्ते इंदौर

