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भीम के भक्त भक्ति में लीन होकर ना देखें और ना ही फिल्म के नाम को देखकर

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ये जय भीम फिल्म का आनलाइन लिंक है। वैसे इस फिल्म में डा अम्बेडकर या संविधान से संबंधित कुछ भी नहीं है, और फिल्मो की ही तरह नार्मल फिल्म है। आप ये फिल्म देखकर इस व्यवस्था पर सोच सकते हैं कि इस बजबजाती, सड़ी-गली व्यवस्था में मेहनतकश जनता को न्याय तो नहीं मिल सकता। इस फिल्म में जितना पुलिसिया अत्याचार और कोर्ट की कार्यवाही को दर्शाया है हकीकत में आज भी उससे कंही ज्यादा पुलिसिया और सामन्ती अत्याचार होता है, साथी पत्रकार संतोष जी ने एक पुलिसिया अत्याचार के बारे में बताया ही है और उन पुलिस वालों को कुछ भी नहीं होगा, जिनके जुल्म से उस निर्दोष व्यक्ति की जान चली गयी, क्या गलती थी उसकी बस इतना ही की अपने हक की आवाज उठा रहा था! क्योंकि इस व्यवस्था में ऐसे ही होता है। इस व्यवस्था में मेहनतकश जनता के लिए अपने हक की आवाज उठाने का दण्ड मौत है। और कोर्ट से तो वैसे भी न्याय की उम्मीद रखना बेमानी है क्योंकि न्यायालय में फैसला होता है और फैसला किसके पक्ष में होता है किसी को बताने की जरूरत नहीं क्योंकि सभी जानते हैं…. पोस्ट लंबा हो रहा है बाकी आगे किसी और लेख में….
*अजय असुर**जनवादी किसान सभा उ. प्र.

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