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“धर्मो रक्षति रक्षित:” तो धर्म व्यापार है या कॉन्ट्रेक्ट?

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जूली सचदेवा

 _धर्म की रक्षा करो तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा? वाह, क्या बात है! माने धर्म लेन-देन की चीज़ है, कोई कॉन्ट्रैक्ट है. इस श्लोकांश ने बहुत भ्रम और अंधत्व फैलाया है : ‘धर्म’ शब्द के तात्पर्य के बारे में बिल्कुल निराधार धारणा के कारण।_
     आप नियमित पूजा-पाठ करते रहें, ईश्वर का नाम जपते रहें और कोई छुरा लेकर आपका गला काटने आ गया तो धर्म कहीं से प्रकट होकर उसका छुरा छीन लेगा और उसे पटककर लतियाना शुरू कर देगा। वाह रे अंधविश्वास!

पूरा श्लोक :
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित:।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्म हतोsवधीत्‌॥
(मनुस्मृति 8:15)
मनुस्मृति बहुत बदनाम ग्रंथ है, फिर भी कहाँ लिखा है कि बदनाम लोगों या बदनाम चीज़ों में कोई भी बात अच्छी नहीं हो सकती।
मनुस्मृति में ही धर्म के लक्षण देख लीजिए :
धृति: क्षमा दमोऽस्तेंयं शौचमिन्द्रि यनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्य मक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।।
(6.92)
[धैर्य, क्षमा, आत्मनियंत्रण, अस्तेय (किसी चीज़ की चोरी न करना), शौच (भीतर-बाहर से पवित्र रहना), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को भटकने से रोकना), बुद्धिमत्ता (विवेकशीलता), विद्या (ज्ञानार्जन करना), सत्य, और क्रोध पर क़ाबू रखना, धर्म के यही दस लक्षण है।]

यानी धर्म माने नैतिकता—पूजा-पाठ नहीं। धर्म माने वह जो मनुष्य को पशुओं से पृथक्‌ करता है, उनसे बेहतर बनाता है—
आहारनिद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत्‌ पशुभिर्नराणाम्‌।
धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीना: पशुभि: समाना:॥
(महाभारत, शांति पर्व, 264.26)
यानी धर्म माने नैतिक-बोध, विवेक, परिस्थिति विशेष में ग़लत-सही का निर्णय करने की क्षमता और तदनुरूप व्यवहार करने की प्रवृत्ति।

अतिसंक्षेप में धर्म का आशय :
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं, श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत्।।
(पद्मपुराण, सृष्टि खण्ड, 19.357)
[धर्म का सर्वस्व सुनो और सुनकर उसे अमल में लाओ। जो अपने को प्रतिकूल लगता है, वैसा दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।]

सनातनी ‘धर्म-निरपेक्ष’ कहने पर उछल पड़ते हैं। कारण, ‘धर्म’ शब्द के अर्थ के बारे में बहुत रहस्यमय, बहुत उदात्त धारणा से भरे रहते हैं। ऐसी धारणा जो धर्म को कोई अनन्य चीज़ बना देती है। अमूमन धर्म के सीधे, सरल (नैतिकता वाले) अर्थ से ग़ाफ़िल।
आपकी बात संयोग से जायज़ है किंतु उसका वह आधार नहीं है जो अमूमन समझा जाता है। सार्वभौम नैतिकता के अर्थ में ही राज्य या कोई भी संस्था धर्म-निरपेक्ष नहीं हो सकती। इसलिए आपका निष्कर्ष सही होने के बावजूद उसका आधार आपको इतने गरिमामय श्रेष्ठता-बोध से उन्मत्त कर देता है कि आप नैतिकता से यानी ‘धर्म’ से बहुत दूर छिटक जाते हैं।
किसी भी तरह का श्रेष्ठताबोध लोगों को और चीज़ों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के नाक़ाबिल बना देता है।
जी हाँ, जी हाँ, धर्म का व्याकरणिक या व्युत्पत्तिमूलक अर्थ भी भूला नहीं है।
‘ध्रियते लोकोsनेन, धरति लोकं वा इति धर्म:’ यही न?
क्या मतलब हुआ इसका ? धर्म वह है जो लोकों को, ब्रह्मांड को धारण करता है। सवाल है हमारे लिए, मनुष्य के लिए धर्म क्या है?
बहुत सोचिये, बहुत विचारिये किंतु जवाब वही मिलेगा। मनुष्य का धर्म मनुष्यता यानी नैतिकता। यानी धैर्य, क्षमा, इंद्रियों पर, मन पर नियंत्रण वगैरह। यानी दूसरों के साथ वैसा न करना जो हम दूसरों से नहीं चाहते।
तभी धर्म इस मनुष्य लोक को धारण कर पायेगा।

बाक़ी उसे और भी बहुत कुछ धारण करना है। पृथ्वी की गति, सूर्य, चंद्रमा, हमारी आकाशगंगा नामक नीहारिका के अनन्त सूर्य, उनके अनंत ग्रह-उपग्रह, फिर अनंत नीहारिकाएँ, हर नीहारिका के अनंत सूर्य, हर सूर्य के ग्रह-उपग्रह….सबको धारण करना है, अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने काम में लगाए रखना है।
हमें और आपको छुरेबाज़ों से बचाने की फ़ुरसत है इति धारयते इति धर्म: वाले धर्म बेचारे को?
यह भी है कि आदमी ख़ुद तो नैतिक बन सकता है, दूसरों को नैतिक कैसे बनायेगा? नहीं बना सकता। लेकिन पहले ख़ुद नैतिक बने तभी न दूसरों से नैतिक बनने की अपेक्षा कर सकता है।

इधर फ़ेसबुक वेगैरह पर क्या-क्या दिखाई पड़ रहा था ! किसी ने कुछ कहा नहीं कि लोग एक समुदाय के पीछे पिल पड़ते थे। हिंसक है, ख़ूंखार है, ऐसा है, वैसा है, सारी परेशानियों की जड़ है। जैसे कल्कि अवतार हो गया हो और एक ओर से सबका विनाश करने के लिए निकलने की तैयारी हो।
जो यहाँ पैदा हुए, अपनी इच्छा से तो पैदा नहीं हुए। वे कहाँ जाएँ? एक-दो के अनुभव से बिना किसी अपवाद के सबको एक साथ समेटकर, एक ही रंग में रंग देना, बिना किसी ठोस विकल्प के नफ़रत फैलाना, स्थिति का अविवेकपूर्ण साधारणीकरण है। नैतिकता विवेक से निकलती है।
सामूहिक बम-बम में, झुंड में, नैतिकता नहीं हो सकती। उन्माद में, नफ़रत में भी नैतिकता नहीं हो सकती। यानी ये सब धर्म के, सनातन धर्म के लक्षण नहीं थे।

तुलसी बाबा बहुत पहले कह गये—जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। तो लीजिए आपकी भावना के अनुरूप गले कटने लगे।
इसका भी कोई ठोस, अपराधी-केंद्रित निराकरण आप नहीं कर पाएँगे, न आपकी आराध्य सरकार कर पायेगी। बस अच्छे-बुरे सबको एक साथ समेटकर वही बम-बम करते रहेंगे। वही टी वी चैनलों पर, वही फ़ेसबुकी ‘धर्म’-धुरंधरों की वॉल पर। कल मैंने स्पेशल ट्राइब्यूनल सम्बंधी एक सुझाव दिया था। लेकिन कोई भी सुझाव व्यर्थ है।
अगर आपकी रुचि कुछ सार्थक, सोद्देश्य करने में नहीं, पूरे समूह को टारगेट बनाकर बस हुआ हुआ करने में है तो आप वही करेंगे। वही आपका साधन है और वही साध्य।

नैतिक यानी ‘धार्मिक’ आदमी बोलता कम है, दूरंदेशी से सोच-विचारकर काम अधिक करता है।
परिस्थिति के अनुरूप आत्मरक्षा का क़ारगर उपाय करना भी नैतिकता यानी धर्म की परिधि में आता है, भाई।
(चेतना विकास मिशन)

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