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भारत और आयरलैंड का अंतर:आयरलैंड का दुनिया के तीसरे सबसे अमीर मुल्क बन जाना

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वाचस्पति शर्मा 

ब्रिटिश साम्रज्य्वाद ने जो जुल्मों सितम कत्लो-गारत आयरलैंड में मचाई थी, वो शायद किसी भी और उपनिवेश में नहीं मचाई होगी. पूरी हिस्ट्री लिखने बैठूँ तो शायद भारत का स्वतंत्रता संग्राम भी आयरलैंड के संघर्ष के सामने कुछ नहीं है. इंग्लैण्ड के समुद्र से मात्र कुछ मील की दूरी पर स्थित आयरलैंड को अंग्रेज़ों ने सबसे पहले कब्जाया था और गरीब जनता को जहाज़ों में भर भर के मानचेस्टर की मीलों में झोंक के सस्ते श्रम से मुनाफा कमाना शुरू किया था.लेकिन 1920 में आज़ादी के बाद अभी मात्र 35 साल पहले तक यूरोप के एक रुग्ण देश माने जाने वाले देश से दुनिया के तीसरे सबसे अमीर मुल्क बन जाने में आयरलैंड का एजुकेशन ढांचा एक महत्वपूर्ण रोल अदा कर रहा है. आज आयरलैंड के एजुकेशन सिस्टम को देखिये. एक घोर पूंजीवादी देश होते हुए भी यहां का एजुकेशन सिस्टम समाजवादी मॉडल पर आधारित है.

ये हर पूंजीवादी देश की समस्या है, दुर्दांत पूंजीवादी शोषण के चलते मिनिमम मजदूरी और शिक्षा व्यवस्था और अन्य कल्याणकारी योजनाएं इन्हें चलनी ही पड़ती हैं, वरना वहां की जागरूक जनता इन लोगो की चमड़ी उधेड़ देगी.

अब जो मैं लिखने जा रहा हूं उसे बहुत ध्यान से पढियेगा. आयरलैंड की शिक्षा प्रणाली का एक मुख्य आकर्षण इसका लचीला और छात्र-केंद्रित ढांचा है. माध्यमिक शिक्षा के दौरान, छात्रों को विभिन्न विषयों का चुनाव करने की स्वतंत्रता दी जाती है.

उदाहरणतः यदि कोई छात्र उच्च स्तर के गणित (Higher Level Maths) में रुचि रखता है, लेकिन उसे रसायन विज्ञान (Chemistry) में रुचि नहीं है, तो वह गणित का उच्च स्तर (हायर लेवल ) और रसायन विज्ञान का सामान्य लेवल (Ordinary Level) चुन सकता है.

इसके बाद भी कोई बच्चा यदि किसी विषय में सही कर पा रहा हो तो उसके लिए एक और लेवल है – जिसे ‘अपलाइड’ लेवल कहते हैं (बिलकुल बेसिक लेवल ). इसके बावजूद साल भर में बच्चा अपने सीजनल टेस्ट्स के अंकों के आधार पर किसी भी लेवल में स्विच कर सकता है. (लो लेवल से हाई लेवल में, हाई से लो लेवल में).

यह लचीलापन छात्रों को उनकी रुचियों और क्षमताओं के अनुसार विषय चुनने की अनुमति देता है, जिससे उनके करियर के अवसरों को और बेहतर बनाया जा सकता है. इससे फायदा ये होता है कि किसी भी बच्चे पर मैथ में या साइंस में बुद्धू होने या कमज़ोर होने ठप्पा नहीं लगता.

स्कूल पास करने के बाद आपके फाइनल मार्क्स के आधार पर सीधे आपको इंजीनयिरिंग, मेडिकल, अकाउंट, फार्मेसी या किसी भी मनचाहे कोर्स में दाख़िला मिल जाता है (कोई प्रवेश परीक्षा नहीं लेकिन कोर्स लिए निर्धारित मार्क्स आने चाहिए).

एक बार यदि बच्चे ने निर्धारित मार्क्स पा लिए तो किसी का बाप उसे उसके कोर्स में दाखिले से नहीं रोक सकता (कोई सिफारिश कोई भ्रष्टाचार नहीं). सारी यूनिवर्सिटीज प्राइवेट होने के बावजूद 100 प्रतिशत सरकार के कंट्रोल में हैं. ऐसा नहीं कि कोई नेता अपना कॉलेज खोल कर उसे धंधे का पैसे कमाने का माध्यम बना ले. जरा सा भी भ्रष्टाचार मिला तो मैनेजमेंट की खैर नहीं. साथ ही शिक्षा का 70% हिस्सा प्रैक्टिकल आधारित होता है. थ्योरी क्लासेस प्रैक्टिकल लैब में ही होती हैं.

इसके बावजूद कोई बच्चा यदि स्कूल के बाद कॉलिज नहीं करना चाहता तो उसके लिए सरकार की तरफ से तमाम ट्रेनिंग कोर्सेस फ्री हैं (प्लम्बिंग, इलेक्ट्रिशियन, कंस्ट्रक्शन, फिटनेस, सॉफ्टवेयर टेस्टिंग आदि आदि).

इसके बाद आयरलैंड का मिनिमन वेजेस सिस्टम (न्यूनतम मजदूरी) की व्यवस्था समाज में एक संतुलन बनाये रखती है. यहां पर एक सिक्योरिटी गार्ड और एक इंजीनियर, डॉक्टर की कमाई में ऐसा जमीन आसमान अंतर् नहीं होता जैसा हमारे यहां पाया जाता है.
इसके उलट जिन स्किल्स या कार्यों को हमारे यहां निचले स्तर का काम माना जाता है, वो यहां सबसे हाई पेयिंग जॉब्स माने जातें हैं.

इलेक्ट्रिशियन, प्लम्मर, कंस्ट्रक्शन, हीटिंग सिस्टम वाले स्किल्ल्ड वर्कर मात्र दस बारह दिन काम करके ही डॉक्टरों इंजीनियरों से ज्यादा कमातें है. क्रेन पर लटक कर बिल्डिंग की विंडो की सफाई करने वाले तथा पवनचक्की टैक्नीशियन सबसे टॉप की कमाई करतें हैं.

भारत और आयरलैंड का अंतर: शिक्षा और रोजगार के दृष्टिकोण से

वैसे तो तुलना करने का कोई आधार ही नहीं बनता, फिर भी आयरलैंड में शिक्षा और रोजगार में जो लचीलापन और संतुलन है, वह भारत में पूरी तरह गायब है. जो सबसे प्रमुख अंतर् दिखाई देता है – वो ये है कि हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चों में हीन भावना भरने की हजारों संभावनाएं लिए चलती है.

ना जाने कितने बच्चों को सिर्फ एक दो एक्साम्स के आधार पर छोटी उम्र में ही पढ़ाई में कमजोर घोषित कर दिया जाता है. बच्चे की बेसिक साइकोलॉजी तक की समझ नहीं है, कि उम्र बढ़ने से साथ हर बच्चे की किसी भी विषय को समझने की शक्ति बढ़ती जाती है.

बच्चों की बुद्धि और समझने की शक्ति में कोई ख़ास अंतर् नहीं होता, किसी को एक बार में समझ आ जाती है और कोई बच्चा तीन बार के रिवीजन से समझ जाता है. बस इससे ज्यादा अंतर् नहीं होता.

मैं खुद मैथ और साइंस में जबरदस्त इंटरेस्ट रखता था. मेरे नम्बर भी प्रथम श्रेणी के रहते थे, उसके बावजूद मेरे पास तमाम कहानियां है जिनमें स्कूल टीचरों ने मुझे निकम्मा और पढ़ाई में कमजोर घोषित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा. लोग बाग रिश्तेदार हमेशा अपने बच्चों से तुलना कर कर के जीना हराम कर देते थे. भारत में मजदूरी और पेशेवर नौकरियों में भारी असमानता है. स्किल की कोई कीमत नहीं है.

कुल मिला कर, समाज का कल्चर और शिक्षा व्यवस्था बच्चों के लिए पूरी तरीके से बर्बाद है. आयरलैंड की शिक्षा और रोजगार प्रणाली का यह मॉडल हमें एक समतामूलक और अधिक लचीला समाज बनाने की प्रेरणा देता है. लेकिन आज तक सरकारों के चरित्र को देखते हुए वर्तमान छोड़िये भविष्य में भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सुध लेने की कोई गुंजाइश दिखाई नहीं देती.

जो सरकार पाठ्यक्रम से पीरियोडिक टेबल और इवोल्यूशन का चैप्टर तक हटा चुकी है, उससे जनता में ज़ाहिल मज़हबीं नफ़रतियों की भीड़ पैदा करने अलावा कोई उम्मीद होनी भी नहीं चाहिए. इनकी बला से शिक्षा रोजगार और बच्चों का तार्किक समझ का विकास गया तेल लेने. बाकी सही मुद्दे उठाने की हमारी जनता काबिलियत तो जगजाहिर है ही. इन्हें मन्दिर और शिवलिंग ढूंढने से फुर्सत मिले तो ना सही मुद्दे उठाएंगे.

आजकल भविष्य सुधारने की बात तो छोड़िये, हमारी जनता तो सौ साल नहीं बल्कि इतिहास में हज़ारों साल पीछे जाने को जी जान से प्रतिबद्ध है.

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