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*अडानी, अम्बानी ,डोभाल, जयशंकर के बीच मतभेद या मनभेद*

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सनत जैन

भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था एवं सुरक्षा व्यवस्था के केंद्र में बैठे चार बड़े नाम जिसमे उद्योगपति गौतम अडानी और मुकेश अंबानी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच मतभेद की खबरों ने भारत सहित दुनिया के कई देशों में हलचल मचा दी है। चारों शक्तिशाली लोगों के बीच टकराव का असर न सिर्फ़ देश की नीतियों और उद्योग जगत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि और कूटनीति मे भी दिखने लगी है। सूत्रों के अनुसार, हाल के महीनों में अडानी और अंबानी समूह के कारोबारी हित कई मोर्चों पर टकरा रहे हैं। ऊर्जा, दूरसंचार और विदेशों में निवेश और व्यापार को लेकर दोनों समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हुई है। अडानी समूह की वित्तीय मुश्किलें, अमेरिका में मुकदमा एवं टैरिफ के कारण बढ़ते विदेशी कर्ज़ और व्यापार व्यवसाय को लेकर दबाव बना है। अजीत डोभाल को अडानी समर्थक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर जो कारोबार अडानी समूह ने बढ़ाया था। उसमें उन्हें प्रधानमंत्री के साथ-साथ डोभाल का समर्थन मिलता रहा है। वहीं अंबानी समूह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति में जुटा है। गौतम अडानी के ऊपर जब रिश्वत मामले में अमेरिका में मुकदमा दर्ज हुआ उसके बाद से मुकेश अंबानी ने अपने संबंध अमेरिका के साथ बेहतर करना शुरू कर दिए इस काम में उनकी मदद एस जयशंकर कर रहे हैं। इस तरह की खबरें सत्ता के गलियारे से निकलकर आ रही हैं। विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति पर डोभाल और जयशंकर के बीच मतभेद की चर्चा है। डोभाल राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए अमेरिका और पश्चिमी देशों पर सख्ती बरतने की पैरवी कर रहे हैं। जबकि जयशंकर कूटनीतिक संतुलन साधते हुए अमेरिका, यूरोप और एशिया के साथ भारत की छवि सुधारने के पक्षधर माने जाते हैं। यह खींचतान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्पष्ट स्थिति तय करने में बाधा बन रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है, यह मतभेद व्यक्तिगत अथवा विचारधारा को लेकर नहीं हैं। बल्कि व्यापक सत्ता-संतुलन के साथ निजी एवं पारिवारिक हित भी जुड़े हुए हैं । मोदी के नेतृत्व की केंद्र सरकार में अडानी और अंबानी का आर्थिक प्रभाव जगजाहिर है। वहीं डोभाल और जयशंकर की नीतिगत भूमिका वैश्विक स्तर पर बहुत महत्वपूर्ण है। जब इन चारों के बीच समन्वय की कमी देखने को मिल रही है। इसका असर सीधे तौर पर विदेश नीति, विदेशी निवेश, सामरिक एवं व्यापारिक मामलों में अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों पर देखने को मिलने लगा है। विपक्ष ने इस स्थिति को मुद्दा बनाते हुए आरोप लगाना शुरू कर दिया है। सरकार “कॉर्पोरेट दबाव” और “अंदरूनी खींचतान” में उलझी हुई है। जबकि देश की जनता महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता से जूझ रही है। वहीं अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह मतभेद गहराता है, तो भारत के “विकास और स्थिरता” वाली छवि को भारी नुकसान हो सकता है। स्पष्ट है,अडानी–अंबानी की कारोबारी प्रतिस्पर्धा और डोभाल–जयशंकर की रणनीतिक खींचतान दिल्ली और भारत तक सीमित नहीं है। इसकी गूंज अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विभिन्न स्तरों पर सुनाई देने लगी है। आने वाले दिनों में यह भारतीय राजनीति और कूटनीति की दिशा मे भारत के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। डोनाल्ड ट्रंप के साथ मुकेश अंबानी के निजी रिश्ते बेहतर होते चले जा रहे हैं।ट्रंप के साथ रिश्ते सुधारने और भारतीय नीति में जयशंकर अंबानी समूह की मदद कर रहे हैं। वही ट्रंप लगातार टैरिफ बढ़ाने की धमकी देकर भारत को ब्लैकमेल कर रहे हैं। भारत को चीन के साथ अपने व्यापार और व्यवसाय को बढ़ाने की मजबूरी हो गई है। चीन की तरफ अजीत डोभाल का झुकाव है। ऐसी स्थिति में भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि जो बननी चाहिए थी। वह नहीं बन पा रही है। विदेश नीति के मामले में भी भारत के ऊपर चीन रूस अमेरिका के साथ-साथ पड़ोसी देश भी विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। जिसके कारण भारत की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। सत्ता के चार प्रमुख केंद्र जो मोदी सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। यदि उनके बीच इसी तरह की की तल्खी देखने को मिल रही है। तो आने वाला समय भारत के लिए काफी चुनौती पूर्ण होगा। कॉर्पोरेट वार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों का भी सामना भारत को इन दिनों करना पड़ रहा है। ईएमएस / 27 अगस्त

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