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*वेदांग ज्योतिष के विविध रूप*

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         ~पवन कुमार

     ज्योतिष, व्याकरण, शिक्षा, कल्प, निरुक्त और छंद वेद के छः अंग हैं। ये वेद के नेत्र, मुख, नासिका, कर्ण, हाथ और पैर हैं। नारद का कथन है : ज्योतिष रूपी वृक्ष के सिद्धान्त, संहिता और होरा रूपी तीन स्कन्ध हैं, यह कल्मष से रहित निर्मल वेद-नेत्र है और इसके बिना श्रौतस्मार्त कर्म सिद्ध नहीं होते. ब्रह्मा ने संसार के कल्याण के लिए इसे स्वयं बनाया है।

सिद्धान्तसंहिताहोरारूपं स्कन्धत्रयात्मकम्।

 वेदस्य निर्मलं चक्षुः ज्योतिःशास्त्रमकल्मषम्॥ 

विनैतदखिलं श्रतं स्मार्तं कर्म न सिध्यति।

 तस्मात् जगद्धितायेदं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा॥

         ज्योतिषशास्त्र को आगम और तंत्र भी कहते हैं तथा आगम और तंत्र को शंकर-पार्वती का संवाद भी कहा जाता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि ब्रह्मा के चार मुखों से चार वेद उत्पन्न हुए हैं परन्तु महर्षि कणाद ने अपने नाडीज्ञान में लिखा है कि शिव पंचानन हैं और उनके चार मुखों से चार वेदों की तथा पाँचवे से आगम की उत्पत्ति हुई है। 

      (१) व्याकरण आठ हैं तो क्या आठों ब्रह्मा और शिव के मुख से उत्पन्न हैं। आज पाणिनि व्याकरण का ही प्रचलन है। वैदिक व्याकरण उससे भिन्न है और उसका प्रचार नहीं है। वस्तुतः ब्रह्मा के मुख से वही निकला होगा तो हम पाणिनि की ब्रह्मा से श्रेष्ठ क्यों मानते हैं? 

    (२) करोड़ों वर्षों तक जीने वाले नारद का हमें आजकल दर्शन क्यों नहीं हो रहा है?

     (३) क्या नारद के समय होरा शब्द का और बारह राशियों एवं सात वारों वाले इस होराशास्त्र का प्रचलन था? 

     (४) नारद का कथन है कि ज्योतिष के अध्ययन के अधिकारी केवल द्विज हैं। यदि यह सत्य है तो सूर्य ने मय दानव को ज्योतिष क्यों पढ़ाया? आचार्य वराहमिहिर ने लिखा है कि यवन म्लेच्छ हैं किन्तु ज्योतिष भली-भाँति उन्हीं में स्थित है और वे ऋषियों की भाँति पूज्य हैं।

म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यक् शास्त्रमिदं स्थितम्।

 ऋषिवत्तेऽपि पूज्यन्ते किं पुनर्दवविद् द्विजः॥

तो ब्रह्मा जी यह शास्त्र म्लेच्छों को क्यों पढ़ने देते हैं?

 (५) क्या शुद्ध गणित आदि भी न पढ़ें? 

(६) क्या हमारा आधुनिक ज्योतिष ब्रह्मा और शिव के मुख से उत्पन्न और निर्मल है?

      (७) इस ज्योतिष का मूलाधार बारह राशियाँ और सात बार हैं। तो वेदांग ज्योतिष के इन मुख्य विषयों का वर्णन वेद में क्यों नहीं है? इनके नाम क्यों नहीं हैं? वेद में होरा शब्द क्यों नहीं है जो इस शास्त्र का मुख्य नाम है?

     (८) वेद ने भद्रा भरणी आदि शब्दों को शुभ क्यों माना है?

     (९) योगेश्वरी योगीश्वर उमाशंकर ने आगम और तेल में अतिशय अश्लील, अभद्र और अनैतिक विषयों की चर्चा क्यों की है? 

    (१०) हम एक मुख से चारों वेद पढ़ लेते हैं और अनेक भाषाएँ बोल लेते हैं तो ब्रह्मा और शिव को वेदागम पाठ के लिए चार-पाँच मुख क्यों बनाने पड़े? 

    (११) सामवेद में ऋग्वेदातिरिक्त केवल ७५ मंत्र हैं तो उतने के लिए उन्होंने अन्य मुख क्यों धारण किये? 

    (१२) वे ऋग्वेद के मंत्रों की अन्य वेदों में क्यों पढ़ते हैं? 

   (१३) गीता आदि प्राचीन ग्रंथों में वेदों की संख्या तीन ही क्यों बतायी गयी हैं?

   (१४) ब्राह्मा ने युग, ऋतु, पक्ष, तिथि, करण, नक्षल आदि के नामों की और शुभाशुभ की यह शिक्षा विश्व के अन्य देशों को क्यों नहीं दी?

     ज्योतिष वेदांग कहा जाता है और तीन ग्रंथ वेदांगज्योतिष के नाम से प्रसिद्ध भी हैं, पर उनमें भेद है।       इसलिए विद्वानों ने उनके तीन नाम रख दिये हैं। 

(१) ऋज्योतिष ,

(२) यजुन्योतिष,

 (३) अथर्वज्योतिष।

       प्रथम और द्वितीय में थोड़ा सा ही अन्तर है पर तीसरा दोनों से बहुत भिन्न और नूतन है। ऋग्ज्योतिष के आचार्य लगध हैं। उसमें युग के पाँच संवत्सरों के शुभ नाम हैं पर उनके स्वामियों में बाद में थोड़ा मतभेद हो गया है। उसमें ऋतु, मास, पक्ष, अधिमास, पर्व, तिथि, नक्षल मुहूर्त, नाडी, पल, सावन और नक्षलदेव वर्णित हैं। युगारम्भ उत्तरायण के आरम्भ से है, ग्रहों में केवल सूर्य चन्द्र की चर्चा है, धनिष्ठा प्रथम नक्षत्र है और कुछ नक्षत्रों को उम्र क्रूर भी कहा है, पर वर्तमान ज्योतिष के उम्र क्रूर नक्षत्र उनसे भिन्न हैं। उसमें सात बार नहीं है और बारह राशियाँ नहीं है पर सूर्यमास शब्द हैं। सूर्यमास, चन्द्रमास और अधिमास तीनों है। 

अथर्वज्योतिष में लिखा है कि इसे पितामह ने कश्यप को पढ़ाया था। इसमें मुहूतों के रौद्र, श्वेत आदि १५ नाम लिखे हैं और बताया है कि शुभ नाम वाले मुहूतों में शुभ तथा अशुभ नाम वालों में अशुभ कर्म करो। इसमें तिथि के करणों के तथा उनके देवों के नाम हैं, उनके शुभाशुभ फल हैं, भद्रा की पूँछ है, नंदा भद्रा आदि तिथियाँ हैं और वार भी हैं अतः इसकी नूतनता स्पष्ट है फिर भी इसमें राशियाँ नहीं हैं। ऋग्ज्योतिष का रचनाकाल विद्वानों ने ई०पू० ११०० से १४०० के मध्य में निश्चित किया है पर अथर्वज्योतिष बहुत नया है।

      इसमें ऐसे कई विषयों का वर्णन है जो वेद से अस्पष्ट है फिर भी यह अपने को वेदांग कहता है। बाद के ज्योतिष को, वेदांग उपाधि भी ऐसी हो कपटी है।

       ज्योतिषशास्त्र आकाशस्थ ग्रह, नक्षत्र, विद्युत्, धूमकेतु आदि ज्योतियों से सम्बन्धित है। इनकी स्थिति जानने में अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित और गोलीय रेखागणित आवश्यक होते हैं इसलिए वे भी ज्योतिष के अंग माने जाते हैं। ज्योतिष प्रत्येक व्यक्ति और राष्ट्र का तथा वर्षा, रोग, युद्ध आदि का भूत भविष्य बताता है।

       आजकल ज्योतिष में संहिता, जातक, ताजिक, मुहूर्त, शकुन, स्वर, सामुदिक, अंगस्फुरण, छींक, भूगर्भ-विद्या, वास्तुशास्त्र आदि अनेक विषय आ गये हैं। क्योंकि ये सब भी भविष्य बताते हैं। संहिता ग्रंथों में ज्योतिष के अतिरिक्त अन्य विषयों का भी वर्णन है।

       जातक शास्त्र मनुष्य के स्वास्थ्य, सौन्दर्य, आयु, धन, विद्या, भाग्य, पत्नी आदि अनेक विषयों की स्थिति बताता है किन्तु इस समय ज्योतिष की मुख्य शाखाएँ तीन हैं।

 (१) वैज्ञानिक ज्योतिष,

 (२) होराशास्त्र और,

 (३) वैदिक ज्योतिष ।

वैज्ञानिक ज्योतिष प्रयोगजन्य अनुभूतियों पर आश्रित होने से पूर्ण सत्य है। उसने ग्रहों, तारों तथा धुमकेतुओं आदि के विषय में बहुत कुछ जाना है और वह उनके प्रभाव के अध्ययन में भी तत्पर है। प्राचीन काल में भारतीय ज्योतिष को भी यही स्थिति थी किन्तु बाद में ज्यातिषियों ने गौतम बुद्ध, आर्यभट और भास्कराचार्य आदि के नूतन शोधों को अस्वीकार कर दिया।

       अतः विकास अवरुद्ध हो गया। होराशास्त्र विदेशी है, होरा शब्द विदेशी है, उसकी बारह राशियाँ विदेशी हैं, सात वार विदेशी हैं, ए, बी, सी, डी, से बना अवकडा चक्र विदेशी है और ताजिक विदेशी है। विदेशी ज्ञान बुरा नहीं होता पर आज के हौरा में कल्पनाओं का राज्य है। वेदों में ज्योतिष के कुछ ही विषयों का वर्णन है पर जो है वह सब प्राकृतिक, प्रत्यक्ष, सत्य, अनुभूत और हितावह है पर दुर्भाग्य से आज वह अप्रचलित है और भारत के बड़े-बड़े ज्योतिषी मासों, पक्षों, दिनों, रातों और मुहूर्तादिकों के वैदिक शुभ नामों तक को भूल गये हैं।

        वैदिक ज्योतिष प्रतिदिन विवाह का आदेश देता है पर आज वैदिक हिन्दू को कुछ संवत्सरों में विवाह का एक भी मुहूर्त नहीं मिलता और आज के होराशास्त्र के सब नियमों का माना जाय तो विवाह का निर्दोष मुहूर्त सौ वर्ष में भी नहीं मिलेगा। होराशास्त्र अपने को वेदनेत्र कहता है पर वह वेदविरुद्ध और प्रत्यक्ष विरुद्ध है।

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