निजामाबाद का डिकपल्ली रामालयम, जिसे दक्षिण का खजुराहो कहा जाता है, काकतीय राजाओं द्वारा 14वीं शताब्दी में निर्मित हुआ था और अपनी अद्भुत शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध है. निज़ामाबाद से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर 14वीं शताब्दी में काकतीय राजाओं द्वारा बनवाया गया था. इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका निर्माण है. यह पूरी तरह से सफेद और काले बेसाल्ट पत्थरों से निर्मित है.

मध्यप्रेदश में स्थित खजुराहो के मंदिर अपनी कामुक कलाकृतियों और अद्भुत वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि तेलांगाना के निजामाबाद में भी एक ऐसा मंदिर है जिसकी बनावट और शिल्प कला खजुराहो की याद दिलाती है. इसे स्थानीय रूप से डिकपल्ली रामालयम या खिल्ला रामालयम कहा जाता है. इसे दक्षिण का खजुराहो और इंदौर का खजुराहो भी कहा जाता है.
निज़ामाबाद से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर 14वीं शताब्दी में काकतीय राजाओं द्वारा बनवाया गया था. इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका निर्माण है. यह पूरी तरह से सफेद और काले बेसाल्ट पत्थरों से निर्मित है. मंदिर की दीवारों, स्तंभों और छतों पर की गई बारीक नक्काशी आज भी जीवंत प्रतीत होती है. यहां देवी देवताओं, जानवरों और पौराणिक कथाओं के साथ साथ खजुराहो शैली की कामुक मूर्तियां भी उकेरी गई हैं. यही कारण है कि यह मंदिर अन्य दक्षिण भारतीय मंदिरों से अलग पहचान रखता है.
अधूरी कहानी और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इतिहासकार कार्तिक सारण के अनुसार मंदिर का निर्माण काकतीय काल में शुरू हुआ था. लेकिन अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण और अन्य ऐतिहासिक कारणों से इसका निर्माण पूरा नहीं हो सका. मंदिर के मुख्य शिखर का अभाव इसकी अधूरी कहानी को दर्शाता है. उल्लेखनीय है कि इस प्राचीन मंदिर में भगवान राम की मूर्ति वर्ष 1949 में स्थापित की गई थी. मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 105 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. प्रवेश द्वार पर बना भव्य कीर्ति तोरण काकतीय शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है.
प्रकृति और पर्यटन की संभावनाएं
प्रकृति प्रेमियों के लिए यह मंदिर मानसून के दौरान विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है. भारी बारिश के समय मंदिर के चारों ओर पानी भर जाता है, जिससे यह दूर से किसी तैरते हुए द्वीप जैसा दिखाई देता है. अपनी अद्भुत सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के बावजूद यह स्थल अभी भी बड़े पैमाने पर पर्यटकों की नजरों से ओझल है. यदि इसे व्यापक स्तर पर प्रचारित किया जाए तो यह दक्षिण भारत का एक प्रमुख पर्यटन केंद्र बन सकता है.