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*दिल है की मानता नहीं : कट्टर कम्युनिस्ट भी बन रहे धर्म के  अफीमची*

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       ~ कुमार चैतन्य 

   अब प्रचंड तक का झुकाव ग्रह-नक्षत्र की ओर हुआ है। प्रचंड को किसी कर्मकांडी ने समझा दिया कि आप पर शनि की कुदृष्टि है। शनिदेव को शांत करने के वास्ते प्रचंड ने फरवरी 2010 में कोसी अंचल के इटहरी में भैंस की विधिवत पूजा की थी। हल्ला हुआ तो प्रचंड ने सफाई दी, कि मानव कल्याण के लिए मैं पूजा-अर्चना करा रहा था।

    प्रचंड पथ क्या रहा है? इस विषय पर माओवादी आंदोलन के समय नेपाल में ख़़ूब बहस चली थी। जितने मुँह, उतनी बातें। पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड‘ के शैदाई कहते थे, ‘मार्क्स-लेनिनवाद, माओ और पेरूवियन गुरिल्ला लीडर गोंज़ालो की विचारधारा का कॉकटेल है, ‘प्रचंड पथ‘। दशकों तक भौकाल बना हुआ था प्रचंड पथ का। अब ढोल का पोल खुल रहा है।

सबसे पहले भ्रम का भूस्खलन हुआ था प्रचंड के परिवारवाद से। दूसरा हुआ है, उन्हें माथे पर बड़ा सा तिलक लगाये गेरूआ वस्त्र में देखकर। 

     बीते दिन सुबह उज्जैन के महाकाल मंदिर में रूद्राभिषेक कर प्रचंड जब कैमरे के सामने प्रस्तुत हुए, तो देखनेवाले हैरान। कम्युनिस्ट नेता का ये रूप? विस्मित कर दिया माओवादी नेता ने। कुछ लोग कहने लगे, ‘यह पीएम मोदी का असर है।‘ 28 मई 2008 को नेपाल धर्मनिरपेक्ष, संघीय, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था।

     धर्म के प्रति प्रचंड की आस्था देखकर अधिकांश लोगों में उम्मीद जग गई है कि नेपाल जल्द ही दोबारा से हिंदू राष्ट्र घोषित होगा।

प्रचंड की पत्नी सीता दाहाल पिछले दो वर्षों से बीमार हैं। सीता सीरियस हेल्थ कंडीशन से गुज़र रही हैं। क्या प्रचंड उनके लिए महाकाल मंदिर गये थे? प्रचंड के अनन्य भक्त सुंदर लामा फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, ‘108 किलो रूद्राक्ष और 51 हज़ार रूपये का दक्षिणा देने वाले चेयरमैन प्रचंड पत्नी के स्वस्थ होने की कामना के वास्ते महाकाल मंदिर में महामृत्युंजय का जाप कराने गये थे। बेटा प्रकाश दाहाल और बेटी ज्ञानू केसी को खो दिया था प्रचंड ने, मगर उन दिनों भगवान के दरबार में जाते उन्हें किसी कामरेड ने नहीं देखा था। 

      कास्की ज़िले के ढिकुर पोखरी में जन्में प्रचंड ने अपना राजनीतिक क़िला चितवन ज़िले में बनाया है। उनकी बेटी रेणु दाहाल चितवन के भरतपुर पालिका से दो-दो दफा मेयर निर्वाचित हुईं। दोनों समय नेपाली कांग्रेस से तालमेल कर उन्हें मेयर की कुर्सी पर बैठाया गया।

प्रचंड पहली बार काठमांडो-10 से, दूसरी बार 2008 में रोल्पा-2 से, तीसरी बार 2013 में सिरहा से, चौथी बार 2017 में चितवन-3 से सांसद बने थे। यों, नवंबर 2022 का पांचवा चुनाव प्रचंड ने गोरखा-2 से जीता, मगर चितवन से उनका मोह बना हुआ है। चितवन में प्रचंड का प्रभामंडल निस्तेज करने के वास्ते केपी शर्मा ओली बार-बार धार्मिक कार्ड खेलते रहे हैं। 

       यों, ओली से प्रचंड का गठजोड़ करना, और फिर गठबंधन तोड़ देना नेपाल में राजनीतिक प्रहसन का विषय है। 25 दिसंबर 2022 को भक्तपुर, काठमांडो के बालकोट स्थित ओली के आवास पर एक तस्वीर खींची गई थी। जिसमें नेकपा-एमाले के सर्वोच्च नेता केपी शर्मा ओली मुस्कुराते हुए माओवादी सुप्रीमों से हाथ मिला रहे हैं, और प्रचंड ऊंगलियों से गंगा दाहाल की ओर इशारा करते हुए बता रहे थे कि बेटी मेरी है, मगर इसके आदर्श आप हो।

      ओली इस बात पर इतने आत्ममुग्ध हुए कि प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया। 27 फरवरी आते-आते आदर्श पुरूष ओली ने प्रचंड से समर्थन वापिस ले लिया। 

      केपी शर्मा ओली अब सार्वजनिक रूप से बोलते हैं, ‘प्रचंड के 21 अरब रूपये स्विस बैंकों में जमा हैं।‘ जवाब में गंगा दाहाल के फेसबुक पेज को देखिये। जिसके आदर्श केपी शर्मा ओली रहे हैं, उसके बारे में किस तरह के पोस्ट हैं।

12 मई को गंगा के फेस बुक वॉल पर प्रचंड का भाषण अपलोड किया गया है, जिसमें उन्होंने केपी शर्मा ओली को 70 करोड़ का भ्रष्टाचारी बताया है। नेपाली में एक कहावत है, ‘तिमी पनि चोर-म पनि चोर, चोर-चोर मिली खाऊँ‘ अर्थात, ‘तू भी चोर, मैं भी चोर। चोर-चोर मिल खायें।‘

      धार्मिक आस्था के हवाले से प्रचंड के धुर विरोधी बाबुराम भट्टराई या केपी शर्मा ओली सवाल नहीं उठा सकते। गोरखा में पूजा-पाठ कर मंदिर से बाहर निकलते बाबुराम भट्टराई की तस्वीर को दशकों पहले उनके समर्थकों ने साझा की थी। ओली ने कुछ दिन पहले प्रचंड पर सवाल किया कि वो राष्ट्रवादी बनते हैं, तो राम के प्रति उनकी आस्था क्यों नहीं है?

      चितवन जिसने दाहाल को चुना था, उनकी बेटी यहां से मेयर है, मगर अयोध्यापुरी के निर्माण के वास्ते ये लोग ज़रा भी गंभीर नहीं हैं। 

     चितवन के माडी नगरपालिका में राम का जन्म हुआ था, कम्युनिस्ट नेता केपी शर्मा ओली ने प्रधानमंत्री रहते इसे ढूंढ निकाला था। उन्होंने ख़ूब ढोल पीटा कि असली अयोध्या यहीं था। पहले ओली ने पर्सा ज़िले के ठोरी में अयोध्या की खोज की थी, जिसे लेकर राम जन्मभूमि आंदोलन वाले नाराज़ हुए थे।

प्रधानमंत्री मोदी की भृकुटि भी तनी थी, कि ओली क्या खेल कर रहे हैं। बाद में ओली ने चितवन के माडी में सुनिश्चित किया कि राम यहीं जन्में थे। 

     ओली के अनुसार, सीता के लिए इंडिया वाले अयोघ्या से नहीं, चितवन के माडी वाले अयोध्यापुरी से राम की बारात जनकपुर प्रस्थान की थी। ओली ने नेपाल पुरातत्व विभाग को साक्ष्य जुटाने का निर्देश प्रधानमंत्री पद पर रहते दिया था, मगर अबतक ऐसे किसी तथ्य का अता-पता नहीं लग पाया है।

     माडी गाउँ पालिका के अयोध्यापुरी में राम मंदिर निर्माण का आह्वान ओली ने ही किया था। पैसे भी जुटाये गये, मगर यह काम जब अधर में अटका पड़ा है। मंदिर निर्माण में रूकावट के लिए खेद प्रकट करते हुए ओली ने सारा ठीकरा प्रचंड पर फोड़ दिया है।

     एक बात तो मानकर चलिये कि मोदी के धार्मिक वायरस से केवल भारत का प्रतिपक्ष प्रभावित नहीं हुआ है, पड़ोसी देश नेपाल भी उसकी चपेट में आ चुका है।

कम्युनिस्ट नेता ओली ने ठीक उसी अंदाज़ में पहले राम मंदिर निर्माण का अभियान चलाया। फिर जब सत्ता को लेकर प्रचंड से टकराव शुरू हुआ, तो 25 जनवरी 2023 को ओली पशुपतिनाथ मंदिर पूजापाठ के वास्ते पहुंच गये। सवा लाख दीये जलाकर, विशेष अनुष्ठान करते हुए केपी शर्मा ओली ने घोषणा की कि वह नेपाल में जन कल्याण और विश्वशांति के लिए ऐसा कर रहे हैं।

      कर्मकांड के समय ओली के साथ तत्कालीन सांस्कृतिक मंत्री भानुभक्त ढकाल, उनके विदेश नीति सलाहकार रंजन भट्टराई, और काठमांडो के सीडीओ काली प्रसाद रिजाल उपस्थित थे।

     नेकपा ‘एमाले‘ के नेता मदन भंडारी ने 1990 के संविधान में नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित किये जाने की आलोचना की थी। उन मूल्यों को धो-पोछने में ओली आगे रहे। ओली ने जो कुछ किया, उससे कट्टर कम्युनिस्ट शर्मसार होते रहे हैं। उनके निंदकों का कहना था कि नेपाल का जो सेक्युलर चरित्र है, केवल अपनी राजनीति ने लिए ओली ने उसे विकृत किया है।

        नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक श्याम श्रेष्ठ बताते हैं कि नेपाल नरेश किसी ज़माने में पशुपतिनाथ मंदिर में विशेष पूजा करते थे, और इन दिनों भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह पूजा-पाठ कर रहे हैं, ओली ने उसी की कापी करनी शुरू कर दी है। श्याम श्रेष्ठ ने 2021 में कहा था कि 26 वर्षों के इतिहास में छह कम्युनिस्ट नेता नेपाल में शासन प्रमुख हुए, मगर किसी ने ऐसा धार्मिक ढोंग नहीं किया।  

श्याम श्रेष्ठ सही बयान नहीं दे रहे थे। नेपाल में 1994 में मनमोहन अधिकारी प्रथम कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री बने थे। बालुआटार स्थित प्रधानमंत्री निवास में उनके प्रवेश से पहले तंत्र क्रिया कर बकरे की बलि चढ़ाई गई थी। सिंह दरबार में मनमोहन अधिकारी से साक्षात्कार करते समय यह सवाल मैंने पूछ दिया था।

     वो चिढ़ से गये। बोले, ‘बिना मेरी जानकारी में यह सब हुआ था। इस मामले में मुझे मत घसीटिये।‘ 

      2008 में प्रचंड, 2009 में माधव नेपाल, 2011 में झलनाथ खनाल, 2011 अगस्त में ही बाबुराम भट्टराई प्रधानमंत्री बने थे। तीन दशकों के कालखंड में नेपाली कम्युनिस्ट नेताओं को सही से खंगालें तो प्रचंड और ओली कर्मकांड में सबसे अधिक लिप्त दिखे हैं।

       13 फरवरी 1996 से 21 नवंबर 2006 तक के जनयुद्ध के समय यही प्रचंड थे, जिन्होंने माओवादी कैडरों को गोमांस खाने तक को कह दिया था। माओवाद प्रभावित इलाकों में बीफ खाने पर दबाव बनाने में इन्हीं के कैडर आगे रहते थे। जनयुद्ध समाप्ति के बाद प्रचंड का झुकाव ग्रह-नक्षत्र की ओर हुआ। प्रचंड को किसी कर्मकांडी ने समझा दिया कि आप पर शनि की कुदृष्टि है।

       शनिदेव को शांत करने के वास्ते प्रचंड ने फरवरी 2010 में कोसी अंचल के इटहरी में भैंस की विधिवत पूजा की थी। हल्ला हुआ तो प्रचंड ने सफाई दी, कि मानव कल्याण के लिए मैं पूजा-अर्चना करा रहा था। प्रचंड ने कहा कि धर्म और ज्योतिष का वैज्ञानिक आधार है, उसपर भरोसा करना चाहिए।

      इसलिए, प्रचंड जब उज्जैन के महाकाल मंदिर में रूद्राभिषेक कर रहे थे, नेपाल में किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। दरअसल, इस समय ओली और प्रचंड के बीच हिंदूवादी बनने की होड़ लगी हुई है। 12 अक्टूबर 2015 को केपी शर्मा ओली जब पहली बार प्रधानमंत्री बने, उसके साल भर बाद ही 2016 में शिवरात्रि के समय पशुपतिनाथ मंदिर जाकर उन्होंने पूजा-अर्चना की थी।

      2018 में दोबारा से कुर्सी पर आने के बाद ओली ने और अधिक कीर्तन करना शुरू किया। प्रचंड का प्रयास है कि वो ओली से अधिक हिंदूवादी दिखें। 

     कम्युनिस्ट नेताओं का कायान्तरण और धर्म के प्रति अनुराग, क्या सत्ता सुख के लिए होने लगा है? यह एक ऐसा विषय है, जिसका मनौवैज्ञानिक विश्लेषण करने की ज़रूरत है। 2015 में उत्तर-पश्चिमी चीन के चिंगयुआन काउंटी में ताओ घर्म के अनुयायियों ने माओ के 122 जन्मवर्ष को मनाने के क्रम में उनकी मूर्ति की स्थापना एक मंदिर में कर दी।

      हालांकि शासन ने माओ मंदिर के निर्माण को रोकने का प्रयास किया था। लेकिन जैसे-जैसे दवा की, मर्ज़ बढ़ता ही गया। चीन के शानशी, क्वांगतोंग, हुनान प्रांतों में पिछले आठ वर्षों में चेयरमैन माओ को ईश्वर का अवतार मानने वाले बड़ी संख्या में दीखने लगे हैं। उन्होंने जगह-जगह माओ मंदिरों की स्थापना की है।

     राष्ट्रपति शी इस बात से ख़फा हैं। कई बार बयान दिया कि माओ को ईश्वर का अवतार मत मानो। मगर, 

दिल है कि मानता नहीं!

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