डॉ. विकास मानव
*दह्यते ध्यायमानानां धातुनां हि यथा मला: ।*
*तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषा: प्राणस्य निग्रहात् ।।*
जिस प्रकार धातुओं का मल आग में तपाने से दग्ध हो जाता है, वैसे ही इन्द्रियों के विकार, प्राण को वश में करने से , नष्ट हो जाते हैं।
यह विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि संसार में हर कण कम्पायमान् है। संसार में कुछ भी नहीं जो नितान्त स्थिर हो। हर पदार्थ गतिशील है। हर चीज़ में कम्पन है।
यह प्राण ही है जो समस्त संसार में गति बनाए हुए है। यह हम पहले कह चुके हैं कि शरीर में बल प्राण से प्राप्त होता है। शरीर की व्यवस्था ही ऐसी है कि वह प्राण से शक्ति प्राप्त कर रहा है। प्राणायाम के माध्यम से उस शक्ति संचार को अधिक विस्तृत किया जाता है।
यदि श्वास-प्रश्वास क्रिया को हृदयगति (Heart Beat) या नाड़ी गति (Pulse Rate) से जोड़ कर उनमें तारतम्य ला दिया जाता है, तो प्राणायाम से मिलने वाली शक्ति को और भी बढ़ाया जा सकता है।
इसे तालबद्ध (Rythmic) अथवा तारतम्यमय श्वसन क्रिया (Synchronised Breathing) कहते हैं अर्थात् एक श्वास 6 या 8 हृदय की धड़कन या नाड़ी की धड़कन अवधि के अनुरूप लिया जाता है।
सामान्यतः मनुष्य एक मिनट में 15 श्वास लेता है। यदि श्वास की गति को धीमा कर दिया जाए, इससे शरीर में बल वृद्धि के साथ -साथ आयु में भी वृद्धि होती है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह सिद्ध हुआ है कि जो प्राणी द्रुतगति से श्वास लेते हैं, उनकी आयु कम होती है और जो धीमी गति से श्वास लेते हैं उनकी आयु लम्बी होती है।
_यहां तालिका में प्राणी विशेष की प्रति मिनट श्वास संख्या एवं आयु वर्षों में दर्शायी गई है :_
प्राणी श्वास आयु
कछुआ. 4 300
बोहैड वेल 6 200
हाथी 12 100
मनुष्य I5 80
घोड़ा। 18 50
कुत्ता। 24 13
*ऋग्वेद ( 1.66.1) कहता है :*
“आयुर्न प्राणो नित्यो न सूनु:।”
अर्थात् प्राण हमारी आयु है और यह पुत्रवत् सदा हमारी सेवा में रत रहता है। अतः हमें प्राण को साधना चाहिए।
तारतम्यमय प्राणायाम के लिए, पहले आप को अपने हाथ की नाड़ी (Pulse) पर अंगुलियाँ रख कर या हृदय पर हाथ रख कर उसकी गति को जानना है। बाएँ कान पर हाथ रख कर भी इस गति को जाना जा सकता है। तत्पश्चात् आपने श्वास-प्रश्वास लयमय तरीके से करना है।
अभीष्ट आसन में बैठे या शवासन में लेट जाएँ। आंखे मूंद लें। हृदय गति को भांपे।
छः धड़कनों तक एक श्वास अन्दर लें और तीन धड़कनों तक कुम्भक करें।
फिर छः धड़कनों तक श्वास छोड़े और तीन धड़कनों तक श्वास बाहर रोके रखें।
इस प्रकार 3 प्राणायाम से शुरू कर के यथा शक्ति 12-15 प्राणायाम तक करें।
ध्यान में रखना चाहिये कि श्वास-प्रश्वास की अवधि बराबर हो और बाह्य और आभ्यन्तर कुम्भक की अवधि उससे आधी हो।
श्वास-प्रश्वास के साथ-साथ ‘ओ३म्’ का मानसिक उच्चारण करें।
श्वास और प्रश्वास के बीच में ‘ओ३म् नमो शिवाय’ या ‘ओ३म् खं ब्रह्म’ का मानसिक उच्चारण करें।
तदुपरान्त सामान्य श्वास-प्रश्वास करें।
श्वासगति और हृदय गति के तारतम्य से आक्सीजन की मात्रा रक्त में बढ़ जाती है और मस्तिष्क में रक्त संचार भी बढ़ जाता है।
तारतम्यमय प्राणायाम से सब प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। श्वास संबंधी, रक्त प्रवाह संबंधी, स्नायुतंत्र संबंधी तथा मानसिक रोगों के लिए यह प्राणायाम लाभप्रद है।
इससे अन्य लोगों के रोग भी दूर किये जा सकते हैं। चिकित्सात्मक ध्यान में इस श्वसन क्रिया का उल्लेख है। यह क्रिया ध्यान लगाने में अति सहायक होती है।
उच्च श्रेणी के साधक द्वारा इससे अपने विचारों को दूसरे व्यक्ति तक भेजा जा सकता है यदि वह भी उसी समय ध्यान लगाए। इसे Telepathy कहते हैं.
_This synchronising of respiratory and heart rates boosts oxygen in the blood, while improving circulation in the brain._

