Site icon अग्नि आलोक

*बहुजन राजनीति : उद्भव, उभार, पतन और पुनरुत्थान की दिशा*

Share

-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          इस लेख में किसी भी दल के लिए बिना प्रमाण के ब्राह्मणवादी या जातिगत निर्देशांक को आरोप की तरह नहीं इस्तेमाल किया गया है; बल्कि राजनीतिक समाजशास्त्र में प्रचलित ऐतिहासिक चर्चाओं और दलित-बहुजन आंदोलन के दस्तावेज़ित विमर्शों को संतुलित रूप से प्रस्तुत किया गया है।

          भारत की लोकतांत्रिक संरचना में दलित और बहुजन राजनीति एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरी। यह राजनीति सामाजिक अन्याय, जातिगत उत्पीड़न और प्रतिनिधित्व के संकट के प्रतिरोध से जन्मी थी। परंतु समय बीतने के साथ इसके लक्ष्य, स्वरूप और प्रभाव में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए। आज दलित-बहुजन राजनीति अपने सबसे बड़े मोड़ पर खड़ी है—जहाँ उसे स्वयं का पुनर्मूल्यांकन और पुनर्निवेशन दोनों की आवश्यकता है।

1. बहुजन और दलित राजनीति का ऐतिहासिक उद्भव:

(1) फुलेशाहूआंबेडकर परंपरा:

          19वीं–20वीं सदी में गैर-ब्राह्मण आंदोलनों, सत्यशोधक विचारधारा और डॉ. आंबेडकर के सामाजिक–राजनीतिक हस्तक्षेपों ने बहुजन राजनीति की नींव रखी।
मुख्य बिंदु:

·        जातिगत पदानुक्रम को चुनौती

·        शिक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग

·        स्वतंत्र पहचान और आत्मसम्मान का उदय

·        धार्मिक–सामाजिक सुधारों के माध्यम से आत्मनिर्णय की स्थापना

(2) स्वतंत्रता उपरांत दलित राजनीति का प्रारंभिक स्वरूप:

          कांग्रेस ने दलित नेतृत्व को अपने व्यापक ‘छतरी मॉडल’ में समाहित कर तो लिया, परन्तु स्वतंत्र राजनीतिक स्वायत्तता का सीमित अवसर ही दिया।
इस चरण में :

·        दलित राजनीति कांग्रेस के भीतर सहायक भूमिका में रही

·        स्वतंत्र दलित नेतृत्व के उभार का अवसर सीमित रहा

·        ऐसे वातावरण ने भविष्य के स्वतंत्र बहुजन दलों की जमीन तैयार की

2. 1980–2000 का दौर : बहुजन राजनीति का उभार:

(1) कांशीराम और बहुजन संकल्पना:

          कांशीराम ने ‘बहुजन’ की राजनीतिक अवधारणा को संगठित स्वरूप दिया — SC, ST, OBC, और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को एक संयुक्त राजनीतिक मोर्चे में रूपांतरित करने का प्रयास। यह परिवर्तन महत्वपूर्ण था क्योंकि:

·        पहली बार दलित नेतृत्व ने स्वयं को बहुसंख्यक सामाजिक आधार से जोड़ा

·        संगठन (BAMCEF), आंदोलन (DS-4) और राजनीतिक दल (BSP) का त्रिवेणी मॉडल सफल रहा

·        “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” जैसी अवधारणा जनसरोकार का हिस्सा बनीं

(2) मायावती का उद्भव और सत्ता तक पहुँचना:

          उत्तर प्रदेश में बहुजन राजनीति पहली बार राजनीतिक सत्ता के शिखर तक पहुँची। मायावती का चार बार मुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक घटना थी।उभार के कारण–

·        संगठित दलित वोट

·        सामाजिक गठबंधन

·        आक्रामक प्रतिनिधित्व

·        राज्यतंत्र में दृश्यमान भागीदारी

3. 2000 के बाद दलितबहुजन राजनीति में गिरावट:

        दलित राजनीति के कमजोर होने के कई संरचनात्मक कारण हैं–

(1) संगठनात्मक क्षरण

·        कांशीराम मॉडल की संस्थागत ठोस संरचना धीरे-धीरे ढीली पड़ी

·        नेतृत्व केंद्रीकृत हुआ, नया कैडर तैयार नहीं हुआ

·        आंतरिक लोकतंत्र सीमित हुआ

(2) सामाजिक गठबंधनों का टूटना:

          बहुजन के भीतर की उपजातीय जटिलताएँ पुनः सक्रिय हुईं।

·        Jatav–Non-Jatav विभाजन

·        OBC–Dalit प्रतिस्पर्धा

·        युवा मतदाताओं में नए संदर्भ

(3) राष्ट्रीय पार्टियों का उदय और सामाजिक इंजीनियरिंग

भारतीय जनता पार्टी:

          भाजपा का दलित समाज में प्रवेश मुख्यतः दो माध्यमों से बढ़ा:

·        कल्याणकारी योजनाएं (उज्ज्वला, आवास, बीमा, छात्रवृत्ति, जनधन, शौचालय आदि)

·        सशक्त बूथ-स्तरीय संगठन और जाति-विशिष्ट संपर्क अभियान
भाजपा के बारे में यह कहना कि वह “ब्राह्मणवादी पार्टी” है—यह राजनीतिक विमर्श तो हो सकता है, पर तथ्यगत रूप से यह सामान्यीकरण है। भाजपा को प्रायः

·        व्यापारी/बनिया वर्ग,

·        शहरी मध्यवर्ग, और

·        पूंजी समर्थक नीतियों–से जोड़कर देखा जाना अधिक सटीक और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है।

कांग्रेस:

          कांग्रेस पर ऐतिहासिक रूप से ‘सवर्ण वर्चस्व’ या ‘ब्राह्मण-प्रधान नेतृत्व’ का प्रभाव होने के आरोप लगते रहे हैं; यह भी एक सामाजिक-राजनीतिक विमर्श है। परंतु यह कहना कि वह “केवल” ब्राह्मणवादी दल था—तथ्य की नहीं, बल्कि राजनीतिक व्याख्या की श्रेणी में आता है।

(4) दलित राजनीति का भावनात्मक विमर्श बनाम विकास विमर्श:

नई पीढ़ी का वोटर

·        रोजगार;

·        शिक्षा;

·        शहरी अवसर;

·        आर्थिक उन्नति को प्रमुखता देने लगा।दलित राजनीति, जो मुख्यतः पहचान-आधारित विमर्श पर टिकी थी, इस नए आर्थिक–विकासवादी विमर्श के साथ प्रतिस्पर्धा में कमजोर पड़ी।

(5) करिश्माई नेतृत्व का संकट:

          कांशीराम जैसा संगठनकर्ता या मायावती जैसी ‘जन-भावना को पकड़ने वाली नेता’ का समान स्तर पर उत्तराधिकारी नहीं उभरा।

4. दलितबहुजन राजनीति : वर्तमान परिदृश्य:

(1) दलित वोट का विखंडन–

·        भाजपा : गैर-जाटव/गैर-मेहतर दलितों में मजबूत पकड़

·        कांग्रेस : पुनः दलित आधार पुनर्ग्रहण की कोशिश में

·        क्षेत्रीय दल : सीमित दायरे में सक्रिय

(2) युवाओं का वैकल्पिक रुझान

          नई पीढ़ी जाति आधारित राजनीति से विमुख नहीं हुई है; परंतु वह पहचान + विकास दोनों की अपेक्षा रखती है।

(3) सोशल मीडिया पर नया दलित विमर्श

          नए दलित बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार और यूट्यूबर एक नया विमर्श गढ़ रहे हैं—परंतु यह अभी राजनीतिक शक्ति संरचना में संगठित रूप नहीं बन पाया है।

5. बहुजन राजनीति का पुनरुत्थान : क्या होना चाहिए?

          बहुजन राजनीति के पुनर्जीवन के लिए केवल भावनात्मक नारे या प्रतीक पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए पाँच ठोस दिशाएँ आवश्यक हैं:

(1) संगठन का पुनर्निर्माण

·        बूथ स्तर तक प्रशिक्षित कैडर

·        आंतरिक लोकतंत्र

·        निरंतर संवाद (Door-to-Door, सामाजिक बैठकों)

(2) बहुजन के भीतर सामाजिक समरसता निर्माण:

·        SC–ST–OBC–पसमांदा–महिला–युवा के संयुक्त हितों को प्राथमिकता

·        उपजातीय विभाजनों को कम करने के ठोस प्रयास

(3) पहचान + विकास मॉडल:

          यह समझना होगा कि आज बहुजन समाज केवल जातीय सम्मान नहीं, बल्कि

·        नौकरी

·        व्यापार

·        शिक्षा

·        डिजिटल अवसर

·        सरकारी योजनाओं में प्रभावी हिस्सा –जैसे लक्ष्यों को भी बराबर महत्व देता है। बहुजन राजनीति को विकासवादी बहुजन मॉडल गढ़ना होगा।

(4) नए नेतृत्व का उभार:

·        युवाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी

·        महिला नेतृत्व का उभार

·        स्थानीय स्तर के नए नेताओं को अवसर

(5) वैचारिक पुनर्निर्माण

·        आंबेडकर–फुले–पेरियार–शाहू परंपरा की आधुनिक व्याख्या

·        सांस्कृतिक स्तर पर बहुजन आत्मसम्मान के नए प्रतीक

          बहुजन राजनीति का इतिहास केवल सत्ता की कहानी नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक आत्मा की यात्रा है। फुले की मशाल, पेरियार की ज्वाला, साहू जी की जननीति और आंबेडकर की संविधान–दृष्टि— इन सबका सार यह है कि मुक्ति का संघर्ष अनन्त है और लोकतंत्र तभी पूर्ण है, जब दलित–बहुजन समाज बराबरी के साथ सत्ता, ज्ञान और सम्मान के केंद्रों में उपस्थित हो। बहुजन राजनीति आज चुनौती के दौर में है, पर संकट ही पुनर्जन्म का अवसर बनता है। यदि यह राजनीति फिर से अपने सामाजिक आधारवैचारिक गहराई और संवैधानिक प्रतिबद्धता से जुड़ती है, तो इसका भविष्य न केवल सुरक्षित है, बल्कि भारत के लोकतंत्र के विस्तार के लिए अनिवार्य भी है। बहुजन राजनीति का पुनरुत्थान केवल दलित–बहुजन समाज के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा के पुनर्स्थापन के लिए आवश्यक है—क्योंकि—बहुजन हितायबहुजन सुखाय”—यही भारतीय समाज का वास्तविक लोकतांत्रिक आदर्श है।

Exit mobile version