सोनी कुमारी, वाराणसी
दवा गलत, कम, ज्यादा बीमारी. शरीर है तो बीमारी. बीमारी है तो दवा.
आमतौर पर दवा जरूरत मुताबिक दी जाती है लेकिन कई बार जरूरत से ज्यादा भी। कुछ मामलों में मरीजों का दबाव होने से भी दवा की मात्रा बढ़ जाती है। आखिर ऐसा क्यों होता है और इसके क्या-क्या नुकसान हैं?
दवा कम करने से मरीज का भरोसा बढ़ता है। उसका मेंटल प्रेशर भी कम होता है। कई ऐसे डॉक्टर हैं जो दवा कम या फिर बेहद जरूरी दवा लिखने की वजह से ही मशहूर हुए हैं।
पॉलिफार्मेसी से बचने के लिए जरूरी है कि डॉक्टर की हर पर्ची ऑनलाइन हो और उस पर बारकोड लगे हों। इससे केमिस्ट उसे स्कैन करके सिर्फ वही दवाएं जरूरतमंद को देगा।
आमतौर पर हरेक मेडिसन के साथ पेट की गैस कम करने की दवा या तो डॉक्टर लिख देते हैं या फिर मरीज खुद ही मांग लेता है। यह गलत ट्रेंड है। इससे दूसरी परेशानियां हो सकती हैं।
हमारे देश में मेडिकल की पढ़ाई किए बिना भी कई ‘डॉक्टर’ बन जाते हैं। इनमें केमिस्ट, गूगल, AI चैटबॉट, खुद मरीज और उनके अटेंडेंट आदि भी शामिल हैं। बीमारी बड़ी हो या फिर छोटी, कई लोग इलाज की शुरुआत इन्हीं से दवा पूछकर करते हैं। इस दौरान कई बार लोग छोटी परेशानी के लिए भी पावरफुल मेडिसिन ले लेते हैं या गैर-जरूरी दवा लेते हैं। इसका नुकसान बाद में दिखाई देता है।
उनका डॉक्टरों तक पहुंचने का नंबर बहुत पीछे आता है। कई बार डॉक्टर भी ज्यादा दवा दे देते हैं, भले ही उसकी जरूरत हो या न हो।
*पर्चे पर दवा ही दवा*
जब किसी डॉक्टर या केमिस्ट की ओर से ज्यादा दवा दी जाए या मरीज खुद ही जरूरत से ज्यादा दवा लेने लगे तो यह ओवर-प्रिस्क्रिप्शन ऑफ ड्रग्स या पॉलिफार्मेसी का मामला बनता है। ज्यादा दवा लेने का असर शरीर पर बुरा ही पड़ता है। सच तो यह है कि जब किसी दवा का इफेक्ट (असर) होता है तो उसके कुछ साइड इफेक्ट्स भी होते ही हैं। ऐसे में शरीर को नुकसान होना ही है।
*मजबूरी और लालच?*
हर पेशे का मकसद फायदा कमाना होता है। ऐसा ही मेडिकल प्रफेशन के साथ भी है। हालांकि यह सेवा का पेशा है। लेकिन कई बार किसी अस्पताल की ओर से डॉक्टर पर ज्यादा दवा या जांच लिखने का दबाव होता है तो कुछ मामलों में डॉक्टर को इसका सीधा फायदा हो रहा होता है। लेकिन इसका नुकसान मरीज को होता है।
*मरीज करते हैं ये-ये गलतियां*
केमिस्ट से पूछकर दवा लेना
कई बार लोग केमिस्ट से पूछकर या इंटरनेट आदि की मदद से भी दवा लेते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि मरीज को पहले से भी कोई बीमारी है या नहीं। मान लें किसी को किडनी की शुरुआती परेशानी हो और उसे बुखार होने पर सीधे ही पावरफुल ऐंटिबायोटिक देना शुरू कर दें तो किडनी पर ज्यादा बुरा असर पड़ता है।
ऐसे में कोई दवा लेने से नुकसान ही ज्यादा है। वहीं अगर कोई दूसरी परेशानी न भी हो तो भी बुखार आदि में किसी सामान्य शख्स को शुरुआत में ही ज्यादा पावरफुल ऐंटिबायोटिक देना सही नहीं है। अगर बुखार के अलावा दूसरे लक्षण नहीं हैं तो शुरुआत से पहले 3 दिनों तक सामान्य तौर पर पैरासिटामोल दवा ही दी जाती है।
ज्यादा पावरफुल दवा लेने से उस शख्स की इम्यूनिटी कमजोर होने लगती है। आगे चलकर उतनी पावरफुल ऐंटिबायोटिक दवा से ज्यादा फायदा नहीं होता।
बीच में ही दवा बंद कर देना
किसी बीमारी या परेशानी में मरीज को कोई दवा लिखी जाती है तो फायदा शुरू होते ही कोर्स पूरा किए बिना दवा बंद कर दी जाती है। ऐसा अक्सर ऐंटिबायोटिक के मामले में देखा जाता है।
अगर किसी को ऐंटिबायोटिक का कोई कोर्स 5 या 7 दिन के लिए दिया गया है तो डॉक्टर से पूछे बिना दवा बंद नहीं करनी चाहिए। बीच में दवा बंद करने से भी वह शख्स उतने पावर के ऐंटिबायोटिक के प्रति ज्यादा संवेदनशील नहीं रहता।
ऐसे में अगली बार उसे उसी तरह की बीमारी होने पर उससे भी ज्यादा पावर की और ज्यादा डोज वाली ऐंटिबायोटिक दवा देनी पड़ती है। ऐसे में आखिरी नुकसान तो मरीजों का होता है। यहां समझने वाली बात यह भी है कि ऐंटिबायोटिक हमेशा फायदेमंद ही नहीं होता। इसका इफेक्ट होता है तो साइड इफेक्ट भी जरूर होता है।
*जरूरी दवा के साथ गैर-जरूरी दवा भी खाना*
इसे उदाहरण से समझ सकते हैं। दूर-दराज के गांव में किसी शख्स को बुखार हुआ। बुखार का दूसरा दिन था। वह नजदीक के किसी प्राइवेट हॉस्पिटल या क्लिनिक पर गया और डॉक्टर से मिला। डॉक्टर ने बातचीत की, मरीज को देखा और पैरासिटामोल के अलावा मल्टिविटामिन, कैल्सियम व विटामिन-D सप्लिमेंट के साथ आयरन भी लिख दिया। मरीज यह देखकर खुश हो गया कि डॉक्टर ने कमजोरी मिटाने वाली दवा भी लिख दी।
मुमकिन है डॉक्टर को भी कुछ फायदा मिले और केमिस्ट की भी बल्ले-बल्ले हो गई हो। पर इसमें नुकसान भी हुआ है। यह नुकसान मरीज के शरीर को और उसके पैसे का हुआ। ज्यादा दवा या बिना जरूरत के सप्लिमेंट लेने से शरीर पर कभी भी अच्छा असर नहीं पड़ता।
जब तक जांच में यह न निकले कि किसी शख्स के शरीर में किसी खास विटामिन या मिनरल की काफी कमी है, तब तक उस शख्स को सप्लिमेंट नहीं देना चाहिए। जहां तक मरीज के खुश होने की बात है तो ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे देश में आज भी लाखों लोग यही सोचते हैं कि डॉक्टर के पास गए और उसने ज्यादा दवा नहीं लिखी तो जाना ही बेकार हुआ यानी डॉक्टर ने सही तरीके से देखा ही नहीं।
*डॉक्टरों से भी हो सकती हैं गलतियां*
ज्यादातर डॉक्टर सामान्य दवाओं के साथ मल्टिविटामिन लिख देते हैं। वे इस बात को कम बढ़ावा देते हैं कि अगर किसी शख्स में आयरन, विटामिन्स आदि की ज्यादा कमी नहीं है तो उसे सही डाइट से पूरा किया जा सकता है।
कई बार डॉक्टर आयरन बढ़ाने के लिए फल, साग-सब्जी आदि खाने के लिए कहते हैं पर विटामिन के सप्लिमेंट्स भी पकड़ा देते हैं। कई बार तो मरीज भी शॉर्टकट चाहता है और मल्टिविटामिन की डिमांड कर देता है। कुछ लोगों को प्रोटीन भी सप्लिमेंट के रूप में चाहिए।
कई बार बाहर के प्रोटीन का सीधा असर हमारी किडनी पर पड़ता है। ऐसे में मरीज को यह समझना होगा कि कुदरती तरीके से विटामिन या प्रोटीन बढ़ाने से हमारा शरीर बेहतर महसूस करता है। यह भी समझें कि विटामिन-B और C पानी में घुलने वाले विटामिन हैं। शरीर में इन्हें स्टोर नहीं किया जा सकता। ज्यादा होने पर ये विटामिन यूरिन आदि माध्यम से बाहर निकल जाते हैं। वहीं विटामिन A, D, E, K फैट यानी वसा में घुलने वाले होते हैं। शरीर इन्हें जमा करके रख लेता है। इसलिए इनके ज्यादा सेवन से परेशानी भी हो सकती है। वैसे भी दवाएं केमिकल ही होती हैं।
दूसरी तरफ यह सोच भी बनती जा रही है कि सलाद, फल कौन चबाए, कौन साग और सब्जी पकाए, ऐसे में फटाफट सप्लिमेंट्स खाओ और टाइम बचाओ। इस वजह से भी पैकिट बंद खाने और पैकिट बंद न्यूट्रिशन आइटम्स की डिमांड बढ़ी है। कई बार डॉक्टर पर भी दबाव बनाया जाता है कि सप्लिमेंट्स लिख दो।
बिना परेशानी भी दवा की डिमांड कर दी जाती है। अगर बदन दर्द के लिए दवा लिख दी है तो सिर दर्द के लिए अलग-से दवा लेने का कोई मतलब नहीं होता।
स्टेरॉइड से ही शुरुआत करना
जब कोई शख्स खांसी से परेशान होता है तो फौरन आराम के लिए डॉक्टर स्टेरॉइड लिख देते हैं। कई बार ऐसा मरीज के दबाव में होता है तो कई बार डॉक्टर खुद ही लिखते हैं। कुछ मामलों में मरीज अचानक ही स्टेरॉइड लेना बंद कर देते हैं जबकि ऐसा करना गलत है।
बार-बार स्टेरॉइड लेने से मरीज की इम्यूनिटी पर बुरा असर पड़ता है, जैसा कि हमने कोरोना के दौरान देखा था। ऐसे में स्टेरॉइड देने के लिए जो गाइडलाइंस हैं, उन्हें जरूर फॉलो करना चाहिए। इम्यूनिटी कमजोर होने से बाद मरीज को ज्यादा दवा देनी पड़ती है।
मान लें, मरीज की फास्टिंग शुगर 110 और खाने के बाद 160 आ गई है तो फौरन ही शुगर की दवा शुरू नहीं करनी चाहिए। पहले उसे अपने लाइफस्टाइल को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। डॉक्टर की भी जिम्मेदारी है कि उस शख्स को सोने-उठने का वक्त तय करने, नींद पूरी करने और अगर वह मोटापे का शिकार है तो वजन काबू में करने के लिए कहे।
उसे डाइट में कार्बोहाइड्रेट्स (रोटी या चावल) कम करने, सलाद यानी फाइबर बढ़ाने के लिए कहे। साथ ही हफ्ते में 5 से 6 दिन 30 से 40 मिनट की एक्सरसाइज और वॉक का भी सुझाव जरूर देना चाहिए, वह भी इस हिदायत के साथ कि अगर शुगर काबू में नहीं आई तो ज़िंदगीभर दवा लेनी होगी। इससे बाद में साइड इफेक्ट्स के रूप में दूसरी तरह की परेशानियां भी पैदा होंगी। इसके लिए मरीज को 3 से 6 महीने का वक्त दिया जा सकता है।
लेकिन यहां ध्यान रखने वाली बात है कि अगर उस शख्स की शुगर 250 से ज्यादा हो तो दवा देने की जरूरत हो सकती है।
अगर डॉक्टर में काबिलियत कम है और वह मरीज से बात करके बीमारी को नहीं पकड़ पा रहा या फिर लक्षणों को समझ रहा है लेकिन लक्षणों को ही बीमारी मान रहा है। ऐसे में वह ज्यादा पावर की दवा और वह भी ज्यादा मात्रा में दे सकता है। मसलन: अगर किसी को गैस की समस्या है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे अल्सर की दवा देना शुरू कर दें।
शुरुआत में मरीज को लाइफस्टाइल, डाइट आदि में बदलाव के लिए कहना चाहिए। इसके बाद ही दवा की ओर जाना चाहिए। इससे जहां डॉक्टर पर भरोसा बढ़ता है, वहीं मरीज को भी फायदा होता है। पर कुछ मरीज भी ऐसे होते हैं जिन्हें अगर दवा न लिखें, डॉक्टर का पर्चा भरा न हो तो उन्हें यकीन ही नहीं होता कि डॉक्टर ने उन्हें सही तरीके से देखा है।
*कम दवा है अच्छी बात!*
कितनी दवा हो डॉक्टर के पर्चे पर
इसे कोई दूसरा तय नहीं कर सकता। अगर मरीज को ज्यादा परेशानी नहीं है तो 4 या ज्यादा से ज्यादा 5 दवा तक काफी है। वैसे अगर दवा न देनी पड़े या 1-2 दवा से ही काम चल जाए तो इससे बढ़िया कुछ भी नहीं। पर यह भी ध्यान रखें कि जहां जरूरत हो, वहां ज्यादा मेडिसिन लिखनी चाहिए। वैसे किडनी के मरीजों को कई बार ज्यादा दवा देनी पड़ती है।
कई बार मरीज डॉक्टर को इतनी तरह की परेशानी बताने लगते हैं कि डॉक्टर भी परेशान होकर कई तरह की दवा लिख देते हैं। यहां मरीज को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो परेशानी सबसे बड़ी है, पहले उसके बारे में बात करें। कई बार एक परेशानी से दूसरी जुड़ी होती है। एक ठीक हो गई तो दूसरी अपनेआप ठीक हो जाती है। उदाहरण के लिए किसी को लूज़ मोशंस हुए हैं तो थोड़ी कमजोरी होगी ही।
ऐसे में कमजोरी दूर करने के लिए सप्लिमेंट लेने से अच्छा है कि खाने के जरिए कमजोरी धीरे-धीरे दूर की जाए, न कि दवा लेकर।

