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क्या केवल मन की बात से काम चलाना पड़ेगा?

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पुष्पा गुप्ता 

 साल के अंत में एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से मन की बात की। इसमें उन्होंने 2022 को अद्भुत साल बताते हुए कहा कि ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना का विस्तार करने के लिए ये याद रखा जाएगा। इसके अलावा उन्होंने कोरोना से बचाव पर ज़ोर दिया। नमामि गंगे अभियान को कैसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, कैसे जी-20 की अध्यक्षता से भारत को गौरव हासिल हो रहा है, इन सबका ज़िक्र किया।

        किसी के मन की बात में क्या होना चाहिए, क्या नहीं, ये वही इंसान तय कर सकता है। मन की बात हमेशा सही हो, ये भी नहीं होता। जैसे ये तो तथ्य है कि 2022 में आज़ादी को 75 साल पूरे हो गए। 2047 तक आज़ादी की शताब्दी भी पूरी हो जाएगी।

        75 से लेकर सौ बरस तक के इस सफ़र में अब इस बात पर गौर करना होगा कि आज़ादी जिन मूल्यों को स्थापित करने के उद्देश्य के साथ हासिल की गई थी, क्या मौजूदा सरकार में देश उन उद्देश्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ पा रहा है। 

जब प्रधानमंत्री दावा कर रहे हैं कि देश दुनिया की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, तो उन्हें ये भी बताना चाहिए कि फिर देश के 80 करोड़ लोगों को लगातार दो साल से मुफ़्त अनाज देने की नौबत क्यों रही है और क्यों अगले एक साल तक फिर से मुफ़्त अनाज देने का ऐलान किया गया है।

        क्या बड़ी अर्थव्यवस्था होने की शर्तों में आर्थिक गैरबराबरी ज़रूरी होती है। प्रधानमंत्री मन की बात में जब ये कह रहे हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शिक्षा, विदेश नीति और इंफ्रास्ट्रक्चर सहित हर क्षेत्र में भारत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, तो उन्हें ये भी स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे राजनैतिक कारणों से देश के अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों का नाम नहीं ले रहे हैं या वे सचमुच यही कहना चाहते हैं कि इस देश में सारी तरक्की 1996 से लेकर 2004 और फिर 2014 से लेकर 2022 तक हुई है, बाकी सरकारों के शासन में देश एक जगह थमा रहा।

        प्रधानमंत्री मोदी एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना का विस्तार करने का श्रेय लोगों को दे रहे हैं। अगर ऐसा है, तो फिर वो कौन लोग हैं, जिन्हें एक प्रार्थना में हिंदू-मुस्लिम कोण दिख जाता है, जो एक अभिनेत्री की मौत को लव जिहाद से जोड़ रहे हैं, जो क्रिसमस के त्योहार का सरेआम विरोध कर रहे हैं, जो खुले में नमाज़ पढ़ने पर बवाल मचा रहे हैं।

       ये तमाम घटनाएं पिछले दो-तीन दिनों की ही हैं। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के फ़रीदपुर के एक सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक या शिक्षामित्र बजरुद्दीन को हिंदू समुदाय की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के आरोप में शनिवार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, इसके साथ ही उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

        बजरूद्दीन पर विहिप ने आरोप लगाया कि वे स्कूल में प्रार्थना के दौरान छात्रों से ‘‘मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको, नेक जो राह हो चलाना मुझको, लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी’’ इसका गान करवा रहे थे। अल्लामा इकबाल की इस सुप्रसिद्ध नज़्म को विहिप ने इस्लाम की ओर प्रेरित करने वाला समझा और यही इल्जाम शिक्षक पर मढ़ दिया।

        पुलिस ने भी इस पर प्राथमिकी दर्ज कर ली। क्या यही भारत का अमृतकाल है, जब बुराई से बचने की दुआ करना जुर्म बन जाएगा। और ये ऐसा पहला मामला नहीं है। इसी उत्तर प्रदेश में 2019 में पीलीभीत के एक सरकारी विद्यालय में प्रधान अध्यापक के खिलाफ विहिप और बजरंग दल की इकाइयों ने इसी तरह की शिकायत दर्ज करवाई थी।

        संगठनों का आरोप था कि छात्रों को ‘लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ही’ गाने के लिए कहा जा रहा है। तब भी प्रधान अध्यापक को निलंबित कर दिया गया था। 

एक प्रयोग जब सफल हो जाता है, तो उसे दोहराने में झिझक नहीं होती। यही उत्तरप्रदेश के सरकारी स्कूलों में हो रहा है। हालांकि इन स्कूलों में पेयजल, शौचालय, शिक्षकों की कमी, संसाधनों की कमी जैसी कई समस्याएं होंगी, लेकिन उनके खिलाफ कभी कोई धार्मिक संगठन उठ खड़ा हुआ हो, याद नहीं पड़ता।

        इन स्कूलों में जातिगत भेदभाव भी होता है। दलित छात्रों या शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार के प्रकरण सामने आए हैं, उन पर हिंदूवादी संगठनों के धर्म को खतरा नहीं हुआ। मगर इकबाल की नज़्म पर बात शिक्षकों की गिरफ़्तारी तक जा पहुंचती है।

        दो साल पहले आईआईटी कानपुर में भारत-पाकिस्तान के बड़े शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर कविता ‘हम देखेंगे’ के ऊपर जांच बैठा दी गई। प्रशासन इस जांच के जरिए यह पता लगाना चाहता था कि क्या फ़ैज़ की यह कविता हिन्दू विरोधी है। जब ऐसी घटनाएं देश में हो रही थीं, तो सत्ता के शिखर से ऐसा कोई सख़्त संदेश नहीं आया कि ये बातें आज़ादी के गौरव को धूमिल कर रही हैं, कि ये देश केवल हिंदुओं का नहीं है, यहां के हरेक नागरिक का है, इसलिए धर्म के आधार पर भेदभाव और नफ़रत का सिलसिला रोका जाए। जब सत्ता में खामोशी रही तो नफ़रत करने वालों के हौसले बढ़ते गए।

अब आलम ये है कि मुंबई में एक 20 साल की अभिनेत्री तुनीशा शर्मा की आत्महत्या करने पर भाजपा नेता राम कदम इसे लव जिहाद के नजरिए से देखते हुए कह रहे हैं कि अगर ऐसा है तो पुलिस ये पता लगाएगी कि इसके पीछे कौन से संगठन काम कर रहे थे।

        जबकि पुलिस ने मृतका की मां की शिकायत पर उसके सहकर्मी शीजान खान को गिरफ्तार कर लिया है। बताया जा रहा है कि 15 दिन पहले दोनों का संबंध विच्छेद हो गया था और इस वजह से तुनीशा तनाव में थी।

       फिल्म और टीवी उद्योग में दो साथी कलाकारों के बीच इस तरह के संबंधों का होना कोई नयी बात नहीं है। लेकिन अब यहां भी लव जिहाद का विवाद घुसाया जा रहा है। 

इधर उत्तराखंड और गुजरात से क्रिसमस के विरोध की खबरें आईं। जबकि असम में पुलिस ने एक पत्र लिखकर एक साल में स्थापित चर्चों और छह साल में धर्मांतरण के प्रकरणों की संख्या की जानकारी मांगी।

        क्रिसमस से पहले इस तरह की जानकारी मांगने से विवाद शुरु हुआ तो अब मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने स्पष्टीकरण दिया कि मुझे इसकी जानकारी नहीं थी। असम के मुख्यमंत्री ने इस विवाद से खुद को अलग कर लिया।

      लेकिन क्या देश में धार्मिक विद्वेष की यह भावना नागरिकों से अलग हो पाएगी। या केवल मन की बात से काम चलाना पड़ेगा।

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