-सुसंस्कृति परिहार
भारत और पाकिस्तान के देश प्रमुखों पर जिस तरह आपरेशन सिंदूर बंद कराने की ज़ुर्रत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने की थी।उसे मानकर दोनों देशों ने उनके हौसलों को परवाज़ दी है।अब तो इस बात पर भी नज़र रखी जाने लगी है कि किस देश में सरकार विरोधी आंदोलनों को प्रशय देना है ,उनका सहयोग करना है।इससे उस देश की सम्प्रभुता पर ख़तरा मंडराने लगा है। सरकार पर दबाव डाल कर वहां के खनिज संसाधनों पर आधिपत्य जमाना इनका मूल लक्ष्य है।

मामला ईरान का है जहां जेन जेड आंदोलन ने सरकार विरोधी रुख अपनाया है। यह उनका अंदरुनी मामला है स्वाभाविक है सरकार उन्हें समझाने या दंडित करने की कोशिश करती है।जैसा हमारे देश में मौजूदा लोकतांत्रिक सरकार भी कर रही है। किंतु यह जानकर आश्चर्य हुआ कि दुनिया के आका और डान बनने की कशिश ने ईरान देश की सरकार को ही धमकी दे डाली है। ईरान में जारी व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्तों में एक बार फिर तीखा तनाव देखने को मिल रहा है 2 जनवरी 2026 को ईरान की संसद के अध्यक्ष ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने कोई आक्रामक कदम उठाया तो क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और बलों को वैध लक्ष्य माना जाएगा। यह बयान उस समय आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में चल रहे प्रदर्शनों को लेकर हस्तक्षेप की धमकी दी थी।Fox News की रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी संसद अध्यक्ष का यह बयान उस चेतावनी के कुछ ही घंटों बाद आया, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के एक वरिष्ठ सलाहकार ने कहा था कि अगर अमेरिका ने ईरान के आंतरिक मामलों में दखल दिया तो पूरे क्षेत्र में अराजकता फैल सकती है। ईरान का मानना है कि बाहरी हस्तक्षेप से हालात और बिगड़ेंगे। इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने एक सख्त बयान जारी करते हुए कहा था कि अगर ईरानी सुरक्षा बल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ घातक बल का इस्तेमाल करते हैं, तो अमेरिका हस्तक्षेप कर सकता है। इस बयान ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।
ईरान में बीते कुछ दिनों से जारी प्रदर्शनों के दौरान हिंसक झड़पों की खबरें सामने आई हैं। सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव में कम से कम 7 लोगों की मौत हो चुकी है। यह आंदोलन रविवार से शुरू हुआ और धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों में फैल गया। प्रदर्शनों की जड़ में गहराता आर्थिक संकट है। आम लोग महंगाई, बेरोजगारी और राष्ट्रीय मुद्रा की गिरती कीमत से बेहद नाराज हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि लोगों का गुस्सा सड़कों पर साफ दिखाई देने लगा है
यह विरोध सबसे पहले राजधानी तेहरान में देखने को मिला, जहां व्यापारियों और दुकानदारों ने सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई. ईरान की मुद्रा रियाल में भारी गिरावट, कमजोर आर्थिक विकास और लगातार बढ़ती कीमतों ने आम जनता की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर में महंगाई दर 42.5 प्रतिशत तक पहुंच गई। डॉलर के मुकाबले रियाल की कीमत इतनी गिर चुकी है कि एक अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 14 लाख रियाल हो गई है। इससे आम नागरिकों की क्रय शक्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने प्रदर्शनों को लेकर अपेक्षाकृत नरम रुख दिखाया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से माना कि अगर लोगों की आजीविका से जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो इसके गंभीर नैतिक और सामाजिक परिणाम होंगे. राज्य टीवी पर प्रसारित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जनता की परेशानियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, राष्ट्रपति ने यह भी स्वीकार किया कि मौजूदा आर्थिक हालात में सरकार के पास विकल्प सीमित हैं। मुद्रा की गिरावट और अंतरराष्ट्रीय दबावों के कारण सुधार की राह आसान नहीं है। तेहरान से शुरू हुए प्रोटेस्ट अब देश के सभी हिस्सों में फैल चुके हैं। लोग, ईरान के सुप्रीम लीडर सैयद अली हुसैनी खामेनेई की सत्ता खत्म करने की मांग कर रहे हैं। ईरान के फरसान में एक मदरसे को नाराज लोगों की भीड़ ने आग के हवाले कर दिया। यहां पर खामेनेई के समर्थक उलेमा और मौलाना रह रहे थे। इसके अलावा, भड़के लोगों ने लोरिस्तान, नाहवंद, असदाबाद, कूम और करमनशाह शहरों में भी सरकार के खिलाफ जबरदस्त हल्ला बोलते हुए सरकारी इमारतों को निशाना बनाया है।
ईरान में महंगाई, बेरोजगारी के साथ साथ इस्लामिक सरकार के खिलाफ पिछले एक हफ्ते से भारी विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। ये विरोध प्रदर्शन देश के कई हिस्सों में फैल गया है। इस बीच ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुले तौर पर धन्यवाद दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगर ईरान की इस्लामिक सरकार, प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाती है, तो अमेरिका बीच में आ जाएगा। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखते हुए रजा पहलवी ने लिखा है कि “उनके पास एक “स्थिर बदलाव” की योजना है, अगर इस्लामिक रिपब्लिक शासन गिर जाता है और देश के लाखों नागरिक सड़कों पर उतर आते हैं।”
इससे पूर्व दक्षिण अमेरिका के तेल उत्पादक देश वेनेजुएला पर अमेरिका द्वारा मल्लाहों को बेवजह मारा कहा गया कि वे अमेरिका को ड्रग तस्करी करते थे इसके बाद इसमें वेनेजुएला के राष्ट्रपति को जिम्मेदार ठहराया गया। फिर देश पर बमवर्षा और अब राष्ट्रपति निकोलस और उनकी पत्नी का अपहरण करके न्यूयार्क ले जाने की ख़बर।इस बात को पुष्ट करता है कि अमेरिका विभिन्न देशों में मौजूद खनिज संसाधनों को अपनी बपौती समझता है और किसी ना किसी बहाने हमलावर होकर उस देश में अपने पसंद की सरकार बनाकर वाह वाही चाहता है। दुनिया के इस बड़े लुटेरे से खनिज संपदा से भरे देशों को सावधान रहने की ज़रुरत है।
ईरान में जो कुछ हो रहा है उसके पीछे भी वहां की सत्ता क्राउन प्रिंस रज़ा पहलवी को सौंपने की ये तैयारी है। क्योंकि रज़ा ट्म्प के बहकावे में हैं और सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं।कहा तो यह भी जा रहा है कि जेनजेड आंदोलन के पीछे अमेरिका की ही कारगुजारी है। ईरान यदि अपनी ताकत दिखाता भी है तो वह चंद घंटों में वेनेजुएला जैसी कार्रवाई कर वहां सत्ता परिवर्तन कर सकता है।वैनेजुएला में तो नोबेल शांति पुरस्कार धात्री मेडम इस घटनाचक्र की सूत्रधार हैं।तो ईरान में घर का भेदी लंका ढाए किस्सा चरितार्थ होने की कगार पर है।इससे पहले ईराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान सहित कई देशों के साथ ये तमाशा हो चुका है।दुनिया के तमाम देश इसे देख रहे हैं। जलते फिलीस्तीन और यूक्रेन के पीछे अमरीका ही है।टेरिफ वार से भी ई देश हताहत हुए हैं। हमारा शांति प्रिय देश भी चुप्पी साधे बैठा है ।चार पांच मुल्क ही हैं जो अमेरिका की इस कार्रवाई का विरोध दर्ज़ करा रहे हैं।यह बहुत चिंताजनक है।यदि इस नासूर का समय रहते उचित इलाज नहीं हुआ तो यह बेशक दुनिया में ब्रिटेन जैसी बादशाहत कायम कर लेगा।तब फासिस्ट ताकतों के बढ़ने का अंजाम दुनियाभर के देशों को भुगतने होंगे। विदित हो राष्ट्रपति निकोलस एक बस ड्राइवर से दो बार वेनेजुएला के राष्ट्रपति बने थे। वे मज़दूर यूनियन से जुड़े एक सामान्य लोकप्रिय नेता थे। वहां मौजूद तेल पर आधिपत्य निजी कंपनियों का नहीं सरकार का था। जिससे अमेरिका परेशान था।इसीलिए उन्हें निशाने पर लिया गया। ईरान की खुन्नस तो अमेरिकी ठिकानों पर वार और तेल की धार से पैदा हुई हकीकत है।अगला निशाना फिर कोई देश बन जाएगा यदि इसका सभी देश मिलकर प्रतिरोध नहीं करते हैं।