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*”बे” परवाह नहीं दोषी?*

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शशिकांत गुप्ते

आज गीतकार आनंद बक्षी द्वारा लिखे गीत का स्मरण हुआ इस गीत की पैरोडी इस तरह लिखी जा सकती है।
दोनों सत्ता के नशे में चूर
तेरा कसूर है और मेरे कसूर
न तूने सिग्नल देखा
न मैने सिग्नल देखा
एक्सीडेंट हो गया रब्बा रब्बा
यही तो हुई फिल्मी गाने की बात।
हक़ीक़त में एकसीडेंट हो गया।

यह पहली बार नहीं हुआ,एक्सीडेंट होता रहता है।
पहले होता था तो लापरवाही कहा जाता था?व्यवस्था की अक्षमता होती थी? तुरंत इस्तीफा मांग लिया जाता था?
अब ऐसा नहीं होता है।अब आला दर्जे के किसी अधिकारी या महकमे के मंत्री का कोई दोष नहीं है। यदि कोई महकमे का मंत्री है तो इसलिए है कि,उसे सिर्फ मंत्रालय आवांटीत किया गया है।
सारे मंत्रालयों का अधिपत्य तो सिर्फ एक ही के पास है।
विश्व के सबसे बड़े आकार,प्रकार का दंभ भरने वाले दल के विशाल काय स्वरूप में एक ही व्यक्ति के पास योग्यता है,शेष सिर्फ दल की संख्याबल को प्रमाणित करने के लिए हैं।
पहले एक्सीडेंट होते थे,तो acts of fraud मतलब “बे” ईमानी का कार्य होता था,भ्रष्ट आचरण की बू आती थी। अब जो भी होता है वह
hats off god होता है।
वैसे संवेदनशील मुद्दे पर व्यंग्य करना,टिक टिप्पणी करना आलोचना करना हमारी सभ्यता,संस्कृति,और संस्कारों के विपरित ही नहीं अमानवीयता का द्योतक है।
देश के अपने सैंकड़ो देशवासियों की जान गई है।
हम हमेशा संवेदना प्रकट कर,दोषियों पर सख्त कार्यवाही के घिसे पीटे संवाद बोलकर अपने औपचारिक परिपाटी का निर्वाह कर,अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते हैं।
इन दिनों दोषी कौन? यह तय कर पाना मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन है?
पुलवामा की शहादत,युग पुरुष के खिताब से नवाजे गए पुरुष के गृह राज्य के झूलते पुल से सीधे परलोक प्रस्थान करने वाले, नाटे कद काठी के देशवासियों से दो दो हाथ करते हुए शहीद होने वाले हमारे जांबाज सैनिकों और महामारी के दौरान जल समाधि का पुण्य कमाने वाले देशवासियों कृषि प्रधान देश के सात सौ कृषकों के स्वर्गवासी होना आदि दर्दनाक हादसों का स्मरण दिल दहला देता है। दिल में स्पंदन होना चाहिए।
हमारी स्मृति दूसरों की नुक्ताचीनी करने के लिए जागृत होती है।
स्वयं के जहन में झांकने के समय स्मृति मलिन हो जाती है।
इसीतरह मन की मैली निर्मला भी हो जाती है।
नर देहधारी कलयुगी इंद्र अपने शारीरिक सौष्ठव को मेंटेन करने में व्यस्त होता है।
अंत में सन 1958 में प्रदर्शित फिल्म घर संसार के गीत निम्न पंक्तियां याद आती है।
मजरूह सुल्तानपुरी रचित गीत की पंक्ति हैं।

छेड़ो धुन मतवालों की
बहकी बहकी चालों की
शहर से दूर नशे में चूर
पिकनिक है दिलवालों की
इसे आज के संदर्भ में यूं लिखा जाना चाहिए।
फर्ज से दूर सत्ता के नशे में चूर
ये हक़ीक़त है ऐसे लोगों की

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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